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जीवन
के बीते हुए लम्हों को फिर से याद करने की वजह
?
जो वक्त की अतल गहराईयों में डूब गया है, उसे फिर निकालकर सामने लाने की
कोई जरुरत ?
जो पवन की लहर और पानी के प्रवाह की तरह बह गया है और जीसे लाख प्रयत्न
करके भी वापस नहि लाया जाता, उसे शब्दो में बयाँ करने के पीछे कोई खास
प्रयोजन ?
उसे शब्दों की सुमनमालामें गुंथने के पीछे क्या कोई अज्ञात हेतु तो काम
नहीं कर रहा ?
ऐसा करने की मेरी कोशिश के पीछे क्या कुछ हासिल करने की मनिषा है
?
क्या कोई अर्थ की मोहिनी, कीर्ति की लालसा या तो आत्मश्लाघा तो इनके पीछे
काम नहि कर रही ?
उन सब
प्रश्नों के उत्तर में मैं सिर्फ इतना बताना जरुरी समजता हूँ की मेरे
जीवन की इस यात्रा की प्रसिद्धि के पीछे कोई लौकिक हेतु काम नहीं कर रहा
। ये सब तो मैं केवल ईश्वर की ईच्छा से प्रेरित होके कर रहा हूँ ।
मानवजीवन अत्यंत मूल्यवान है ।
जीवन मिथ्या नहीं, विना प्रयोजन भी नहीं । उसका प्रयोजन है, उसके पीछे एक
निश्चित हेतु भी है । उसमें भारी शक्ति और संभावनाएँ है ।
उससे
बहुत कुछ हासल किया जा सकता है ।
उसके सदुपयोग से एक कुशल कलाकार की भाँति मनुष्य को अपने जीवन की रचना
करना है । मनुष्य को यह अवसर मिला है कि वह अल्पता से समृद्धि प्राप्त
करे, तमस से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर
आगे बढे । प्रकाश के पथ की ओर बढने के लिए उसे न केवल अथक परिश्रम करना
है बल्कि अपनी उपलब्धि को बार-बार देखते रहना भी है ।
भूतकाल को याद किये बिना भी मैं जी सकता हूँ, लेकिन ईश्वर की
ईच्छा-प्रेरणा मुझे मेरी भूतकाल की स्मृतियों को लिपिबद्ध करने के लिए
बाध्य कर रही है । भला, ईश्वरेच्छा को में कैसे टाल सकता हूँ
?
जैसे सेवक का धर्म अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना है, बस कुछ वैसे ही
मैं ईश्वर की इच्छा को इस ग्रंथ-लेखन के माध्यम से अनुवादित कर रहा हूँ ।
मैं तो वो बंसरी की तरह हूँ जिसका सूर निकालनेवाला ईश्वर है । मेरी
आत्मकथा को भलीभाँती पढ़नेवाले सब लोग यह बात से संमत होंगे ।
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