|
यह वक्त
बदलाव का है । पुराने खयालात बदल रहें है और नये विचार अपनी जगह बना रहे
है । ज्यादातर लोग भौतिक सुधार की बातें करते है और आध्यात्मिक सुधार की
उपेक्षा हो रही है । बुध्धिमान लोगों का भी यह मानना है कि ईश्वर जैसी
कोइ चीज नहीं है । जो थोड़े-बहुत लोग धर्म में आस्था रखते है वो भी ईश्वर
के साक्षात्कार के लिए उत्सुक नहीं दिखाई देते । ऐसे हालात में यह
आत्मकथा का प्रसिध्ध होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है ।
जीवन को पूर्ण, मुक्त और प्रभुमय करने के लिए की गई साधना-कथा से कतिपय
बुद्धिजीवियों को आश्चर्य होगा, शंका उठेगी, और कभी-कभी वे गहरे सोच में
पडेंगे या प्रसन्न भी होंगे । वाचक अगर इतना याद रखें की यह कथा वास्तविक
है तो संदेह होने के बजाय उन्हें जीवन-विकास की प्रेरणा मिलेगी ।
पथभ्रांत और हताश साधको के लिए यह कथा नवजीवन की सामग्री बन जायेगी ।
मेरे लिए तो यह आत्मकथारूप अक्षरदेह तीर्थयात्रा समान है । बचपन से मुझे
अपनी रोजनीशी लिखने की आदत थी । इससे मुझे लाभ हुआ है और ये ही वजह है की
लिखने की आदत लंबे अरसे तक जारी रही । बीते हुए वक्त को तराजू में तोलकर
शब्दों में बयाँ करने की मेरी प्रिय प्रवृत्ति आज ईश्वर की प्रेरणा का
पुरस्कार पाकर इस आत्मकथा के रुप में प्रस्तुत हो रही है । इसका ये मतलब
नहीं की इसमें मेरे जीवन के सभी प्रसंग है, लेकिन बहुत सारे आ गये है ।
जो भी प्रसिध्ध करने जैसे लगे वो सभी प्रसंगो को मैंने इसमें शामिल किया
है । मेरा यह मानना है कि आत्मकथा के लेखक को सिर्फ उतना ही प्रसिध्ध
करना चाहिए जो उचित हो, ओरों के लिए लाभदायी हो ।
इस कथा में ज्यादातर बातें आध्यात्मिक है और ये बड़ी स्वाभाविक बात है ।
कोइ नेता की आत्मकथा में राजकारण की बात होगी, कोइ जवान या सिपाही की
आत्मकथा में युध्ध और फौज की बातें होगी, बिल्कुल उसी तरह मेरी जीवन-कथा
में साधना और अध्यात्म के अलावा ओर क्या होगा भला
?
फिर भी रसिक-जनों को यह अवश्य अपनी ओर आकर्षित करेगी ।
कइ लोगों का यह मानना है कि आध्यात्मिक अनुभव व साधना की बातों को गुप्त
रखी जानी चाहिए । यह बात गलत नहीं है फिर भी सबकुछ अपने पास ही रखने की
बात मुझे जचती नहीं है । साधना की गुह्यता के बारें में माननेवाले कई
महापुरुषों ने ऐसी बाँते अपने शिष्यों औऱ अन्य लोगों को बताई है और उससे
मानव-जाति का कल्याण ही हुआ है । रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि व अरविंद
जैसे महापुरुषों की बातों से अनगिनत लोगों को प्रेरणा मिली है, धर्म व
आध्यात्मिकता को पोषण मिला है । इसमें कोइ दोराई नहीं । लोकमत का विचार
करके अपने अनुभवों को अपने तक ही सीमित रखने से विश्व कई महत्वपूर्ण
अनुभव-ज्ञान से वंचित रह गया है । इसलिए मेरा यह मानना है की इस आत्मकथा
की प्रसिध्धि से लोगों को कुछ न कुछ लाभ अवश्य होगा ।
और क्या कहूँ ?
जो भी कहना है वह प्रकाश-पथ के पथिकों को यह कथा ही कहेगी ।
|