श्री योगेश्वरजी की आत्मकथा

उजालों की ओर

'प्रकाश ना पंथे' का हिन्दी भावानुवाद

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५. रुखीबा की स्मृति

 

जीस घर में मेरा जन्म हुआ था वो बिल्कुल साधारण झोंपडी-सा था । उसमें माताजी के मातुश्री भी रहते थे । उनका नाम रुक्मिनी था लेकिन लोग उन्हें प्यार से रुखीबा कहते थे । वो बिल्कुल पढी-लिखी नहीं थी किन्तु उनकी सुझबुझ और व्यवहारिक ज्ञान काफि था । लोग अक्सर उनकी सलाह लेते थे । वो दया की मूर्ति थी । औरों के दर्द से उसका दिल पीघल जाता था ओर वो अपनी ओर से सहाय की पूरी कोशिश करती । उनकी ईश्वर में बडी ही आस्था थी । गाँव में स्थित रणछोडजी के मंदिर में उनका हररोज आना-जाना रहेता था । मंदिर में लगी कृष्ण की मूर्ति को देखकर भाववश वो अक्सर आंसू बहाने लगती । उनका हृदय बहुत पवित्र था ।

उनका मृत्यु कुछ अनोखी ढंग से हुआ । मेरी उमर उस वक्त करीब सत्रह साल की होगी । छुट्टीओ में मैं मुंबइ से गाँव आया हुआ था । उस दिन वैशाखी पूर्णिमा का ग्रहण था । साबरमती में स्नान करके वो मंदिर दर्शन करने गई लेकिन थोडा बुखार लगने पर वो घर आकर लेट गई । वो उनकी जिन्दगी का आखरी बुखार था ।

दुसरे दिन भी उनका बुखार जारी रहा । उस अवस्था में उनको चित्रविचित्र अनुभव होने लगे जीसका वर्णन वो आसपास जमा हुए लोगों को करने लगी । वो कहने लगी की मेरे जाने का वक्त अब पास आ गया है । दो पितांबरधारी संन्यासी ओर एक रेशमी वस्त्र परिधान की हुइ स्त्री उनको लेने के लिए आये है । वो मेरे पास आकर मुझे बताने लगे की मेरा जाने का वक्त समीप है इसलिए तैयार हो जाओ । मैंने उन्हें बताया कि वैसे तो मुझे आपके साथ चलने में कोइ दिक्कत नहि है मगर मेरा एक काम अभी भी अधूरा पडा है । मेरा एक लडका वडौदा रहता है । मुझे उनसे मिलना है । एक बार उनसे मेरी मुलाकात हो जाए तो फिर मुझे चलने में कोइ आपत्ति नहि है ।

थोडी देर बाद वो फिर बोली की मेरी ये वात उन्होंने कबुल कर ली है । वो लोग चले गये है ओर ये बताकर गये है कि तीन दिन पश्चात वो वापस लौटेंगे ओर मुझे अपने साथ ले जायेंगे । इसलिए कृपया रमणभाई को बडौदा से फौरन बुला लो ।

रुखीबा की बातें आम आदमी के लिए थोडी गहन थी । फिर भी वक्त की नजाकत को देखते हुए वडौदा से रमणभाई को तार भेज के बुलाया गया । सब ये सोचते थे कि ये तो साधारण बुखार है ओर एक-दो दिन में उतर जायेगा । किन्तु सबकी ये मान्यता गलत निकली । बुखार यथावत रहा । रमणभाई जब वडौदा से आये तो उन्हें मिलके रुखीबा को बडी ही शांति मीली । दोपहर को उन्होंने मुझे दीया जलाने को कहा ओर पास बैठके गीतापाठ करने को कहा । मैंने गीतापाठ पूर्ण किया । बाद में रमणभाई के हाथ में माताजी का हाथ रखके कहा की बहन की अच्छी तरह से देखभाल करना । रमणभाई ने वचन दिया और उनकी ओर से ढाढस बंधाइ ।

शाम को जो भी उनको मिलने आया, सबके साथ में उन्होंने बडे ही प्रेमपूर्ण तरीके से बातें की । जैसे ही रात हुई, वो बोली अभी वो संन्यासी ओर वो स्त्री मेरे पास आ गये है । वो मुझे पूछ रहे है की मेरा कार्य संपन्न हुआ कि नहि । अब मेरा जाने का वक्त आ गया है ।

उसी रात्रि को उन्होंने देहत्याग किया । मृत्यु का वक्त पहिले से बताकर शरीर छोडा हो एसा मेरी जानकारी में वो पहली बार हुआ था । मैंने सुना था कि योगी और भक्तो कों एसा ज्ञान यद्यपि होता रहता है किन्तु रुखीबा तो एक साधारण व्यक्ति थी । उनका हृदय भावपूर्ण व सरल जरुर था किन्तु वो कोई बडी योगिनी नहीं थी । ईश्वर पर उनकी गहेरी श्रद्धा थी अतः उनको एसा असाधारण अनुभव हुआ । ये सच है कि ईश्वर की कृपा के लिए कोई पंडिताई की आवश्यकता नहि है, सिर्फ साफ हृदय ही काफी है ।

जीस दिन रुखीबा का देहांत हुआ उसी दिन गाँव के कुम्हार को एक स्वप्न आया । उसने देखा की गाँव के बाहर एक विमान खडा है और तीन-चार आदमी रुखीबा को लेकर जा रहे है ! जो भी हो, रुखीबा चल बसी और उनका देहपिंजर पीछे रह गया । कुदरत के इस कानून से कीसी का भी बचना नामुमकिन है । जो ईश्वर का शरण लेता है वो उसके भेद को जान लेता है ।

रुखीबा की स्मशानयात्रा में मैं भी शामिल हुआ । साबरमती के तीर पर उनके पार्थिव शरीर को रखा गया और अग्नि की पावन ज्वाला ने उनके सारे शरीर को घेर लिया । सरिता के शांत तटप्रदेश पर बैठे-बैठे मैंने शरीर की विनाशशीलता और जीवन की अनित्यता का चिंतन किया । मैंने ये तय किया की शरीर की ममता न करते हुए आत्मोन्नति के उच्च शिखर पर आसीन होने के लीये पुरुषार्थ कीया जाय ।

 

 
 

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