श्री योगेश्वरजी की आत्मकथा

उजालों की ओर

'प्रकाश ना पंथे' का हिन्दी भावानुवाद

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उजालों की ओर

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. पिताजी की मृत्यु

 

सांकुबा पिताजी को कृषि में सहयोग प्रदान करती थी । वो बडे ही महेनती और बहादुर थी । खेतों में पानी मोडना व कोस चलाना उनके लिए मानो बाँये हाथ का खेल था । वो पढी-लिखी नहीं थी किन्तु ईश्वरमें उनकी बडी आस्था थी ।

कुछ लोगों को अपने बचपन की बातें ठीक तरह से याद रहती है । बचपन के कई छोटे-मोटे  किस्से वे हुबहु बयाँ कर सकते है । ऐसा सिर्फ युवानों में ही नहीं लेकिन बुझुर्गो में भी पाया जाता है । जब अपने अनुभव प्रस्तुत करने की उनकी बारी आती है तो वो उनको इतनी बारीकाइ से पेश करते है की सुननेवाले भी दंग रह जाते है । उनकी स्मरणशक्ति पर हमें आश्चर्य एवं आदर होता है । एसे लोग बुढापे में भी अपनी बीती हुई जिंदगी को याद करके फिर बचपन के दिनों का आस्वाद ले लेते है ।

मेरी बात कुछ अनोखी है । मेरे बचपन के अधिकतर प्रसंग मुझे याद ही नहीं । ये बात का मुझे कोइ गम नहीं । ये बात ठीक है या नहीं इसकी चर्चा मैं यहाँ नहीं करना चाहता । यहाँ पर तो मुझे जो भी कुछ याद है वो मैं बताने की कोशिश कर रहा हूँ । जन्म-मरण के चक्र में युँ तो हम अनगिनत बार जन्म ले चुके है और बचपन बीता चुके हैं । हम में से किसीको उनके बारें में कुछ याद नहीं । इसके लिए हमें खेद भी नहीं होता तो फिर इस बचपन की कुछ स्मृतियाँ याद न रहने से भला मैं क्यूँ शोक करुँ ? ये जीवन भी कहाँ हमेशा रहनेवाला है ? इसलिए मुझे जीतना भी याद पड़ता है उससे मुझे खुशी अवश्य होती है मगर मैं जो भूल चुका हूँ उसका मुझे कोई गम नहीं ।

बचपन में मुझे उदर की व्याधि रहा करती थी । मेरे माताजी के बताने पर मैं यह कह रहा हूँ । मेरी यादशक्ति तेज थी । गाँव में रमताशंकर नामक एक सज्जन पुरुष रहते थे जो सब बच्चों को संध्या करना सिखाते थे । उन्हीं से मैं संध्या, रुद्री व शिवमहिम्न के पाठ सिखा । हररोज शिवजी के मंदिर में मैं संध्या करने जाता था ।

बचपन के दिनों को बीतते हुए देर लगती है भला ? जब सारा जीवन ही पानी की तरह क्षण में बह जाता है तो बचपन का तो क्या कहना ? जीवन के आठ साल तो यूँ करके बीत गये और मेरा नवाँ साल में प्रवेश हुआ । ये साल मेरे जीवन में क्रांतिकारी साबित हुआ । श्रावण सुद बारस को मेरा नौवें साल में प्रवेश हुआ और भाद्रपद में पिताजी को चेचक की बीमारी हुई । कुछ ही दिनों में वो चल बसे । जवानी में मौत होने से कुटुंब में हाहाकार हो गया । गाँव के लोग भी उनकी भलमनसाई को याद करके शोक करने लगे । मेरी माँ की उमर उस वक्त सिर्फ पचीस साल की थी । उनका सौभाग्य खंडीत हुआ इसलिए वो भी शोक में डूब गई । शोक का वो समय मुझे थोड़ा-थोड़ा याद है ।

लेकिन शोक करने से क्या होता है ? जो चला जाता है वो वापिस तो नहीं आता । जन्म और मृत्यु तो सनातन है । सबको एक न एक दिन उसका महेमान होना ही है । जो परमात्मा की भक्ति करके उसको पा लेता है वो ही उन पर विजय पाता है । और वैसे भी जन्म व मृत्यु तो एक दूसरे के पूरके है, साथी है । एक जगह सूर्य का अस्त होने से क्या सूर्य का नाश होता है ? वो तो कहीं ओर निकलता है । एक जगह का सूर्योदय किसी औरों के लिए सूर्यास्त है बिल्कुल उसी तरह जन्म और मृत्यु का भी है । इसलिए उनका हर्षशोक कैसा ? जो भी ईश्वर के चरणों में प्रेम करता है उसका सौभाग्य कभी नष्ट नहीं होता । मौत उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती । संसार के सब ऐश्वर्य क्षणभंगुर है, विनाशशील है, शाश्वत नहीं । ये शरीर भी उसी तरह शाश्वत नहीं, उसका अंत कभी न कभी तो होना ही है । धीरा भगत ने गाया है कि

काच नो कूपो काया तारी,

वणसताँ न लागे वार ।

जीव काया ने सगाई केटली,

मूकी चाले वन मोझार ।

अर्थात् तेरी काया काँच के बरतन की तरह क्षणभंगुर है । उसे टूटते देर न लगेगी । जीव व काया की सगाई क्या है ? वह तो काया को जंगल के बीच छोड़कर चला जाता है ।

लेकिन अधिकांश लोग ऐसे विवेकज्ञान से वंचित है इसलिए शौक करते है । हमारे घर में भी मातम छा गया । इतना कम था कि पिताजी के मृत्यु ते पंद्रह दिन के बाद शौक का एक और प्रसंग आ धमका । हम तीन भाई-बहन थे उसमें सबसे छोटी बहन की मृत्यु हो गई ।

ईश्वर की लीला अपार है । वो जो भी करता है वो मंगलमय ही है एसा अनुभवी संतो का मानना है । पिताजी के मृत्यु के बाद ईश्वर की कृपा से मेरे लिए एक योजना बनाई गई । माताजी के बड़े भाई रमताशंकर चौपाटी में किसी शेठ के घर चपरासी की नौकरी करते थे । उनके मकान के पास ही अनाथ बच्चों के लिए एक आश्रम था । उन्हों ने उसमें मेरे प्रवेश के लिए अरजी दी और वो मंजूर हो गई । उस जमाने में बंबई पढ़ने के लिए जाना हमारे पिछड़े हुए गाँव में रहनेवालों के लिए लंदन जाने के बराबर था । कई गाँववालों ने यह बात का विरोध किया । लेकिन मेरी दृढ़ इच्छा थी । ईश्वर की भी मेरे लिए यही योजना थी । मानो मेरे पूर्व-संस्कार मुझे वहाँ जाने के लिए खींच रहे थे । माताजी और उनको दोनों भाई यह प्रस्ताव पर जूटे रहे और किस्मत ने मुझे बंबई में लाकर रख दिया । उस वक्त मेरी उम्र सिर्फ नौ साल की थी और में चौथी कक्षा में पढ़ता था ।

 

 
 

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