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जब मैं बंबई आया तो वहाँ का माहौल मेरे लिये बिल्कुल नया था । गाँव में
मुक्त और कुदरती माहौल था जब शहर में उससे बिल्कुल उल्टा था । इससे मुझे
शुरु में कुछ घुटन-सी महसूस हुई । उसकी कइ बजह थी । एक तो छोटी उम्र में
इतने दूर आकर अनजान लोगों के बीच रहना था । जब भी कीसी व्यक्ति को अनजान
जगह और अनजान लोगों के बीच जाना पड़ता है तो एसा लगना स्वाभाविक है ।
लेकिन यहाँ एक और बात थी । आम विद्यासंस्थानों की तरह हमारे यहाँ भी बड़े
छात्र छोटे छात्रों पे अपना सिक्का जमाते, उनसे अपने काम करवाते और
परेशान करते । कभी-कभी हाथापाई भी होती । अगर छोटे विद्यार्थी गृहपति या
प्रधान विद्यार्थी को अपनी परेशानी के बारे में बताते तो उनके खिलाफ
कार्यवाही होती । मगर फरियाद करने से पहले सो बार सोचना पड़ता क्यूँकी
कभी-कभी बडे विद्यार्थी को पता चलने पर उनकी डाँट खानी पड़ती । परिस्थिति
से तंग आकर छोटे बच्चें अक्सर भागने की सोचते ।
हालात को बिगड़ने के लिए कई ओर वजह थी । छोटे बच्चों को अपना काम खुद
करना पड़ता था । हालाकि बाद में उसमें सुधार आया था और उन्हें कपड़े धोने
से मुक्ति दी गई थी । आठ-नौ साल के बच्चों से अच्छे कपड़े व बर्तन धोने
की उम्मीद रखना कुछ ज्यादा ही था । बहुत सारे बच्चों को अपने घर में ऐसा
करने का कोइ पूर्वानुभव नहीं था । ऐसे भी कई बच्चे थे जो अपने घर में खुद
नहाते नहीं थे मगर उन्हें नहलाया जाता था । अब ऐसे बच्चे संस्था में
प्रवेश पाते ही सभी कार्य में संपन्न कैसे हो सकते हैं
?
ओर तो ओर उनकी भूल के लिये उन्हें सजा या दंड हो तो उसे क्रूरता ही कही
जायेगा । बच्चों के सुधार के लिए उनको समज़ने की आवश्यकता है, नहीं की
उनको दंड देने की ।
संस्था में दैनिक कार्यक्रमों का पालन बडी चुस्त ढंग से होता था । बच्चों
को उनसे भी परेशानी होती । कभी नियमभंग होने से जो शिक्षा जी जाती उसकी
कल्पना करके बच्चें धबरा जाते । गृहपति का राक्षसी पंजा जब बच्चों के
कोमल गाल पर पडता तो बच्चें रो पडते । मुँह सुजने से दाक्तर को भी बुलाना
पडता और कभी कान पर लगने से सुनने में दिक्कत आती । कई विद्यार्थीयों ने
एसी सजा के विरुद्ध ट्रस्टीयों तक शिकायत की मगर कोई खास नतीजा नहीं
निकला । ऐसे माहौल में मुझे गाँव जाने का मन होना बड़ा स्वाभाविक था ।
मेरे मामाजी आश्रम के पास ही रहते थे । एकाद साल के बाद वो अपने शेठ के
साथ अंधेरी रहने चले गये । हर रविवार मैं उनके पास जाता । वो मुझसे प्यार
करते और मेरी जरुरतें पूरी करते । जब मामाजी अंधेरी रहते थे तब मेरी माँ
बंबई आई । मुझे मिलने आश्रम पर भी आई । मैंने उनसे कहा की यहाँ मेरा दिल
नहीं लगता, मुझे वापिस गाँव ले जाओ मगर उन्होंने मुझे ढाढ़स बँधाई ।
एक-दो साल तक ऐसा अनुभव मैं करता रहा । शुरु में हर छूट्टीयों में गाँव
जाने के लिए मैं बेकरार रहता लेकिन बाद में आश्रम में मुझे अच्छा लगने
लगा और खास गाँव जाने का मन भी नहीं करता । हरएक नयी चीज, व्यक्ति या
माहौल के लिए ये वात सही है । शुरु में मन नयी चीजों के प्रति आकर्षित
नहीं होता और पुरानी चीजों के पीछे भागता रहता है । वक्त आने पर अपने आप
सबकुछ बदल जाता है और नयी चीज या नयी जगह मन को भाने लगती है । संसार में
ऐसा होता ही रहता है । जो चीज आज प्रिय लगती है, कल शायद न भी लगे और जो
आज प्रिय न लगती हो वो शायद कल अच्छी भी लगे । जैसे कोई कन्या की शादी
होती है तो वो अपने घर के प्रति ममत्व अनुभव करती है और आँसू बहाती है ।
बक्त गुजरने पर उसे अपना ससुराल अच्छा लगता है । जब वो माईके जाती है तो
वापिस ससुराल आने का इंतजार करती है । मन की रचना ही कुछ अजीब है, वो
किसी नये पदार्थ, व्यक्ति या वातावरण से नये संबंध प्रस्थापित कर लेता है
। शायद उसी में उसकी भलाई है । इसका ये मतलब नहीं की आदमी को सबकुछ
पुराना भूल जाना चाहिए । जो भी अच्छा हो उससे प्रेरणा लेकर उसे आगे बढ़ना
है । हर परिस्थिति में प्रसन्न रहने की कला सिखनी है । समजदार लोग मौत से
इसी कारण नहीं डरते क्योंकि उसीसे नये जीवन की संभावनाएँ पैदा होती है ।
अनुभव से ये सब सत्य समज में आते है । मैं तो उस वक्त छोटा बच्चा था
इसलिए मुझमें इतनी समज नहीं थी । शुरु-शुरु में बंबई आश्रम में अच्छा
नहीं लगने की यही वजह थी
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