श्री योगेश्वरजी की आत्मकथा

उजालों की ओर

'प्रकाश ना पंथे' का हिन्दी भावानुवाद

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उजालों की ओर

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. जीवनविकास की प्रेरणा

 

स्थितप्रज्ञ के लक्षणों को समझना कितना गहन है ! मुझमें उस वक्त भला उतनी अक्ल कहाँ थी की मैं उसे ठीक तरह से समझ पाता । फिर भी जितना मुझे समझ में आया उस हिसाब से मैंने अपने जीवन को नापना शुरु किया । स्थितप्रज्ञ पुरुष काम व क्रोध से परे होता है, और कामिनी व कांचन में नहीं फँसताँ । उसका रागद्वेष, अहंकार व ममता पे काबु होता है । संसार के क्षणभंगुर विषयो के प्रति आसक्ति करने के बजाय वो ईश्वर से अपनी प्रीत जोड़ता है । उसका मन सदैव परमात्मा से ज़ुड़ा रहता है । जैसे बहेती हुई नदी सागर में धुलमिल जाती है, बिल्कुल उसी तरह स्थितप्रज्ञ पुरुष का मन परमात्मा की परात्पर शक्ति से अपना अतूट संपर्क बनाये रखता है । अतः उसके तन, मन व वचन में परम शांति, प्रेम व पवित्रता की झलक मिलती है । वो सुविचार और सदगुणों की मूर्ति सा बन जाता है ।

स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों का अध्ययन करने के बाद मुझे लगा की अगर मुझे ऐसा आदमी बनना है तो मुझे भी सदगुणों की मूर्ति बनना होगा, जीवन को सुविचार और सत्कर्म से संपन्न करना होगा । जीवन को उत्तम भावना व आदर्शों से भरना होगा । काम, क्रोध, अभिमान से कोसों दूर रहेना होगा तथा भय, धिक्कार आदि से मुक्ति पाना होगा । जीवन को निर्मल करना होगा तथा सब के प्रति प्यार से व्यवहार करना होगा ।

गीता ने मानो एक माँ की भाँति मुझे मार्गदर्शन दिया, जीवन को कीस तरह से मोड़ना चाहिए उसकी समझ दी और जीवन की शुद्धि के लिए आवश्यक प्रेरणा भी प्रदान की । मेरा काम ईससे काफ़ि आसान हो गया । मैंने बड़ी सावधानी से अपने जीवन को सदगुणों की प्रतिकृति बनाना प्रारंभ किया । हररोज सोते वख़्त अपने आपको पूरी तरह टटोलता, सोचता की आज क्या सही किया और क्या गलत । नतीजा यह निकला की मेरी जागृति काफ़ि बढ़ी । मन जाग्रत रहकर प्रत्येक कार्य को जाँचने लगा । अगर कुछ गलत करने का सोचता तो तुरंत वो आगे आके मुझे बचा लेता । संजोग से अगर साधारण सी गलती भी होती तो उसके लिए मन में बहुत पश्चाताप होता और उसे भविष्य में न दोहराने का दृढ संकल्प करता । रोजनिशी लिखने की आदत ने भी बड़ी सहायता की । वैसे भी मुझमें कोई खास दुर्गुण नहीं थे लेकिन जो भी छोटे-मोटे थे वो आत्मनिरीक्षण से दूर होने लगे । मेरे जीवन में एक नया प्रकाश फैला । भावि जीवन के लिए मंथन शुरु हुआ ।

भगवद् गीता के प्रति मेरा प्यार व पूज्यभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही गया । उसमें कभी कोई बाधा या रुकावट नहीं आयी । गीता ने मुझे जो दिया, अनमोल साबित हुआ । उसकी प्रेरणा से मेरे विचारों की दरिद्रता दूर हुई । मानो मैं आध्यात्मिक रुप से धनी हो गया । गीता को यथाशक्ति समझने की कोशिष मैंने अपनी आगे की जिंदगी में जारी रक्खी । आज मैं निर्भयता से यह कह सकता हूँ की गीतापठन ने मेरी भावि जिंदगी के रुख को बदल दिया ।

 

 
 

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