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छंद
तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल ॥
कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम ॥
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर
॥
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ ॥
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन
महुँ ठानि ॥
आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार ॥
रिपु परम कोपे जानि।
प्रभु धनुष सर संधानि ॥
छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच ॥
उर सीस भुज कर
चरन। जहँ तहँ लगे महि परन ॥
चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान ॥
भट कटत तन सत
खंड। पुनि उठत करि पाषंड ॥
नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड ॥
खग कंक
काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल ॥
कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं ॥
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर
भुज सिरा।
जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा ॥
अंतावरीं गहि उड़त
गीध पिसाच कर गहि धावहीं ॥
संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं ॥
मारे
पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।
अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे
॥
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर
डारहीं ॥
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।
दस दस बिसिख उर माझ
मारे सकल निसिचर नायका ॥
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।
सुर डरत
चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी ॥
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर
यो।
देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर यो ॥
(दोहा)
राम राम कहि तनु तजहिं
पावहिं पद निर्बान।
करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ॥ २०(क) ॥
हरषित बरषहिं
सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।
अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान ॥ २०(ख) ॥
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