गोस्वामी तुलसीदास विरचित

 

Ramcharitmanas

 

ભાવાત્મક પદ્યાનુવાદ  - શ્રી યોગેશ્વરજી

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अयोध्याकांड

   
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Bharat's journey to Chitrakoot

 

(चौपाई)

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू ॥

रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी ॥ १ ॥

प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ ॥

चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई ॥ २ ॥

आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें ॥

तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें ॥ ३ ॥

सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा ॥

जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा ॥ ४ ॥

(दोहा)   

मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।

देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ ॥ २२१ ॥

 

People reacts to Bharat's voyage

 

(चौपाई)

कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं ॥

बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली ॥ १ ॥

बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा ॥

नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा ॥ २ ॥

तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी ॥

तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी ३ ॥

कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू ॥

भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी ॥ ४ ॥

(दोहा)   

चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।

जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु ॥ २२२ ॥

 

   

People lauds Bharat's action

 

(चौपाई)

भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू ॥

जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई ॥ १ ॥

हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें ॥

सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं ॥ २ ॥

कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन ॥

कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी ॥ ३ ॥

बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा ॥

अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा ॥ ४ ॥

(दोहा)   

भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।

जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु ॥ २२३ ॥

 

 
 

 

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