गोस्वामी तुलसीदास विरचित

 

Ramcharitmanas

 

ભાવાત્મક પદ્યાનુવાદ  - શ્રી યોગેશ્વરજી

<< HOME | ADHYATMA | AUDIO | BOOKS | BHAJANS | KAVITAMAHABHARAT | RAMAYAN | SARAL GITA | UPANISHAD | MORE >>

 

बालकांड

   
< BACK

Bal Kand

NEXT >

Naradji blames Lord Vishnu

 

(चौपाई)

पुनि जल दीख रूप निज पावा । तदपि हृदयँ संतोष न आवा ॥
फरकत अधर कोप मन माहीं । सपदी चले कमलापति पाहीं ॥ १ ॥
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई । जगत मोर उपहास कराई ॥
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी । संग रमा सोइ राजकुमारी ॥ २ ॥
बोले मधुर बचन सुरसाईं । मुनि कहँ चले बिकल की नाईं ॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा । माया बस न रहा मन बोधा ॥ ३ ॥
पर संपदा सकहु नहिं देखी । तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी ॥
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु । सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु ॥ ४ ॥
(दोहा)

असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु ।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु ॥ १३६
 

Narad's curses Lord to face similar consequences

 

(चौपाई)

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई ॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू । बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू ॥ १ ॥
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू । अति असंक मन सदा उछाहू ॥
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा । अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा ॥ २ ॥
भले भवन अब बायन दीन्हा । पावहुगे फल आपन कीन्हा ॥
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा । सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा ॥ ३ ॥
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी । करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी ॥
मम अपकार कीन्ही तुम्ह भारी । नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी ॥ ४ ॥
(दोहा)

श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि ।
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि ॥ १३७ ॥
 

 
 

 

| Home | Adhyatma | Shri Yogeshwarji | Maa Sarveshwari | SarvaMangal | Swargarohan |  Site Map | News |

|Audio/video| Books | Contacts | Download | FAQ | Feedback | Glossary | Guest Book | Links | Photo Gallery | Search | What's New? |

Copyright © 2002-2008 by Swargarohan, Danta Road, Ambaji, North Gujarat, INDIA.  All Rights reserved. See Disclaimer