गोस्वामी तुलसीदास विरचित

 

Ramcharitmanas

 

ભાવાત્મક પદ્યાનુવાદ  - શ્રી યોગેશ્વરજી

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बालकांड

   
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Bal Kand

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Lord Vishnu withdraws his maya, makes Narada realise

 

(चौपाई)

जब हरि माया दूरि निवारी । नहिं तहँ रमा न राजकुमारी ॥
तब मुनि अति सभीत हरि चरना । गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥ १ ॥
मृषा होउ मम श्राप कृपाला । मम इच्छा कह दीनदयाला ॥
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे । कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे ॥ २ ॥
जपहु जाइ संकर सत नामा । होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा ॥
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें । असि परतीति तजहु जनि भोरें ॥ ३ ॥
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी । सो न पाव मुनि भगति हमारी ॥
अस उर धरि महि बिचरहु जाई । अब न तुम्हहि माया निअराई ॥ ४ ॥
(दोहा)

बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान ॥
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान ॥ १३८ ॥
 

Narada modifies his curse for Shiva's aide

 

(चौपाई)

हर गन मुनिहि जात पथ देखी । बिगतमोह मन हरष बिसेषी ॥
अति सभीत नारद पहिं आए । गहि पद आरत बचन सुनाए ॥ १ ॥
हर गन हम न बिप्र मुनिराया । बड़ अपराध कीन्ह फल पाया ॥
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला । बोले नारद दीनदयाला ॥ २ ॥
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ । बैभव बिपुल तेज बल होऊ ॥
भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ।धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥३॥
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा । होइहहु मुकुत न पुनि संसारा ॥
चले जुगल मुनि पद सिर नाई । भए निसाचर कालहि पाई ॥ ४ ॥
(दोहा)

एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार
सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार ॥ १३९ ॥
 

 
 

 

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