गोस्वामी तुलसीदास विरचित

 

Ramcharitmanas

 

ભાવાત્મક પદ્યાનુવાદ  - શ્રી યોગેશ્વરજી

<< HOME | ADHYATMA | AUDIO | BOOKS | BHAJANS | KAVITAMAHABHARAT | RAMAYAN | SARAL GITA | UPANISHAD | MORE >>

 

बालकांड

   
< BACK

Bal Kand

NEXT >

Hunt elopes King and takes him into the deep

 

(चौपाई)

आवत देखि अधिक रव बाजी । चलेउ बराह मरुत गति भाजी ॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना । महि मिलि गयउ बिलोकत बाना ॥ १ ॥
तकि तकि तीर महीस चलावा । करि छल सुअर सरीर बचावा ॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा । रिस बस भूप चलेउ संग लागा ॥ २ ॥
गयउ दूरि घन गहन बराहू । जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू ॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू । तदपि न मृग मग तजइ नरेसू ॥ ३ ॥
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा । भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा ॥
अगम देखि नृप अति पछिताई । फिरेउ महाबन परेउ भुलाई ॥ ४ ॥
(दोहा)

खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत ।
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत ॥ १५७ ॥
 

King reaches an unknown place

 

(चौपाई)

फिरत बिपिन आश्रम एक देखा । तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा ॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई । समर सेन तजि गयउ पराई ॥ १ ॥
समय प्रतापभानु कर जानी । आपन अति असमय अनुमानी ॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी । मिला न राजहि नृप अभिमानी ॥ २ ॥
रिस उर मारि रंक जिमि राजा । बिपिन बसइ तापस कें साजा ॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा । यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा ॥ ३ ॥
राउ तृषित नहि सो पहिचाना । देखि सुबेष महामुनि जाना ॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा । परम चतुर न कहेउ निज नामा ॥ ४ ॥
(दोहा)

भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ ।
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ ॥ १५८ ॥
 

 
 

 

| Home | Adhyatma | Shri Yogeshwarji | Maa Sarveshwari | SarvaMangal | Swargarohan |  Site Map | News |

|Audio/video| Books | Contacts | Download | FAQ | Feedback | Glossary | Guest Book | Links | Photo Gallery | Search | What's New? |

Copyright © 2002-2008 by Swargarohan, Danta Road, Ambaji, North Gujarat, INDIA.  All Rights reserved. See Disclaimer