गोस्वामी तुलसीदास विरचित

 

Ramcharitmanas

 

ભાવાત્મક પદ્યાનુવાદ  - શ્રી યોગેશ્વરજી

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लंकाकांड

   
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Lanka Kand

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The attack on Lanka

 

(चौपाई)

भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे ॥

कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता ॥ १ ॥

निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना ॥

मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई ॥ २ ॥

पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा ॥

कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा ॥ ३ ॥

भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता ॥

दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना ॥ ४ ॥

(दोहा)

अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल।

रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल ॥ ४३ ॥

 

યુદ્ધનું વર્ણન

 

(चौपाई)

जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर ॥

रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहि कोसलाधीस दोहाई ॥ १ ॥

कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा ॥

नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती ॥ २ ॥

कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं ॥

पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा ॥ ३ ॥

गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी ॥

काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू ॥ ४ ॥

(दोहा)

एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड।

रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड ॥ ४४ ॥

 

 
 

 

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