Thursday, May 17, 2012
   
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रमण महर्षि के दर्शन

सन १९४५ के माघ मास में अमदावाद से मैं हिमालय जाने के लिये निकला । उस वक्त कडाके की सर्दी थी । रास्ते में मुझे ठंड ने झपट लिया । मैने सोचा की अगर मार्ग में इतनी सर्दी है तो हिमालय में मेरा क्या होगा? और जब मैं सरोडा रहकर साधना कर सकता हूँ तो हिमालय जाने की क्या आवश्यकता है ? विचारों ने मेरा पीछा नहीं छोडा । मनोमंथन के बाद मैंने तय किया की अभी हिमालय जाना उचित नहीं है । इसलिये मैं दिल्ली उतरा और वापिस ट्रेन पकडकर अहमदाबाद आया ।

मजे की बात तो तब हुई जब सरोडा आकर मैंने साधना के लिये आसन जमाया । मुझे फौरन लगा की सरोडा का वायुमंडल हिमालय जैसा नहीं है । भीतर से आवाज आयी, 'कहाँ ऋषिमुनिओं की तपस्याभूमि और योगीओं का क्रीडास्थल हिमालय और कहाँ सरोडा गाँव । तेरे लिये हिमालय जाकर तपस्या करना ही ठीक रहेगा ।'

अंतरात्त्मा की आवाज बुलंद होती है, उसके आगे तर्क या दलील करना फिजूल है । मैंने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार कर लिया । फिर सोचा, अब जब सरोडा आ ही गया हूँ तो क्यूँ न कुछ देर यहाँ ठहरने के बाद हिमालय जाउँ ? तब ठंड भी कम हो जायेगी ।

सर्वसमर्पण करनेवाले साधक को ठंड या किसी अन्य मुसीबत से डरने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करता है । उसे तो केवल आत्मा की आवाज सुनकर अपने मार्ग पर डटे रहेना है । ईश्वर की प्रेरणा बिना वजह नहीं होती । मैंने सोचा, दिल्ली से मुझे यहाँ वापिस लाने के पीछे निश्चित उसकी कोई योजना होगी, और इसका अनुभव मुझे कुछ ही दिनों में हो गया ।

मेरे मन में विचार आया की मेरे पास वक्त है, तो क्यूँ न मद्रास जाकर रमण महर्षि के दर्शन किये जाय ? मैंने महर्षि के बारे में काफि कुछ सुना था, पढा भी था । उनके दर्शन की ईच्छा प्रबल हुई तो मैंने रमणाश्रम जानेका फैंसला किया ।

दिल्ली से सरोडा आये हुए तकरीबन एक मास हो चुका था । अब मेरी तबियत भी ठीक हो गई थी । सरोडा से मैं बडौदा आया । जब मैंने रमणाश्रम आने की बात की तो स्नेही गिरधरभाई मेरे साथ चलने के लिये राजी हो गए और हम रमणाश्रम के लिये रवाना हुए । ठीक ही कहा गया है की 'होवत सोही जो राम रची राखा' । अर्थात् आदमी लाख चाहे मगर होनी को टाल नहीं सकता । यह जानते हुए भी की सब ईश्वर का किया-कराया है, आदमी घटनाक्रम से खुश नहीं रहेता । अगर वो एसा कर पाता है तो उसे दुःख, परिताप और क्लेश से छुट्टी मिल जाती । मगर एसा क्यूँ नहीं होता ? जैसे बंदरीयाँ के साथ उसका बच्चा जुडा रहता है, उसी तरह आदमी के साथ उसका अहंकार । अगर आदमी अपने अहं से मुक्ति पा लें तो उसकी बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा । हाँ, प्रत्येक घटना को ईश्वर की ईच्छा मानकर चलना बहुत कठिन है ।

जब हम रमणाश्रम पहुँचे तो सुबह का वक्त था । सरसामान ठिकाने पर रखने के बाद हम महर्षि के दर्शन के लिये गये । तीन-चार लोग महर्षि के दर्शन-वंदन हेतु कतार में खड़े थे । बारी-बारी उन्होंने महर्षि को साष्टांग दंडवत किया । हमने भी महर्षि को प्रणाम किया और अपना स्थान ग्रहण किया । महर्षि कोच पर बैठे थे । कमरे में करीब तीस-चालीस दर्शनाथी थे । सबकी नजर महर्षि की ओर थी । महर्षि कुछ पढ रहे थे । कुछ देर पढने के बाद उन्होंने दर्शनार्थीओं की ओर देखा ।

महर्षि की उम्र उनके चहेरे पर साफ दिखाई पडती थी । उनका मस्तक थोडा कांप रहा था, मगर उनके चहेरे पर गहेरी शांति तथा निर्विकारीता थी । उनको देखकर लगता था की वे अपने आत्मस्वरूप में डूबे है । अन्य महात्माओं की तुलना में महर्षि का व्यक्तित्व इतना प्रभावी नहीं लगा मगर उनकी शांत मुखमुद्रा उनकी महानता के बारे में बहुत कुछ बता रही थी । महात्माओं को सिर्फ बाह्य दिखावे से नापना गलत होगा । उनकी आत्मिक अवस्था का निरीक्षण-परीक्षण करना अति आवश्यक है ।

जब मैं महर्षि के पास गया तब मेरे मन में कुछ विचार चल रहे थे । जैसे की मैं पूर्व बता चूका हूँ, महर्षि ने उत्तरकाशी में ध्यानावस्था में मुझे दर्शन दिये थे । वे मुझे रमणाश्रम ले गये थे, जहाँ उन्होंने मेरा प्रेमपूर्ण सत्कार किया था । हमारे बीच कुछ बातें भी हुई थी । इसलिये मुझे लगा था की शायद प्रत्यक्ष मिलने पर महर्षि मुझे पहचान लेंगे और मेरा स्वागत करेंगे । मगर एसा कुछ हुआ नहीं ।

आत्मानंद में स्थित रहनेवाले महापुरुष सभी जगह परमात्मा के दर्शन करते हैं । उनके लिये सभी जीव अपने ही स्वरूप है इसलिये वे किसका सत्कार करें और किसका न करें ? भेददर्शन तथा उससे आविर्भूत सर्व भावों का अस्तित्व हमारी दुनिया में हैं, मगर जो इन सबसे पर हैं, उनके लिये कौन अपना और कौन पराया ? एसे महापुरुष तो सबके होते हैं और सब उनके । महर्षि दयानंद, चैतन्य महाप्रभु, गुरु नानक, रामकृष्ण परमहंस, बुद्ध, विवेकानंद आदि एसे महापुरुष थे । उनका सही परिचय हमें उनके विचारों से, उनकी पवित्रता, निर्ममता, तथा अनासक्ति से मिलता है । हमारा सौभाग्य है की एसे महापुरुष हमारे देश में आज भी है । गंगोत्री स्थित कृष्णाश्रमजी इसका उदाहरण है । हालांकि रमण महर्षि और कृष्णाश्रमजी का व्यक्तित्व भिन्न हैं, और दोनों की तुलना करने का मेरा कोई ईरादा नहीं है । फिर भी दोनों की बाह्य उदासीनता तथा आत्मिक शांति हमें आभास कराती हैं की हम कोई वेदकालीन महात्मा-पुरुष की संनिधि में बैठें हैं । वे हमें प्यार से बुलाये या न बुलायें, हमारा स्वागत करें या न करें, हमें उन्हें गलत नहीं समजना चाहिए ।

रमणाश्रम आते वक्त मेरे मन में कुछ विचार चल रहे थे । मैं हिमालय-से वापिस लौटा था और मन-ही-मन सोच रहा था की अगर महर्षि अनुमति दे तो रमणाश्रम में दो-तीन साल रहकर साधना करूँ । मगर बात कुछ उलटी हुई । जैसे ही प्रणाम करके मैं महर्षि के सन्मुख बैठा, मेरे दिल में विचारों का घमासान उठा । मानों मुझे अंतःस्फुरणा हुई की मैं आश्रम में रहने का खयाल छोड दूँ । मेरे लिये हिमालय जाना ही ठीक है । वहाँ जाकर मैं आवश्यक साधना करूँ और आध्यात्मिक विकास के सर्वोच्च शिखर सर करूँ । हिमालय में ही मुझे पूर्णता, शांति और मुक्ति का अनुभव होगा । बस फिर क्या कहेना, मैने फौरन रमणाश्रम छोडकर वापिस जाने का निश्चय किया ।

स्नानादि से निवृत होकर भोजन किया, विश्राम किया और दोपहर के बाद रमणाश्रम को अलविदा कहा । मेरे निर्णय से गिरधरभाई को आश्चर्य जरुर हुआ मगर उन्होंने किसी प्रकार का विरोध प्रकट नहीं किया । मेरी बात सुनकर उन्हें प्रसन्नता हुई । बंबई आने के लिये हम निकल पडें ।

वक्त के चलते आज मुझे समज में आता है की वो निर्णय कितना सही था । हिमालय के पुराणप्रसिद्ध, ऋषिमुनीसेवित, पवित्र पुण्यप्रदेश में रहकर मुझे साधना करनी थी । शायद ईश्वर की यही ईच्छा थी इसलिये उसने मुझे प्रेरणा दी थी । ईश्वर की मंगलमय इच्छा का, उसकी योजना का और उसकी करुणा से भरी अहेतुकी अनुग्रहवर्षा का जयजयकार हो!

 

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In prayer, it is better to have a heart without words than to have words without a heart.
- Mahatma Gandhi 
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