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पुरुषार्थ

प्रश्न – तुलसी कृत ‘रामचरितमानस’ में सुग्रीव श्रीराम को कहता है कि राज्यसुख प्राप्त होने पर मैं आलसी बनकर आपको भूल गया यह मेरी सबसे बडी भूल थी । इस जगत में जो काम, क्रोध, मद, मोह एवं अहंकार रूपी दूषण हैं उनको कोई विरल भाग्यवान पुरुष ही, यदि आपकी कृपा हो तो, जीत सकता है । तो क्या बिना ईश्वर की कृपा के उन दोषों को जीत ही नहीं सकते ॽ मनुष्य के व्यक्तिगत पुरुषार्थ का क्या कोई मूल्य नहीं है ॽ
उत्तर – मनुष्य के व्यक्तिगत स्वतंत्र पुरुषार्थ का कोई मूल्य ही नहीं है ऐसा तो किसी भी धर्मशास्त्र में नहीं लिखा गया और रामायण के रचयिता तुलसीदास भी ऐसा कहाँ कहते हैं ॽ रामायण में कुछ जगह पे वे जीवन की सार्थकता के लिए पुरुषार्थ करने का आदेश देते हैं । वे उस प्रसिद्ध चोपाई में इसी बात को प्रतिबिंबित करते हुए कहते हैं – ‘बड़े भाग मानुष तन पावा ।’ अर्थात् मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से ही मिलता है । ऐसे साधनों के धाम और मोक्ष के द्वार समान मानवशरीर को प्राप्त कर जो केवल संसार के भोगोंपभोगों में ही डूबा रहता है और मुक्ति, शांति व परमात्मा को पाने का प्रयत्न नहीं करता वह दुःखी होता है, बाद में पछताता है और काल को, कर्म को और ईश्वर को दोषित मानता रहता है । उनके इस कथन में भी मनुष्य को अपने आत्मविश्वास या श्रेय के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए ऐसा सूचित किया गया है । उसे आलसी बनकर दो हाथ जोड़कर निठल्ले बनकर बैठे रहना चाहिए ऐसा कहीं भी नहीं कहा गया ।

प्रश्न – तो फिर सुग्रीव के मुख में जो शब्द रखे गये हैं, उनका क्या मतलब है ॽ आप जो कहते हैं वह बात यदि सच्ची है तो सुग्रीव के ये शब्द क्या विरोधाभासी नहीं लगते ॽ ईश्वर की कृपा पर ही संपूर्ण रूप से आधार रखने का वे नहीं सिखाते ॽ
उत्तर – मैं ऐसा नहीं मानता । सुग्रीव के शब्द उसकी फितरत के अनुसार ही बोले गये है । इन शब्दों में पूर्णतया नम्रता निहित है । जीवन में जो कुछ अच्छा होता है या हासिल होता है उसका यश सिर्फ ईश्वर को ही दिया जाए और केवल ईश्वर की कृपा से ही वह होता है या प्राप्त होता है ऐसा विश्वास रखने में कुछ कम निरभिमानता या नम्रता की आवश्यकता नहीं पड़ती । महापुरुष जब अपनी सिद्धि या सफलता के बारे में उल्लेख करने का वक्त आता है तब ऐसी ही भाषा में लिखते या बोलते होते हैं । दूसरे भी ऐसा लिखें या बोलें यह अभिनंदनीय है परन्तु इसका उलटा अर्थ या भावार्थ लेकर दीनहीन, आलसी और नाचीज़ बनने लगे और इसमें गौरव का अनुभव करने लगे तो ऐसी पध्धति किसीको भी उपयोगी सिद्ध नहीं होगी । ईश्वर की कृपा हम पर है ही और अधिक से अधिक होगी ही ऐसा मानकर अपने दूषणों को मिटाने का पुरुषार्थ करें तो न्यूनाधिक रूप में अवश्य सफल व कामयाब होंगे इसमें कोई सन्देह नहीं ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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