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ध्यान की पद्धति

प्रश्न - ध्यान की प्रक्रिया कैसे करें, इसके बारे में कुछ बतायेंगे ॽ
उत्तर – ध्यान की प्रक्रिया के लिए शिवपुराण में आवश्यक सूचनाएँ दी गयी है ।
भगवान शंकरने दुर्वासा मुनि से कहा – हे मुनि, मुक्ति के मंदिर के द्वार को खोल देनेवाले ध्यानयोग की विधि मैं तुम्हें सुनाता हूँ, उसे ध्यान से सुनिए । योग की रुचिवाले पुरुष को सबसे पहले गुरुको प्रणाम करते हुए प्रार्थना या मंत्र का आधार लेके प्राणायाम करना चाहिए । पद्मासन, स्वस्तिकासन, वज्रासन या अन्य किसी आसन का सहारा लेकर स्थिर रूप से बैठना चाहिए और उसे मन एवं प्राण को शांत करने का प्रयास करना चाहिए । इन्द्रियों में मन प्रधान है तथा प्रेरणा प्रदान करनेवाला है इसलिए उसे बाह्य विषयों में जाने से रोकना चाहिए । प्राण एवं मन को ब्रह्मरंध्र या भ्रूमध्य में जोड़कर ॐ का उच्चारण करके अंतःकरण को आत्मा में धारण करना चाहिए ।
ध्यानयोग के साधक को निरोगी रहना चाहिए और अल्पाहार करना चाहिए, क्रोध का त्याग करना चाहिए और आत्मा के चिंतन-मनन में दिलचस्पी रखनी चाहिए । वैराग्य को दृढ करने के लिये आत्मा और शरीर के नित्यानित्य का विचार करना चाहिए । शुक्र और रक्त से उत्पन्न होनेवाला, मज्जा, मेद और अस्थि से भरा हुआ, नाडी समूह से घिरा हुआ, नवद्वारयुक्त, मलमूत्र की बदबूवाला, जन्म-मरण व व्याधि से ग्रसित शरीर अनित्य है । इसलिए उसमें प्रीति और आसक्ति न करनी चाहिए ।
(शिवपुराण अध्याय ३५)

प्रश्न – ध्यान करते वक्त जिस परमात्मा का ध्यान किया जाता है उससे हम भिन्न हैं ऐसा मानना चाहिए या अभिन्न हैं यह समझना चाहिए ॽ
उत्तर – परमात्मा से अगर आप संपूर्ण भिन्नता रखते हों तो आप उनका ध्यान नहीं कर सकते । उस अवस्था में ध्यान की साधना करने का कोई अर्थ या प्रयोजन नहीं है । ईश्वर-साक्षात्कार के लिए तो ध्यान किया जाता है । उस परमात्मा के साथ आप अभेद एवं एकता की अनुभूति करते हैं फिर ध्यान करने का अर्थ क्या रहेगा ॽ अतएव हकीकत यह है कि जिस परमात्मा का ध्यान किया जाता है उसके साथ ज्ञान की दृष्टि से मूलभूत एकता है ऐसा मानिए । साथ ही व्यावहारिक रूप में अथवा वास्तविक रूप में उस परमात्मा के साथ भिन्नता का स्वीकार भी कीजिए । ध्यान मार्ग का साधक वर्तमान भेदभाव का स्वीकार करके ही उसको मिटाने के लिए प्रयत्न करता है और उसमें आगे बढ़ता है । उस भेदभाव को मिटाने पर ही और अभेद सिध्ध करने से ही उसको शांति मिलती है । अतएव मेरा अपना मत तो यही है कि परमात्मा के साथ भिन्नता एवं अभिन्नता दोनोंका ख़्याल साधक को रखना चाहिए ।

प्रश्न – ध्यान में मूर्ति या मंत्र का आधार लेना आवश्यक है क्या ॽ
उत्तर – इस प्रश्न का उत्तर ध्यान करने की योग्यता या भूमिका पर अवलंबित है । यदि मूर्ति या मंत्र का आधार लिए बिना मन को स्थिर या शांत बनाया जा सकता है तो उसका आधार लेने की कोई जरूरत नहीं रहती । किन्तु अधिकांश साधक किसी भी प्रकार के आधार के बिना मन को स्थिर नहीं कर सकते इसीलिए आरंभ में किसी मूर्ति या मंत्र का सहारा लेकर आगे बढ़ना उनके लिए जरूरी बन जाता है । फिर भी जिंदगीभर उस आधार की जरूरत नहीं बनी रहती । अन्ततः तो साधक को सभी प्रकार के बाह्य आलंबनों से मुक्ति प्राप्त करनी है और उसे आत्मानंद में तल्लीन हो जाना सीखना है । वह अवस्था प्रयत्नसाध्य है ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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We judge ourselves by what we feel capable of doing, while others judge us by what we already have done.
- Longfellow

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