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सबकी मुक्ति में अपनी मुक्ति

प्रश्न – कुछ लोकसेवक, नेतागण एवं राजपुरुष मुक्ति के लिए की जानेवाली साधना को स्वार्थी मानते हैं और कहते हैं कि मनुष्य को समाज की सेवा करने के लिए आगे आना चाहिए । यही सच्चा धर्म है और सबकी मुक्तिमें ही मनुष्यकी अपनी मुक्ति है । इस बारे में आपकी क्या राय है ॽ वैयक्तिक मुक्ति या विकास की साधना क्या स्वार्थी या संकुचित विचार से प्रेरित साधना है ऐसा आपको नहीं लगता ॽ उनको यह साधना पसन्द ही नहीं है इतना ही नहीं उसके प्रति उनकी तीव्र नफरत है ।
उत्तर – यदि नफरत है तो उसमें उसका अज्ञान निहित है । किसी प्रकार के पूर्वग्रह से प्रेरित होकर अगर वे साधना के बारे में सोचेंगे तो नतीजा यही आएगा । लेकिन अगर वे पूर्वग्रह से मुक्त होकर विशाल एवं तटस्थ दृष्टि से सोचेंगे तो उनको अपनी गलती समझमें आ जाएगी यह बात बिलकुल स्पष्ट है ।

प्रश्न – वह कैसे ॽ वे लोग तो अपने विधान पर ही डटे रहेंगे ।
उत्तर – इससे क्या हुआ ॽ मुक्ति या आत्मविकास की साधना स्वार्थी या संकुचित दृष्टि से प्रेरित है ऐसा मैं नहीं मानता । भारतीय संस्कृतिने जीवन की सफलता के लिए जो मंत्र दिया है उसमें दो प्रकार के भाव समाविष्ट है । एक भाव तो ‘स्वान्तः सुखाय’ का है अर्थात् अपने निजी जीवनको अधिक से अधिक सत्वशील, उदात्त तथा उत्तम बनाना और आत्मिक शांति प्राप्त करना । दूसरा भाव ‘परजनहिताय’ का है अर्थात् दूसरों के हितके लिए काम करना । इन दोनों भावों को जीवन में ओतप्रोत करना है, तभी पूर्ण और सफल जीवन की प्राप्ति होगी । ये दोनों भाव परस्पर विरोधी नहीं अपितु सहायक है और पंछी के पर की भांति जीवन से अभिन्न है । इन दोनों भावों को जीवन में मूर्त (साकार) बनाने का प्रयास किया जाये तो व्यक्तिगत या समष्टिगत जीवन सुखमय, शांतिमय और सर्वोत्तम बन सके । तंदुरस्त या सुसंस्कृत समाज इन दोनों भावोंमें से किसी एक भाव की उपेक्षा न कर सके और उसके प्रति उदासीन न हो सके ।

प्रश्न – आपने इन दोनों भावों को ओतप्रोत या अभिन्न बताये, ये देख मुझे अचरज हुआ क्योंकि इन भावों को बिलकुल अलग या विभिन्न माना जाता है ।
उत्तर – इस मान्यता में मुझे विचारदोष मालूम होता है । यह मान्यता अधूरी एवं हानिकर है । इस मान्यताने समाज का बेसुमार नुकसान किया है अतएव उसका त्याग करना चाहिए । इस मान्यता में भारतीय संस्कृति का सही सन्देश समाविष्ट नहीं हुआ है । इस सन्देश अनुसार चले तो जीवन का स्वरूप ही बदल जाय और अलग ही हो जाए । क्या आप नहीं जानते कि आत्मशुद्धि या आत्मविकास से रहित सेवकों में अहंता, स्वार्थवृत्ति, भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति की लालसा, स्पर्धा और पदप्रतिष्ठा की कामना होती है ॽ फिर दूसरे लोग भी उसी तरह सोचने लगते है । इससे जनजीवन प्रभावित होता है और फलतः समाज की सुरक्षामें बाधा उत्पन्न होती है । उन्हें वैयक्तिक साधना करके निजी व समाज के श्रेय के लिए शुद्धि प्राप्त करने की आवश्यकता है । इससे विपरीत, जीवन में आत्मविकास को ही सर्वस्व माननेवाले लोगों को अपनी प्राप्त परिस्थितियों में रहकर निजी उन्नति करने के साथ ही, दूसरों को सहायता करने की कोशिश करनी चाहिए । जीवन और जीवन का जो कुछ प्राप्तव्य है वह सब अपने वैयक्तिक लाभ, विकास एवं मोक्ष की सिद्धि के साथसाथ समाज के कल्याण एवं समृद्धि के लिए भी है इतना सत्य उन्हें समझ लेना चाहिए । अगर ऐसा हो जाए तो ये दोनों भाव या उसकी विचारधारा के बीच का विरोध टल सकता है । इससे दोनों भावों के प्रति या किसी एक के प्रति जो नफरत है वह मिट जाए, दोनों को एक समान समझकर उनके प्रति आदरभाव हो सके और व्यक्ति या समष्टि के प्रति दोनों महत्वपूर्ण योगदान दे सके ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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- Publilius Syrus

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