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आत्मसाक्षात्कारी संतो का समागम

प्रश्न – वर्तमान भारत में आत्मसाक्षात्कार प्राप्त अथवा योगसाधना द्वारा सर्वोत्तम सिद्धि-प्राप्त महात्मा-पुरुष विद्यमान हैं या उनका सर्वथा अभाव है ॽ आजसे कुछ साल पहले पोल ब्रन्टन महोदय भारतवर्ष की मुलाकात के लिये आये थे । उन्होंने कतिपय कृतकाय महापुरुषों के दर्शन किये थे जिनका उल्लेख उन्होंने अपनी ‘सर्च इन सिक्रेट इन्डिया’ नामक किताब में किया है । ऐसे लोकोत्तर पुरुष आज भारत में मौजुद हैं क्या ॽ वक्त के गुजरने के साथ वे विलीन तो नहीं हो गये हैं न ॽ
उत्तर – नहीं, वे विलीन नहीं हो गये अपितु आज भी हैं । ऐसे लोकोत्तर पुरुषों का अस्तित्त्व भारत में हमेशा से रहा है । इसीके कारण भारत स्तुत्य रहा है । आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति करनेवाले, चिंतनशील एवं स्वानुभवसंपन्न, शास्त्र तथा जीवनोत्कर्ष की साधना के साकार स्वरुप समान संतपुरुषों के कारण भारतभूमि यशस्वी है, गौरवान्वित है, यह कहने में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है । पोल ब्रन्टन जिन महापुरुषों से मिले थे वे तो विशाल जलधि की कुछ उत्तुंग लहरें थी । इससे देशमें उस वक्त उतने ही कृतकाम संतपुरुष थे ऐसा हमें नहीं समझना है । दूसरे कई संतमहात्मा उस समय इस देशमें विद्यमान थे और आज भी हैं । उनका सर्वथा अभाव कभी भी नहीं रहा और आज भी नहीं है । अगर उनके दर्शन की उत्कट अभिलाषा कोई करे तो वह उनके दर्शन आज भी कर सकता है और उनसे उचित पथ-प्रदर्शन भी प्राप्त कर सकता है ।

प्रश्न – ऐसे कृतकाम महापुरुषों का समागम केवल इच्छा करने से ही हो सकता है या इसके लिए कोई विशेष प्रयत्न करना पड़ता है ॽ
उत्तर – क्या आप नहीं जानते कि तीव्र इच्छा में कितना सामर्थ्य है ॽ प्रबल इच्छा या उत्कट अभिलाषा के राज़ को यदि आप जानते होते तो ऐसा प्रश्न कभी नहीं पूछते । तीव्र इच्छा का मानी है अंतरमन में से आविर्भूत अनिवार्य, अमिट एवं अनवरत अभीप्सा । उसे ही लगन या तरस कहते हैं । अगर वह किसी तरह जग जाये तो महापुरुषों की मुलाकात अवश्य हो जाए । इसके अलावा दूसरा कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना है । या यूँ कहो कि दूसरे छोटे-मोटे प्रयास हों उनके मूल में अदम्य एवं अति उत्कट इच्छा होनी चाहिए तभी अभीष्ट मनोरथ की पूर्ति हो सकेगी । ऐसे महापुरुषों के मिलाप के लिए आपको पोल ब्रन्टन की तरह भारत वर्ष की चारों दिशाओं में घूमना ही पड़ेगा ऐसा नहीं है । इच्छा उत्कट हो जाने पर, हृदय उनके दर्शन के लिए लालायित होने पर, और साधना की निश्चित भूमिका पर आरूढ होने पर आपको कृतार्थ या सफल मनोरथ बनाने के लिए वे खुद आपके सामने प्रकट हो जाएँगे और आपको शांति प्रदान करेंगे । विकास की निश्चित कक्षा पर पहुँचने के बाद आप में और उनमें ऐसा अंतरंग संबंध प्रस्थापित हो जाएगा कि वे आपको बार-बार अथवा तो इच्छानुसार मिलते रहेंगे । उस वक्त आपको अवर्णनीय आनंद होगा ।

प्रश्न – आप कहते हैं विकास की अमुक कक्षा पर पहुँचने के बाद महापुरुषों से संबंध स्थापित हो जाएगा तो वह विकास कैसा होगा उसकी रुपरेखा बताएँगे आप ॽ
उत्तर – उस विकास में हृदयशुद्धि और उत्तमोत्तम आत्मिक जीवन गुज़ारने की अभीप्सा का समावेश होता है । प्रेमलक्षणा भक्ति भी इसमें योग दे सकती है । अगर आपको योग में दिलचस्पी हो तो संप्रज्ञात समाधि तक पहुँचना चाहिए । ध्यान के नियमित अनवरत अभ्यास के परिणाम स्वरूप प्राप्त समाधि आपके अतीन्द्रिय द्वारको खोल देगी और आपको अनेक असाधारण अनुभव होंगे । फिर आपको लोकोत्तर महापुरुषों का समागम होगा । हाँ, इसके लिए जीवन को सच्चे अर्थ में आध्यात्मिक या साधनामय बनाने की कोशिश करें तभी यह संभव हो सकेगा । केवल बातों से कुछ नहीं होगा ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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From the solemn gloom of the temple, children run out to sit in the dust, God watches them play and forgets the priest.
- Rabindranath Tagore

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