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खेचरी मुद्रा और शांभवी मुद्रा

प्रश्न – खेचरी मुद्रा का मतलब क्या होता है ॽ वह प्रारंभिक अवस्था के साधक को किस तरह सहायक होती है ॽ
उत्तर – खेचरी मुद्रा एक कठिन मुद्रा है जो जीभ की सहायता लेकर की जाती है । जीभ दो प्रकार की होती है – छोटी और लम्बी । छोटी जीभवाले साधक को घर्षण, दोहन जैसी क्रियाओं का आधार लेकर अपनी जीभ को लम्बी करनी पड़ती है । उसके बाद जीभ को पलटाकर या उल्टा करके ताल या तालुप्रदेश पर लगानी पडती है । लम्बी हुई जीभ जब तालु पे लगती है तब एक तरह का मतवाला और बढ़िया स्वाद का अनुभव होता है । प्राणवायु का स्तंभन होने के कारण तथा चित्तवृत्ति का लय होने से समाधि अवस्था का अनुभव होता है । इस अवस्था या मुद्रा का अभ्यास जैसे जैसे बढ़ता जाता है वैसे वैसे अनेक प्रकार की शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है । हालाकि इस मुद्रा की सिद्धि के लिए दीर्घकाल पर्यंत सोत्साह अभ्यास करना आवश्यक है । तदुपरांत अनुभवी सदगुरु के पथप्रदर्शन की भी आवश्यकता रहती है । इतनी जानकारी के बाद आप समझ गये होंगे कि खेचरी मुद्रा की साधना प्रारंभिक साधकों के लिए नहीं है । योगसाधना में भली भाँति तरक्की हासिल किए हुए साधक का ही यह काम है ।
योगसाधना की प्रारंभिक अवस्था में साधक को सदाचारी जीवन जीने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए । इसके साथ ही आसन, प्राणायाम या ध्यान की साधना करनी चाहिए और शांति, शक्ति या प्रेरणा प्राप्त करने के हेतु सत्संग एवं प्रार्थना का नियमित रुप से आधार लेना चाहिए ।

प्रश्न – शास्त्रों में जिसे शांभवी मुद्रा कहा गया हैं वह क्या है ॽ यह मुद्रा कैसे की जाती है ॽ मतलब इसका अभ्यास किस तरह से हो सकता है ॽ
उत्तर – मुद्रा शब्द का प्रयोग एवं मुद्राओं के वैज्ञानिक अभ्यासक्रम का स्वीकार भक्ति एवं ज्ञानमार्ग में नहीं किया गया है किंतु योगमार्ग में योगसाधना में निपुण आचार्यों के द्वारा किया गया है । शांभवी मुद्रा का उल्लेख भी इसमें समाविष्ट है । तड़ागी, खेचरी, योनि तथा महामुद्रा की भाँति शांभवी मुद्रा भी एक महत्वपूर्ण मुद्रा है जिसका उल्लेख योगविद्या के प्राचीन ग्रंथो में किया गया है ।
शांभवी मुद्रा का अभ्यास करने की तमन्नावाले साधक को पद्मासन जैसे किसी विशिष्ट आसन में बैठना चाहिए । तत् पश्चात् बाह्य तर्क-वितर्कों या विचारों से जितना हो सके उतना मुक्त होकर आँखें दोनों भ्रमर के मध्य प्रदेश में अर्थात् योग की परिभाषा में आज्ञाचक्र में स्थिर एकाग्र करनी चाहिए ।

प्रश्न – शांभवी मुद्रा का अभ्यास करते वक्त आँखे खुली रखनी हैं या बन्द ॽ
उत्तर – खुली रखना क्योंकि शांभवी मुद्रा आँखे खुली रखकर ही की जा सकती है ।

प्रश्न – इसी तरह कितना समय तक बैठे रहना है ॽ
उत्तर – इसका आधार साधक की रुचि, दिलचस्पी या अनुकूलता पर रहता है फिर भी इसका अभ्यास करते वक्त जितना भी अधिक समय एक ही आसन में बैठ सके उतना ही अच्छा रहेगा ।

प्रश्न – लेकिन ज्यादा समय तक बैठने पर आँख में दर्द नहीं होगा क्या ॽ
उत्तर – शुरु शुरु में आँख दुखेगी परन्तु बाद में अभ्यास बढ़ता जाएगा फिर आँख में दर्द नहीं होगा । आँख दूखे तब थोड़ा समय अभ्यास छोड़ देना, आँखें बन्द रखना और आराम फरमाना । आराम हो जाने पर फिर अभ्यास प्रारंभ कर देना । इसमें कोई हर्ज नहीं ।

प्रश्न – ऐसे अभ्यास के कारण आँख में पानी पडे तो ॽ
उत्तर – तो क्या ॽ पडने देना । प्रारंभ में पानी पडे भी । बाद में अभ्यास बढ़ने पर ऐसा नहीं होगा ।

प्रश्न – शांभवी मुद्रा का अभ्यास करते वक्त मनको दोनों भ्रमर के बीचमें स्थिर करते वक्त नामजप कर सकते हैं क्या ॽ
उत्तर – अवश्य कर सकते हैं । अगर साधक को नामजप करने में दिलचस्पी हो तो जरुर कर सकते हैं ।

प्रश्न – यदि नामजप ना करना हो तो क्या करें ॽ
उत्तर – नजर को दो भ्रमर के मध्य प्रदेश में स्थापित करके शांति से बैठे रहना और ध्यान करना । शांभवी मुद्रा मनकी विषयगामी बाह्य वृत्ति को प्रतिनिवृत्त करके ध्यान में लगानेवाली मुद्रा है । इसका वर्णन करनेवाले अनुभवसिद्ध आचार्यों ने बताया है कि इस मुद्रा में आँख खुली हो फिर भी मन बाह्य पदार्थों या विषयों में नहीं भटकता । मन की वृत्ति क्रमशः शांत हो जाती है और अन्त में बिलकुल शांत होने पर आँख खुली होती है फिर भी कुछ नहीं देखती । शांभवी मुद्रा साधक को विचारों, विकारों एवं विषयों के उस पार के प्रशांत प्रदेश में प्रवेशित कराती है

प्रश्न – उसका महत्वपूर्ण लाभ क्या है ॽ
उत्तर – मन की परमशांति की अवस्था या समाधि की उपलब्धि, इसके लिए ही वह की जाती है । इसीलिए योग की सुप्रसिद्ध साधना में उसकी महिमा अद्वितीय मानी जाती है ।

प्रश्न – दो भ्रमरों के मध्य में दृष्टिको इस तरह स्थिर करके ध्यान या नामजप करें यह ठीक है अथवा आँख बन्द करके करें ॽ
उत्तर – उत्कट उमंग और उत्साहवाले उच्च कोटि के प्रयोगशील साधकों की बात ही ओर है । वे यदि शांभवी मुद्रा का आधार लेकर दोनों भ्रमर के मध्य प्रदेश में दृष्टि को स्थिर-एकाग्र करके ध्यान या जप करेंगे तो चलेगा । इससे उनको किसी प्रकार का कष्ट नहीं होगा लेकिन अन्य सर्वसाधारण साधकों की दृष्टि से सोचा जाए और उत्तर दिया जाए तो कह सकते हैं कि विशेषतः उनके लिए जप या ध्यान करते समय शांभवी मुद्रा करना उचित न होगा । हम उनको इस मुद्रा करने की सिफारिश नहीं कर सकते । उनके लिए तो आँखे बन्द करके जप या ध्यान के अभ्यास का विधिपूर्वक अभ्यास करना उचित होगा । उससे उनका मन आसानी से स्थिर या एकाग्र हो जाएगा । सिर्फ मुद्रा का अभ्यास करना चाहे तो उसका अभ्यास कर सकते हैं । बाकी आत्मविकास की साधना में तरक्की करने और आत्मशांति की अनुभूति के लिए उसके अभ्यास की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

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