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आत्मानुसंधान और भक्ति

प्रश्न – आत्मा का अनुसंधान श्रेष्ठ है या भक्ति ॽ अर्थात् भगवान की भक्ति उत्तम है या आत्मा का चिंतन-मनन या ध्यान करना उत्तम है ॽ
उत्तर – आपने बहुत अच्छा और अलग तरह का प्रश्न पूछा है । इसके जवाब में मैं यही कहना चाहुँगा कि दोनों श्रेष्ठ हैं और एक समान आशीर्वादरूप एवं उपयोगी है । इनमें से कोई अधिक उत्तम है ऐसा नहीं है । साधक को इन दोनों में से क्या ज्यादा पसन्द आएगा यह उसकी रुचि पर आधारित है । वह अपनी रुचि के मुताबिक किसी एक को या दोनों को पसन्द कर सकता है लेकिन दोनों का महत्व एक समान है ।
शंकराचार्यजी तो आत्मानुसंधान की प्रवृत्ति को ही भक्ति मानते हैं । उनका कहना है कि स्व-स्वरूप का अनुसंधान ही भक्ति है । इसके द्वारा मनुष्य अपने आत्मा या परमात्मा को ही भजता है । भक्ति को आप अलग मानते हैं तो भी इनमें से एक उत्तम और दूसरा अनुत्तम है ऐसा मानना गलत है । आपकी फितरत के मुताबिक आप जिसे पसन्द करेंगे और उसका आधार लेंगे तो वह आपके लिए सर्वोत्तम हो जाएगा और आपका आत्मविकास करनेवाला साबित होगा ।

प्रश्न – आत्मविचार एवं भक्ति अथवा आत्मानुसंधान एवं भक्ति – इन दोनों के परिणाम एक ही है या भिन्न भिन्न ॽ
उत्तर – आत्मानुसंधान से क्या लाभ होता है ॽ इससे मन की स्थिरता सिद्ध होती है और फलतः परमात्मा का साक्षात्कार सहज होता है । इससे परम शांति की प्राप्ति भी हो सकती है । इसी तरह भक्ति द्वारा आप क्या हासिल करना चाहते हैं ॽ इसके अनुष्ठान से भी मन एकाग्र होता है, शांत हो जाता है और ईश्वर-साक्षात्कार की अनुभूति भी कर सकते हैं । हाँ, यह सच है कि वह साक्षात्कार सगुण होता है परंतु यह भी साक्षात्कार ही है । अर्थात् भक्ति एवं आत्मानुसंधान के साधन भिन्न भिन्न होने पर भी इन दोनों का परिणाम एक ही है ।

प्रश्न – तो फिर भक्ति एवं आत्मानुसंधान के साधन में भेद किस प्रकार है ॽ
उत्तर – आत्मानुसंधान में पहले से ही आत्मा को लक्ष्य बनाकर, आत्मा में मन लगाकर, वृत्ति को अंतर्मुख या आत्माभिमुख करके चलना होता है जब कि भक्ति की साधना में मन को ईश्वर की सेवा-पूजा एवं ईश्वर के नाम-स्मरण में जुटाना पड़ता है । भक्ति में भक्त ईश्वर के लिए रोता है, तड़पता है, बेचैन होता है और लगातार प्रार्थना में लीन होता है । आत्मानुसंधान की साधना में अभिरुचि रखनेवाला साधक अपना ज्यादातर वक्त ध्यान में बिताता है तथा मन व बुद्धि तथा देशकाल से परे के प्रदेश में पहुँचने का प्रयत्न करता है । इसी तरह दोनों के साधन में बाह्य दृष्टि से देखने पर भेद नजर आता है पर वास्तव में कोई अंतर नहीं है ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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God, grant me the serenity to accept the things I cannot change, the courage to change the things I can, and the wisdom to know the difference.
- Dr. Reinhold Niebuhr

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