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भक्ति की साधना

प्रश्न – भक्ति की साधना को सर्वोत्तम क्यों कहा जाता है ॽ ज्ञान एवं योग की साधना से उसका स्थान क्या उँचा है ॽ
उत्तर – ज्ञान और योग की साधना से उसका स्थान उँचा है ऐसा तो कैसे कहें ॽ ज्ञान भक्ति एवं योग – इन तीनों प्रकार की साधना साधना ही है । इनमें से कोई उत्तम और दूसरी अधम, कोई असाधारण है या साधारण ऐसा प्रश्न ही नहीं है । सभी साधना एक समान उपयोगी है और एक समान शक्ति एवं शक्यता युक्त है । अर्थात् सभी साधनाओं के प्रति समान आदर से देखने की आवश्यकता है । भक्ति की साधना को सर्वोत्तम माना जाए तो भी योगीजन योग-साधना को और ज्ञानीजन ज्ञान की साधना को इसी तरह सर्वोत्तम मानते हैं । इसका कारण यह है कि उनका इन साधनाओं के बारे में प्रेम और आदरभाव है । इसलिए किसीको भी उँचनीच के व्यर्थ वादविवाद में नहीं उलझना है और साधक को तो बिलकुल भी नहीं ।

प्रश्न – तो फिर भक्ति सब साधनाओं में उत्तम है ऐसा कहने की प्रणाली कैसे पड़ गई ॽ
उत्तर – उसका कारण जरा अलग है । भक्ति में योग या ज्ञान जैसे अन्य साधनाओं की तुलनामें जो ध्यान देने योग्य विशेषताएँ हैं वही उसमें कारणभूत है । इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखकर देवर्षि नारद प्रभृति महान, महासमर्थ ईश्वर-कृपापात्र संतने अपने भक्ति-सूत्रों में ‘सा तु ज्ञानकर्मेभ्योडधिकतरा’ लिखा है । अर्थात् भक्ति ज्ञान, योग एवं कर्म की अपेक्षा अधिक है ऐसा कहकर भक्ति की महिमा बताई है ।

प्रश्न – उन विशेषताओं का जिक्र करेंगे आप ॽ
उत्तर – अवश्य, उनका संक्षेप में बयान हो सकेगा । भक्ति की साधना की सबसे प्रथम विचारयोग्य विशेषता यही है कि भक्ति सर्वसुलभ है । बच्चे बूढ़े सभी उसका आधार ले सकते हैं । योग की साधना ज्यादातर नौयुवकों के लिए ही है । तदुपरांत उसमें निरामय निरोगी लोगों का काम है । उसमें आहार-विहार के सख्त नियमों का पालन भी करना पड़ता है । ज्ञान की साधना भी प्रायः चिंतनमनन में निपुण मेधावी पुरुषों के लिए ही है लेकिन भक्ति के साधना रूपी मंगल मंदिर के द्वार तो तीव्र बुद्धिवाले एवं सामान्य बुद्धिवाले, रोगी एवं निरोगी, सभी के लिए खुले हैं । इसका लाभ सब लोग ले सकते हैं । इसमें आहार विहार के सख्त नियमों का पालन भी नहीं करना पड़ता । इस साधना का अभ्यासक्रम इतना जटिल भी नहीं है । वह तो सीधा, सरल और सुस्पष्ट है । इसमें बाह्य त्याग का महत्व भी बहुत कुछ न होने से लौकिक व्यवहार में रहकर भी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मनुष्य उसका आधार ले सकता है । इस दृष्टि से देखने पर आजके कर्मप्रधान युग के लिए उसके जैसा अनुकूल साधनामार्ग दूसरा कोई नहीं है । ज्ञान एवं योग की अनुभूति भी उसके अनुष्ठान से स्वतः मिल जाती है । इस अर्थ में आप भक्ति को उत्तम कह सकते हैं ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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We turn to God for help when our foundations are shaking, only to learn that it is God who is shaking them.
- Unknown

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