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ज्ञान भक्ति एवं योग

प्रश्न – भक्ति के अनुष्ठान से ज्ञान एवं योग दोनों का आस्वाद मिल जाता है, वह कैसे ॽ
उत्तर – यह हकीकत है जिसे शांतिपूर्वक सोचने से आसानी से समझ सकते हैं । भक्ति की साधना करते हुए धीरे धीरे हृदय की निर्मलता की प्राप्ति होती है । जैसे जैसे निर्मल हृदय में परमात्मा का प्यार पैदा होता है वैसे वैसे भक्त परमात्मा के निकट पहुंचता जाता है और वह एक ऐसी दशा को प्राप्त करता है जहाँ जड़ और चेतन सब में उसे परमात्मा की झांकी होती है । संसार के सभी पदार्थों में उसे ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव होने लगता है । संसार के भिन्न भिन्न पदार्थों की बाह्य विभिन्नता के भीतर स्थित आत्मा की अखण्ड अभिन्नता का वह दर्शन करता है और ज्ञान के सर्वात्मभाव के प्रदेश में पहुँच जाता है ।
भक्त शिरोमणि नरसिंह महेता ने ज्ञान की पवित्र भूमिका पर पहुंचकर स्वाभाविक रूप से लिखा है ‘अखिल ब्रह्मांडमां एक तुं श्री हरि जुजवे रूप अनन्त भासे ।’ अर्थात् समस्त ब्रह्मांड में विभिन्न रूप में हे हरि, केवल तू ही तू भासित हो रहा है । इससे विशेष ज्ञान और क्या हो सकता है ॽ आत्मज्ञान व तत्वज्ञान का यही सार है, यही निष्कर्ष है । उस ज्ञान की प्राप्ति के लिए भक्त को ज्ञान की कोई पोथी नहीं पढ़नी पडती है । वह ज्ञान तो उसके अंतर में से स्वतः आविर्भूत होता है । उसकी अनुभूति उसे खुद ब खुद हो जाती है ।

प्रश्न – भक्ति करने से ज्ञान का आस्वाद मिल जाता है, यह बात तो समझ में आयी लेकिन योग का आस्वाद कैसे मिलता है, कृपया बताऐंगे ॽ
उत्तर - अगर आप योग के मर्म को अच्छी तरह से जानते हैं तो यह बात ठीक तरह से समझ सकेंगे । योग क्या है, योग का रहस्य क्या है और योग क्यों किया जाता है इन प्रश्नों का विचार करेंगे तो आपको इसका उत्तर मिल जाएगा । योग के द्वारा मुख्यतया मन की शुद्धि, मन की स्थिरता एवं शांति द्वारा स्वरुप के साक्षात्कार का प्रयत्न किया जाता है और इसीलिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम और ध्यान जैसे साधनों का आधार लिया जाता है । भक्ति की साधना से मन की शुद्धि तो होती ही है परंतु दीर्घ समय के पश्चात् मन की स्थिरता भी सहज संभवित होती है और अंततोगत्वा भक्त के हृदय में ईश्वर प्रेम का उद्रेक होने पर भक्त ईश्वर के स्मरण मनन में इतना निमग्न होता जाता है कि ईश्वर के ध्यान की तन्मयावस्था उसके लिए नितांत स्वाभाविक हो जाती है । उसे भाव-समाधि का अनुभव होता है और उसका मन शांत हो जाता है और आखिरकार वह ईश्वर साक्षात्कार कर लेता है । इस तरह भक्तिमार्ग के साधक को योग की साधना का आस्वाद स्वतः उपलब्ध होता है । हाँ, भक्त को अपनी पसंदीदा भक्ति साधना का त्याग कतई नहीं करना है । इस प्रकार की साधना से वह ज्ञान एवं योग दोनों का फल प्राप्त कर लेगा और अपने जीवन को भी सार्थक बना लेगा ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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There is nothing that wastes the body like worry, and one who has any faith in God should be ashamed to worry about anything whatsoever.
- Mahatma Gandhi

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