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दो भिन्न दशाएँ

भावोर्मि की दशा के बारे में मैंने पूर्व उल्लेख कर दिया है । मेरा जीवन अवनवीन भावों के साथ नये अनुभवों से संपन्न होता चला । माँ जगदंबा के निराकार रूप की झाँकी आसपास के सभी पदार्थो में होने लगी । उस वक्त मेरे जीवन में दो विभिन्न विचारधाराएँ अपना कार्य कर रही थी । एक विचारधारा भावोर्मि की थी, जिससे आसपास के सभी पदार्थो में माँ की झाँकी हुआ करती थी । अलग अलग रूपो में माँ की क्रीड़ा नज़र आती थी । ईससे मेरा हृदय अति प्रसन्न होता था, किन्तु आनंद के साथ मै दुःख का भी अनुभव करता था । ईसकी वजह ये थी की मैं उस माँ को प्रत्यक्ष रूप में देखना चाहता था । यूँ कहो की जो ईश्वर की शक्ति मुझे कण कण में सत्यम् शिवम् और सुंदरम् बनके नजर आती थी, उसे मैं किसी आम आदमी के स्वरूप में मूर्त होते हुए देखना चाहता था । मैं चाहता था की वो मेरे सामने आये, मुझसे बातें करे और मुझे अपने प्यारमें नहलाये । ईस भावना की पूर्ति के लिए मन व्यग्र रहता तब मैं रो पड़ता, प्रार्थना में डूब जाता । ईतना तो मुझे ज्ञात था की ये काम ईतना आसान नहीं है, फिर भी जो स्वाभाविक ईच्छा का उदय मेरे दिलमें हुआ था, वो किसी तरह मुझे चैन से बैठने नहीं देती थी । जिस तरह सरिता कीसी के कहे बिना स्वयं सागर की तरह बहेती है और भाँप बिल्कुल सहज तरीके से उपर आकाश की ओर चल पड़ती है, बिल्कुल उसी तरह मेरा मन जगदंबा के दर्शन के मनोरथ करने लगा । मुश्किल होते हुए भी उस मनीषा को परिपूर्ण करने के लिए मन बाँवला हो ऊठा । मानो पूर्वजन्म के संस्कार मुझे उस तरफ खींच रहे थे । उससे मेरे जीवन में प्रेम और भक्ति के नये सूर उठने लगे और नवजागृति की लहर दौडने लगी ।

जहाँ एक ओर प्रेम और भक्ति का साम्राज्य बुलंदीओं को छू रहा था वहाँ एक और प्रवाह प्रबलता धारण कर रहा था, जो ध्यान व योग का था । ये दो प्रवाह अलग अलग जरूर थे मगर विरोधी नहीं थे,  कुछ हद तक परस्पर पूरक थे । हाँलाकि भावोर्मि के प्रवाह की तुलना में ये प्रवाह ईतना प्रबल नहीं था, मगर उसकी निश्चित असर मेरे जीवन पर हो रही थी । मैंने भगवान बुद्ध, त्रैलंग स्वामी व स्वामी भास्करानंद के जीवनचरित्रों का पठन किया था ईसलिए मेरे मन में उनके जैसे सिद्ध, प्रकृतिजय और मृत्युंजय योगी बनने की ईच्छा ने जोर पकड़ा । समाधि में प्रवेश करके आत्मदर्शन करने की तथा पूर्णता व मुक्ति का अनुभव करने की मुझे ईच्छा हुई । यह मैं कैसे ओर कब कर पाऊँगा उसका कोई अंदाजा मुझे नहीं था । मेरे पास तो थी कभी नहीं खत्म होनेवाली तृषा, अडग श्रद्धा व उच्च जीवन की महत्वकांक्षा । मेरा संकल्प दृढ था ओर उसकी पूर्ति के लिए आवश्यक प्रयत्न मैं अपने सिमीत अनुभव के आधार पर करने लगा ।

युवानी के दिन ही कुछ एसे होते है । युवावस्था में मन एक बार जिसकी ठान ले ले तो उसे आत्मसात करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहेता है । आशा, श्रद्धा, महत्वकांक्षा उस वक्त अपनी चोटी पर होती है । अगर ईसी नाजुक वक्त में आदमी को योग्य राह व राहबर मिल जाता है तो उसका बेडा पार हो जाता है । ये मेरा बडा सौभाग्य था कि उन दिनों में मुझे आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग मिल गया ।

मेरे सहाध्यायी किसी छात्र में एसा दिखाई नहीं पड़ता था । बहुधा छात्र जीवन की उन्नति के बारे में सोचने का कष्ट ही नहीं करते थे । वो अपनी छोटी सी दुनिया में मस्त थे । मुझे कई बार एसा लगता था कि सिर्फ मुझे ही ऐसे ख्याल क्यूँ आते है ? क्यूँ मेरे ही सीने में ईश्वर के प्रति ईतना प्यार, लगन और बैचेनी है ? मैं आम छात्रों की तरह क्यूँ नहीं हूँ ? उस वक्त मुझे मालूम नहीं था कि ईश्वर को पाने की तरस तो करोडो में किसी गिनेचुने लोगों को ही होती है । ज्यादातर लोग तो संसार के विषयो में आसक्त होकर अपने जीवन का निर्गमन कर देतें है ।

मुझे आज भी ईस बात पर हैरानी होती है की क्यूँ लोगों को अपने जीवन महान बनाने की ईच्छा नहीं होती ? क्यूँ ज्यादातर लोग सहमे हुए रहकर बेबसी में अपना जीवन व्यतीत कर देते है ? क्यूँ युवान लड़के-लड़कीयाँ अपने स्वप्नो कों पूरा करने के लिए जुट नहीं जाते ? उनके दिल में नयी बूलंदीओं को छूने की तमन्ना क्यूँ नहीं होती ? ये सोचकर उन दिनों मुझे बड़ा आश्चर्य होता था । मेरा जीवन उन सब छात्रों से कुछ हटकर था, और ये बात बहुत कम छात्रों को पता थी । मेरे सहाध्यायी नारायणभाई मेरी अवस्था से कुछ हद तक ज्ञात थे । वो बड़े संस्कारी व सदगुणी थे, तथा मुझे उनसे थोडा लगाव था, ईसी कारण कभीकभा मैं अपने जीवन-किताब के कुछ पन्ने उनके लिए खोल देता ।

 

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