१ अप्रैल १९५२ के दिन हम वेरावल गये । चैत्र मास चल रहा था, इसलिये मेदानी इलाकों में गर्म हवा थी । यहाँ आने पर समंदर की शीतल हवा का अनुभव हुआ । स्टेशन पर मनुभाई हमें लेने आये थे । मनुभाई वेरावल में डेप्युटी कलेक्टर नियुक्त हुए थे । उन्होंने अच्छी पढाई की थी, और इश्वरकृपा से उन्हें अच्छी नौकरी मिली थी । उनको रहने के लिये सरकारी मकान दिया गया था । मकान गाँव से दूर मगर समंदर तट पर था इसलिये गर्मी का नामोनिशान नहीं था । यहाँ रहना हमें अच्छा लगा । हम कुल मिलाकर बीस दिन यहाँ रहें ।
वेरावल के पास सोमनाथ मंदिर है । मंदिर का इतिहास जानने लायक है । इस पर विधर्मीओं ने कई दफा आक्रमण किया, मगर उसका नाश नहीं कर पाये । जब भी मंदिर का ध्वंस होता था, उसे फिर बनाया जाता था । मंदिर, मस्जीद या किसी धर्मग्रंथ का नाश करने से लोगों की धार्मिक भावना नष्ट नहीं होती । वो तो दिल की गहराईयों में छूपी होती है । धर्म का बाह्य कलेवर भले खत्म हो जाय, उसकी भावना दिल से मिटाना मुश्किल है । काश, ये बात सबकी समज में आ जाये तो धर्मांतरण तथा जोर जबरदस्ती का अन्त हो जायें । धर्मों के बीच जो झगडे हो रहे है इसका अन्त हो जायें । जितनी जल्दी हम ये सिख ले, हमारे लिये लाभदायी होगा ।
वेरावल से हम प्राची गये । प्राची पौराणिक तीर्थस्थान है । कहा जाता है की यहाँ पृथु राजा ने यज्ञ किया था । मार्ग में हमने गोरख मढी का दर्शन किया । यहाँ गोरखनाथजी का भूगर्भ स्थान है । वेरावल में गायत्री देवी का प्राचीन मंदिर है । हम उनका दर्शन कर आये । अब हिमालय जाने का वक्त समीप आ गया था, इसलिये सरोडा जाना आवश्यक था ।
वेरावल से लौटने के बाद कुछ दिन साबरमती रहें । इस बार देवप्रयाग जाने को मन नहीं कर रहा था क्योंकि शांताश्रम रहनेलायक नहीं रहा था । मेरा विचार ऋषिकेश में किसी अच्छे स्थान की तलाश करके वहाँ रहने का था । मन में आल्मोडा जाने की इच्छा भी थी क्योंकि वेरावल के एक भाई ने आल्मोडा के तीन प्रतिष्ठित व्यक्तिओं के नाम मुझे चिठ्ठी दी थी । एक विचार उत्तरकाशी जाने का था । इन तीन स्थानों में से कहाँ जाना चाहिये ये तय नहीं हो रहा था । एक दिन माँ ने प्रेरणा की मुझे आलमोडा जाना चाहिये ।
अहमदाबाद से हम आल्मोडा जाने के लिये ट्रेन में बैठे । हमें बांदीकुई और अचनेरा – दो जगह पर ट्रेन बदलनी थी । हमारी पहली ट्रेन चार घण्टा लेट हो गयी, इससे अचनेरा की ट्रेन छूट गयी । न चाहते हुए भी हमें बांदीकुई में रात गुजारनी पडी । वहाँ हमारी भेंट रेल्वे में काम कर रहे गुजराती भाई से हुई । वो हमें आग्रह करके अपने घर ले गये । उनके घर पे रेल्वे के जनरल टिकट इन्स्पेक्टर से भेंट हुई । उन्होंने हमे आग्रा जाने की सलाह दी । कहा की आल्मोडा जाने के लिये काठगोदाम की ट्रेन आग्रा से चलती है, इसलिये वहाँ से बैठना ठीक रहेगा । हमने आग्रा जाना तय किया । अभी रात बांदीकुई में गुजारनी थी ।
रात को गुजराती भाई ने कठपूतली का खेल दिखानेवाले आदमीयों को बुलाया । करीब देढ घण्टे तक उनका कार्यक्रम चला । इससे हमारा वक्त अच्छी तरह से कट गया । कठपूतली का खेल देखकर मन में विचार आया की जैसे आदमी पूतलीओं को नचा रहा था, ईश्वर भी हमें नचा रहा है । हम भले कर्म करने के लिये स्वतंत्र है मगर हमारे कर्म किसी अदृश्य शक्ति की प्रेरणा से होते है । गाँव के गरीब और अनपढ लोग पेट भरने के लिये कठपूतली का खेल करते है और लोग उसे खुशीखुशी देखते है । इसमें ज्यादातर राजा-रानी की कहानियाँ होती है । अगर वे हमारे इतिहास या किसी प्रेरणादायी व्यक्तित्व को कहानी के माध्यम से पेश करें तो लोगों को बहुत कुछ सिखने को मिलेगा । ज्ञान के साथ गम्मत होगी । वरना आज के जमाने में पढेलिखे लोगों को एसा खेल शायद ही पसंद आयेगा ।
दूसरे दिन सुबह हम आग्रा पहूँचे । उस दिन वैशाखी पूर्णिमा और बुद्ध जयंति थी । आग्रा में देखनेलायक चिज ताजमहल है । कहा जाता है की मुगल सम्राट शाहजहाँ ने अपनी पत्नी की याद में उसे बनवाया था । यमुनाजी के तट पर संगेमरमर से बना ताजमहल विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है । ताजमहल को बने बरसों हो गये फिर भी वो एसा दिखता है, मानो कल बना हो । कवियों ने ताजमहल पर न जाने कितनी कवितायें लिखी है । अब लोग चाहते है की इमारतों की पूजा होने के बजाय इससे देश या समाज को लाभ हो । आज बुद्ध जयंति थी, इसलिये हम जीवन की चंचलता, मृत्यु की अवश्यंभाविता तथा अपने जीवन की एसी-ही उत्तुंग इमारत खडी करने के बारे में सोचते रहें ।
रात को आग्रा से निकलकर सुबह काठगोदाम पहूँचे । यहाँ से बस में बैठकर आल्मोडा गये । बाद में किसीने बताया की आल्मोडा जाने के लिये काठगोदाम के बजाय हल्दवानी से बस लेना अच्छा रहता है । पहाडीयों के सर्पाकार रास्तों से गुजरते हुए, करीब छे घण्टे की सफर के बाद हम आल्मोडा पहूँचे ।
काफि अरसे के बाद हम हिमालय में आये । हिमालय का नाम सुनते ही दिलोदिमाग में खुशी की लहर दौड जाती है । आल्मोडा की चारों ओर उत्तुंग पर्वतमालाएँ है । अन्य पहाडी प्रदेशों की तुलना में औलमोडा का विकास अच्छा हुआ है, एसा पहली नजर में लगा । दूसरे दिन सिफारीश के खत लेकर हम संबंधित व्यक्तिओं से मिलने गये मगर हमारा काम नहीं बना । आल्मोडा में रहने का इन्तजाम नहीं हुआ इसलिये हमने ऋषिकेश जाने का फैंसला किया ।

