प्रस्तावना

विद्वानों को भी चकित करने वाला, अपने गहन ज्ञान सिद्धान्तों से बड़े बड़े पंडितो की बुद्धि की भी कसौटी करने वाला और ज्ञान, भक्ति, कर्म तथा योग की समन्वयकारी पद्धति से छोटे-बड़े सभी के दिल में घर करने वाला गीता का ग्रन्थ भारत की ही नहीं, बल्कि समस्त विश्व की संस्कृति का एक महामूल्यबान विरासती ग्रन्थ है । विवेकीजन उसे पूज्यभाव, प्रेम और आदर की दृष्टि से देखते है, सो उचित ही है ।

विद्वानों ने आज तक उस पर कई टीकाएँ तैयार की हैं और चिंतन–मनन की विस्तृत सामग्री भी उस पर तैयार हो चुकी है । किसी विद्वान की हैसियत से नहीं, परन्तु गीता के प्रेमी और प्रशंसक की हैसियत से यह पुस्तक गीता-प्रेमी जनता के समक्ष रख रहा हूँ । इससे विवेकी जनों को आनन्द मिलेगा, ऐसी आशा है ।

कुछ वर्ष हुए हिमालय के सुन्दर प्रदेश में एक अमरीकन भाई से मेरा परिचय हुआ । भारतीय धर्म और तत्वज्ञान के वे प्रेमी थे और इस देश में महापुरुषों का समागम करके प्रसन्नता का अनुभव करते थे । उनके पास पुस्तकों में एक एकमात्र गीता थी । वे उसका अभ्यास करते थे । उनकी दिलचस्पी देखकर मुझे बहुत आनन्द हुआ । साथ साथ ऐसा भी विचार आया की इस देश में ऐसे कितने लोग हैं जो गीता के विषय में कोई ख़ास माहिती नहीं रखते । इस कमी को पूरा करने के लिए और गीता के अपार अनुराग में से गीता का यह अध्ययन तैयार करने की इच्छा हुई और भगवान की कृपा से वह पुरी भी हो गई ।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन का सारथी बनकर उसको विविध प्रकारके उपदेश दिए हैं । उन उपदेशों से अर्जुन को कर्तव्यपालन की प्रेरणा मिली, बल मिला और अनासक्ति की शिक्षा प्राप्त हुई । इसी प्रकार मानव भी यदि अपने जीवन में अपने जीवन-रथकी लगाम भगवान के हाथ में दे दे और उनमें श्रद्धाभक्ति धारण करके, सत्य परायण होकर कर्तव्य के मार्ग पर चले तो उसका सर्वतोमुखी श्रेय हो सकता है और समाज को भी लाभ पहुँच सकता है । यह गीता का मुख्य संदेश है ।

गीता चिंतन और मनन का ग्रन्थ है, इसमें शंका नहीं, परन्तु जीवन के निर्माण की अखूट और असीम शक्ति से सम्पन्न भी है । मुझे तो ऐसा जान पड़ता है की जीवन निर्माण की दृष्टि से देखकर और इसी महत्वपूर्ण काम के लिऐ गीता का उपयोग करने से हम लोगों का कल्याण हो सकता है । अपनी अपनी क्षमता के अनुसार सब उसमें से जीवन विकास की सामग्री प्राप्त कर लें, यह बहुत जरुरी है । मेरी यह पुस्तक इस कार्य में थोड़ी भी सहायक होगी तो मेरा प्रयास सार्थक होगा ओर मुझे आनन्द मिलेगा । इससे अधिक तो ग्रन्थ स्वयं कहेगा ।

इस ग्रन्थ की रचना मूल गुजराती में आज से लगभग पन्द्रह साल पहिले हुई थी । सूरत के एम.टी.बी. कालेज के प्राध्यापक श्री शशिकांत कोन्ट्रेकटर ने अपने प्रेम से प्रेरित होकर इस पुस्तक के अध्यायों का अनुवाद किया है । उनके परिश्रम के बिना यह ग्रन्थ हिन्दी भाषी जनता को मिल ही नहीं पाता । उन्होंने ग्रन्थ का भाषान्तर बड़ी योग्यता और तत्परता से किया है । इसके लिए मैं उनको भी हार्दिक धन्यवाद देता हूँ ।

- © योगेश्वर

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