कर्मयोग की पुरानी परंपरा

अब हम आगे बढ़ेंगे। भगवान कहते हैं, “हे अर्जुन, जिस कर्मयोग के बारे में मैं तुझसे कह रहा हूँ, उसे सर्व प्रथम तुझसे ही कह रहा हूँ ऐसा मत समज़ना। यह कर्मयोग बड़ा ही प्राचीन है। सबसे पहले मैंने इस योग का ज्ञान सूर्य देवता को दिया था। सूर्य ने मनु को और फिर मनु ने इश्वाकु को यह ज्ञान दिया। इस तरह अतीत काल से चले आते हुए इस योग को लोग कुछ भूल गए। आज मैं तुजे पुनः उसका ज्ञान देता हूँ। तू मेरा प्रेमी, भक्त और सखा है। अतः कर्मयोग का रहस्य तेरे आगे खुलासा करके रखता हूँ।

इन शब्दों का मनन करना चाहिए। भगवान ने सर्व प्रथम कर्म के रहस्य का ज्ञान किसको दिया? सूर्य को। इसका मतलब कया? हमारे लिए यही मतलब है कि इस संसार में कर्मयोग के रहस्य को समज़नेवाले या समजानेवाला यदि कोई है तो वह सूर्य ही है। सूर्य तमाम दिन काम करता है, फिर भी उसे थकान नहीं होती। किसी भी दिन उसने ऊबकर या थककर काम नहीं छोड़ा। उसके पास जाओगे तो जल जाओगे। इतना प्रबल प्रताप है उसका। मामूली गरमी से हम ऊब जाते है और दुःखी हो जाते हैं। किन्तु अत्यधिक गरमी के बीच निवास करनेवाला सूर्य कितनी शांति धारण किये रहता है। धैर्य और सहनशीलता की मूर्ति बनकर दूसरों को वह प्रकाश और जीवन देता है। आवेश में आकर या ऊबकर यदि वह अपना काम छोड़ दे तो कया हो? अर्जुन की भांति संन्यास लेने का विचार करके वह बैठ जाय तो संसार की क्या हालत होगी? चारों ओर अंधकार फ़ैल जाय और बनस्पति, पशु, पंछी आदि सभी की दुर्दशा हो जाय। उसका कितना उपकार है कि वह प्रतिदिन प्रकट होता है और सारे जगत को जानदार बनाता है। अब शायद सब जगह संसार में एक दिन छुट्टी रहती है, पर सूरज तो निरंतर क्रियाशील रहता है। साप्ताहिक छुट्टी के लिए वह किसी प्रकार का आन्दोलन नहीं करता। और प्रशंसनीय बात तो यह है कि वह संसार का इतना भला करता है, फिर भी उसे इसका तनिक भी गर्व नहीं। नम्रता की मूर्ति बनकर वह अपना काम किये जाता है। यह काम उसके लिए सहज एवं स्वाभाविक बन गया है।

साधारण आदमी जब किसी की सेवा करते है तो बदले में प्रशंसा व आदर चाहते हैं। किन्तु सूर्य की निस्पृहता देखिए, उसे सम्मान की आवश्यकता नहीं। संसार में किसी ने कोई सेवा का बड़ा काम किया तो उसे सम्मान पत्र दिया जाता है और पैसे की थैली भेंट की जाती है। ऐसा करने से वह खुश होते हैं। सेवकों का यदि आदर नहीं किया जाता और यदि उन्हें उच्च पद नहीं दिया जाता तो उन्हें दुःख होता है कि उनके काम की कद्र नहीं हुई। किन्तु क्या सूर्य भी ऐसा करता है? सूर्य की सेवा किसी भी दूसरे सेवक की अपेक्षा पुरानी और बड़ी है। वह सारी सृष्टि के मंगल के लिए प्रवृत्ति करता है, पर क्या कभी सम्मानपत्र की मांग करता है? आप उसका स्वागत करें या न करें, फिर भी वह तो उदय होगा ही, उसकी स्तुति करें या न करें फिर भी वह सेवा देगा ही। उसे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। अपने सद्गुरु से उसे सेवा का मंत्र मिला है। वह निरंतर उसी का जप किया करता है। उसी मंत्र शक्ति के ज़रिये उसे बिना इच्छा के ही स्वतः सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति हुई है। वह हर्ष, शोक, सुख दुःख, शंका और समाधान, राग द्वेष सबसे परे हो गया है और अडिग होकर अपना काम करता जाता है। सूर्य का दर्शन हम बारबार किया करते हैं, उसे अंजली अर्पण करते हैं और उसकी पूजा भी करते हैं। किन्तु इस रहस्य का विचार कदाचित ही करते हैं। अन्यथा सूर्य से बहुत कुछ सिख सकते हैं।

सूर्य का उदाहरण हमारे जीवन निर्माण में काम आ सकता है और हमें सच्चा कर्मयोगी बना सकता है। जैसे सूर्य के पास अंधकार नहीं रहता, उसी तरह हमारे पास भी अज्ञान व अवगुण का अंधकार नहीं टिक सकता। सूर्य की भांति हम भी किसी बदले की अपेक्षा न करके सहज रीति से कर्म कर सकेंगे और कर्म का अहंकार हमें नहीं आएगा। धन, पद और प्रतिष्ठा के लिए बेचैन न होंगे। सेवा करेंगे पर सम्मान की अपेक्षा किए बिना। और न ऐसा मिथ्याभिमान करेंगे कि किसी पर एहसान किया हो, कर्म के बदले में कोई निंदा करे या स्तुति, हम अपने काम में लगे ही रहेंगे। हमारी शांति और प्रसन्नता कभी भंग नहीं होगी। सूर्य की शक्ति अनंत है। उसका प्रकाश प्रबल है लेकिन वह किसी को तकलीफ नहीं देता, बल्कि सबकी सहायता करता है। संसार की रक्षा और पोषण करता है, यधपि उसमें विनाश करने की शक्ति विद्यमान है। इसी तरह हमारी समस्त शक्ति परहित के लिए प्रयुक्त होनी चाहिए और किसी का अनिष्ट न हो जाय इस बात का पूरा ख़याल रखना चाहिए। संसार के लिए सूर्य शाप नहीं बल्कि आशीर्वाद है। इसी तरह हमारा जीवन समाज के लिए कल्याणकारक हो इस बात का सदा ध्यान रखना चाहिए। हमें ऐसी अवस्था प्राप्त करनी चाहिए कि करने योग्य कर्म हम स्वाभाविक रूप से करते जाए, वह हमें भार स्वरुप न जान पड़े। कर्म में प्रवीणता तभी समजी जायगी जब काम करने में कम से कम शक्ति का व्यय हो और थकान न मालूम पड़े। इसलिए हमें उत्साह से काम करना चाहिए। कर्मयोगी सूर्य से हम ऐसे कई सबक सीख सकते हैं। रोज़ सूर्य के दर्शन करने का हमारा रिवाज़ है। सूर्य की पूजा भी हम करते हैं, पर यह पूजा यंत्रवत न होनी चाहिए। सूर्य को याद करके ऐसी अनेक भावनाओं को दिल में जमाइए तो जीवनयात्रा के लिए आपको मूल्यवान पाथेय प्राप्त होगा।

इस के बाद यह सोचिए की संसार में सूर्य के समान कर्मयोगी और कोई है? कहा जाता है कि मोती एक दो दिन में पैदा नहीं हो जाते। स्वाति नक्षत्र में बादलों से जो बूंदे गिरती हैं उन्हें सागर में रहनेवाली मछलियां धारण करती हैं। और वे सागर की तह में चली जाती हैं। अनेक दिनों की साधना के बाद बूंद का मोती बनता है। मोती की यह बात सच हो या ग़लत, लेकिन यह बात बिलकुल सच्ची है कि सद्गुरु के मुख में से किसी धन्य समय पर ज्ञान का रहस्य बाहर आता है और किसी धन्य शिष्य को ही प्राप्त होता है। इस रहस्य का अच्छी तरह मनन करना चाहिए। मनन करने पर वह मोती जैसा मूल्यवान हो जाता है और जीवन को धन्य बनाता है। भगवान से कर्मयोग की दीक्षा लेकर सूर्यदेवता का जीवन कृतार्थ हुआ। हर एक मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही हो जाता है। जो योग्य समय पर जाग्रत होता है, प्रमाद का त्याग करता है और उन्नति के पथ पर निश्चित रूप से क़दम रखता है वह मंजिल तक पहुँच सकता है, इस में संदेह नहीं। हमारे यहाँ लोकसेवक बढ़ते जाते है अच्छी बात है, लेकिन सूर्य की भांति उन्हें विशुद्ध एवं स्थितप्रज्ञ बनना है। सूर्य को सद्गुरु बनाकर उससे कर्मयोग की दीक्षा लेना है। लोक सेवकों की जड़ नहीं बनना है, एवं सदैव जागृत और शक्ति सम्पन्न होना है। अपने दोषों को दूर करना है और सद्गुणों को बढ़ाना है। अहंकार और स्वार्थ को बाहर निकालना है। पद और प्रतिष्ठा के लिए होड़ नहीं करना है। हमें सिर्फ़ काम करना ही नहीं है, बल्कि काम तो कलात्मक ढंग से करना है। अगर ऐसा हो तो देश सेवकों की सेवा उनके ही लिए नहीं बल्कि सभी के लिए आशीर्वाद हो जाय।

सूर्य देवता के द्वारा कर्मयोग का रहस्य और किस को प्राप्त हुआ? मनु को। मनु एवं शतरूपा को संसार का आदि माता पिता माना जाता है। आज जो सृष्टि विद्यमान है वह उन्हीं की है। कर्म का रहस्य प्राप्त करके उन्होंने संसार का विस्तार किया। मानवजाति कलात्मक रूप में ज़िंदा रह सके तथा परस्पर प्रेम और व्यवस्था रख सके इसलिए उन्होंने धार्मिक और सामाजिक नियम गढ़े। उन्हें हम मनुस्मृति कहते हैं। मनु भगवान को प्रतीत हुआ कि मानवजाति बर्बर अवस्था में जीती है। यह उचित नहीं है। इसलिए उन्होंने उत्तम जीवन के आदर्श उपस्थित किये और जीवन के सिद्धांत बनाए। इस प्रकार भगवान मनु एक महान चिन्तक थे। उन्होंने तत्कालीन राजा को भी तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जिसका उपयोग करके वे अपने साथ अपनी प्रजा का भी मंगल करने लगे। आज वे महापुरुष नहीं है। लेकिन मनुष्य के अंदर मनन करने की शक्ति है। उसे विकसित करके मनुष्य आज भी कर्मयोगी और मनु के समान महान बन सकता है। अर्जुन भी ऐसा ही महान बने, यह भगवान की इच्छा है। इसीलिए भगवान यह सब बातें कह रहे हैं। उन्हें सुनकर अर्जुन को ज़रूर आनंद हुआ होगा। हमें भी ख़ुशी होती है और किसे न होगी? भगवान के पास खड़े होकर उनका दैवी उपदेश सुनने का दैवी सौभाग्य हमें नहीं मिला है। फिर भी उनकी दिव्य वाणी का लाभ उठाने के लिए हम आज स्वतंत्र हैं। यह लाभ गंगा स्नान से ज़रा भी कम नहीं। ऐसे बदनसीब मनुष्य बहुत कम होंगे जिन्हें ऐसे लाभ से आनंद न प्राप्त हो। अर्जुन तो सच्चा मानव है। नर का अवतार है। उत्तम मानव बनने की उसे इच्छा है। इसलिए भगवान की वाणी उसे आनंद प्रदान करती है।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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