Sunday, July 05, 2020

जीवन के श्रेय के लिए पुरुषार्थ

बहुत से लोग कहते हैं कि जीवन के श्रेय के लिए काम करना बड़ा मुश्किल है। उनसे हम कहेंगे कि भाई कुछ भी मुश्किल नहीं है। हमारा जन्म ही इस काम के लिए है, श्रेय करने की वृत्ति हमें विरासत में मिली है। उस वृत्ति को पुष्ट कीजिए। ऐसा करने पर काम आसान हो जायगा। जीवन के मंगल का मार्ग सरल है। उसे अधिक सरल बनाने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाइए। प्रलोभन एवं विघ्नों का हिम्मत से सामना करके आगे बढ़ते रहिए। तभी पता चलेगा कि आत्मिक कल्याण के कार्य जैसा सरल काम दूसरा कोई नहीं।

लेकिन वास्तविकता भिन्न ही है। मनुष्य अपना सहज कार्य छोड़कर अनेक अटपटे एवं – अजीब व्यवसायों में उलज़ गया है। संसार का अवलोकन करने से यह बात स्पष्टतया समज में आ जायगी। दुन्यवी पदार्थों की लालसा रखकर आदमी संसार में अत्यधिक परिश्रम करता है और अशांति में जीता है। ईश्वर के अनुराग में मस्त होकर, ईश्वर के लिए जीनेवाले मनुष्य इस संसार में कितने हैं। परमात्मा में अनुराग रखकर परमात्मा के साक्षात्कार के लिए पुरुषार्थ करनेवाले मनुष्य क्या विरले नहीं हैं? ज्यादातर आदमी तो संसार के मोह में ही डूबे हुए हैं और जीवन श्रेय की साधना से बिलकुल अनजान हैं। यह अफ़सोस की बात है। उपनिषद के कथनानुसार जीवन के दो मार्ग हैं। एक श्रेय और दूसरा प्रेय, एक आत्मोद्धार का अर्थात अपने कल्याण का मार्ग है। दूसरा संसार के सुख का मार्ग है। जो बुद्धिमान और विवेकी पुरुष है वह तो जानता है कि संसार के समस्त पदार्थ हासिल हो जाय और विषयों का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाय तो भी मनुष्य को शांति नहीं प्राप्त हो सकती और न उसका जीवन मुक्त या सफल हो सकता है। क्योंकि श्री एवं संपत्ति सम्पन्न पुरुषों को भी शांति की प्राप्ति के लिए परमात्मा की अनुभूति के मार्ग पर अग्रसर होना पड़ता है। परमात्मा की शरण लेनेवाले तथा आत्मिक कल्याण के लिए प्रयत्नशील पुरुष ही संपूर्णतया सुखी, शांतिमय एवं खुशनसीब है। विवेकी लोग यह जानते हैं और इसीलिए तो आत्महित का विचार करके अपने मंगल का मार्ग वरण करते हैं। जो अविवेकी एवं संकुचित मनोवृत्ति वाले होते हैं, वे ही संसार के सुख में मग्न होते है और जीवन के उत्तम लाभ को गंवा देतें हैं।

इसका मतलब यह नहीं, कि सब प्रवृत्तियों को छोड़कर मनुष्य केवल परमात्मा में मग्न हो जाय। मनुष्य परमात्मा परायण हो जाय यह वांछनीय है। किंतु सब लोग सांसारिक कारोबार छोड़ दे यह मानना अनुपयुक्त हैं और ऐसा करने पर भी संसार के प्रति नफरत करना व्यर्थ है, यह संसार मानो परमात्मा ही का स्वरूप है और परमात्मा ही की रचना है, अतएव उससे धृणा करना अनुचित है। भले ही कारखाने, स्टीमर, रेल – आदि अपना काम किया करें, भले ही सांसारिक व्यवहार चला करें और मनुष्य भी विविध व्यवसाय करके आनंद प्राप्त करें। इसमें हमें कोई एतराज़ नहीं। हम तो सिर्फ एक ही चीज़ पर ध्यान केन्द्रित करना चाहते हैं, वह यह कि संसार केवल सांसारिक व्यवसाय करने या सुख भोगने के लिए ही नहीं है। आपकी शक्ति असीम है। इसलिए संसार का आनंद प्राप्त करने के साथ साथ ईश्वर का परमानंद प्राप्त करने का भी प्रयत्न कीजिए। अल्पता, अशांति एवं बंधन से मुक्ति पाइए और आत्मकल्याण भी स्थापित कर लीजिए। श्रेय एवं प्रेय, दोनों का संतुलन करने की शिक्षा हम सर्वसाधारण को देते हैं या यों कहीए कि अर्ज़ करते हैं। गीतामाता की भी यही शिक्षा है।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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