Sunday, October 25, 2020

नामस्मरण

प्रश्न – नामजप या ईश्वर-स्मरण क्या निश्चित समय पर ही करना चाहिए ? कतिपय संतपुरुष कहते हैं कि सुबह जल्दी या शाम के समय होना चाहिए तो क्या दिन के दो भागों में ही ध्यान हो सकता है ?
उत्तर – व्यावहारिक लोगों को ज्यादातर समय नहीं मिलता तथा प्रभात या शाम का समय शान्त होता है अतएव उन्होंने दिनमें कम-से-कम दो बार शांत मन से ईश्वर-स्मरण करने का विधान किया है । कम से कम इतने समय के लिए तो वे अवकाश पाकर नामजप या ईश्वर-स्मरण करें । किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि ईश्वर-स्मरण का वक्त इतना ही है और वह दिन में दो भागों में ही हो सकता है । ईश्वर-स्मरण सुबह में और शाम में दो बार करने का नियम उचित है किन्तु उसके बाद समय में बढ़ावा करना चाहिए । एक अवस्था ऐसी आनी चाहिए कि नामजप या स्मरण साँसोसाँस में हो सके । व्यवहारपरायण होने या न होने पर भी इसकी आदत डालनी चाहिए । इससे उस समय मानसिक रूप से ईश्वर-स्मरण हो सकता है । पहले ऐसी आदत डालनी चाहिए, बादमें उत्तरोत्तर आगे बढ़ना चाहिए । ऐसी आदत फिर स्वाभाविक हो जाती है । ईश्वरप्रेमी अनुभवी भक्तजन तो कहते हैं कि जीवन में ईश्वर-स्मरण अखंड अथवा निरंतर रूप से होना चाहिए । ऐसी एक भी क्षण न होनी चाहिए जिसमें ईश्वर-स्मरण न हो ।

आपके प्रथम प्रश्न के उत्तर में कहना है कि ईश्वर-स्मरण प्रारंभ में निश्चित समय पर करना आवश्यक है । ऐसी सिफारिश करने का मुख्य हेतु इतना ही है कि ईश्वर-स्मरण का महत्वपूर्ण कार्य नियम से हो सके । यदि निश्चित समय का नियम या आग्रह न रखा जाय तो उसका परिणाम क्या हो सकता है यह हमें मालूम है । मानव मनमानी करे, इसका मतलब है आज जप करे और कल न करे । हररोज करे फिर भी एक समय में न करे । आज सुबह करे, कल दोपहर में और परसों शामको और उसके बाद रातको करे और फिर ज़रा भी न करे । साधना के कार्य में ऐसी अव्यवस्था होती रहती है । ऐसी अव्यवस्था को रोकने के लिए साधक को अपना अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए । ऐसा अभ्यास निर्धारित समय पर निरंतर रुप से करना चाहिए । ऐसा नियमित रूप से होनेवाला अभ्यास मन को स्थिर या एकाग्र करने में सहायक होता है । निश्चित किये हुए समय पर मन अपने निर्धारित अभ्यास के लिए तैयार हो जाएगा और धीरे धीरे वह अभ्यास में दिलचस्पी लेगा और एकाग्र होना भी सीख लेगा । निश्चित समय के अभ्यास का यह लाभ कम नहीं है ।

प्रश्न – केवल जप करने से दर्शन हो सकता है क्या ॽ
उत्तर – हो सकता है, किन्तु कब संभव है जानते हैं आप ॽ नामजप करते करते हृदय भावविभोर हो जाए, द्रवित हो जाए और मा भगवती के प्रेम से परिप्लावित हो जाए या आतुर हो जाए तब नामजप करते हुए हृदय एक प्रकार की अनुपम भावना का अनुभव करता है । आँखमें से आँसू निकलते है, प्राण प्रेमातुर होकर पुकारने लगता है और रोम रोम में राग और रस का स्त्रोत उमड़ता है । यह अवस्था भक्त के लिए आशीर्वाद स्वरूप है । यह अवस्था सूर्योदय से पूर्व पूरब में उगनेवाली उषा की भाँति है परन्तु ऐसी अवस्था एक दो दिन या ज्यादा समय रहकर गायब हो जानेवाली नहीं होनी चाहिए । वह एक समान या अखंड रहनी चाहिए । जहाँ तक भक्त को अपनी इच्छानुसार दर्शन का लाभ प्राप्त न हो, इस अवस्था को जतन करके बनाए रखना और बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए । यह प्रेममयी, अनुरागभरी अवस्था के फलस्वरूप भक्त माँ भगवती के दर्शन के लिए तड़पने लगे, रोने लगे, अपना सबकुछ निछावर करने तत्पर हो जाए । तत्प्रश्चात् ईश्वरदर्शन दूर नहीं रहेगा ।

प्रश्न – आपने जो संक्षिप्त गायत्रीमंत्र का वर्णन किया था, उसके जप का विधि क्या है ॽ
उत्तर – उस जप का कोई खास विधि नहीं है । दूसरे मंत्रो की तरह उसे भी स्नानादि से निवृत्त होकर जप सकते हैं । परंतु प्रधान बात यह है कि जप स्थिरता और एकाग्रता के साथ होना चाहिए, पूरी लगन के साथ होना चाहिए, श्रद्धा और प्रेम के साथ होना चाहिए । ज्यादातर मनुष्य विधिविधान की ओर अधिक ध्यान देते है । विधिविधान का महत्व भी अमुक मात्रा में है परंतु विधिविधान से ही जप का सर्वस्व नहीं है । जप का सर्वस्व तो ईश्वर-भक्ति, श्रद्धा एवं व्याकुलता है । इसका उद्भव होने पर जप अभीष्ट फल देता है ।

प्रश्न – कितने जप करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है ॽ
उत्तर – इसके लिये कोई नियत नियम नहीं है । सच्चा मार्ग तो यही है कि जहां तक अभीष्ट फल की प्राप्ति न हो वहाँ तक जप करते रहिए और उसके बाद भी उसे जारी रखिए । जप, जीवन की एक सहज क्रिया हो जानी चाहिए । हाँ, साक्षात्कार के बाद उसकी आवश्यकता नहीं रहेगी ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

Today's Quote

To observe without evaluating is the highest form of intelligence.
- J. Krishnamurti

prabhu-handwriting

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.

Ok