Friday, August 07, 2020

ईश्वर की कृपा और ईश्वर-प्रेम

प्रश्न – ईश्वर की कृपा कैसे हो ? इसकी अनुभूति के लिए क्या करना चाहिए ?
उत्तर – ईश्वर की कृपा तो हर किसी व्यक्ति पर सदैव हो ही रही है । अगर इसका अनुभव न हो तो इसके लिए प्रामाणिक रूप से प्रयास करने चाहिए । आसमान में सूर्योदय हो चुका हो और उसकी किरणें वातावरण में सर्वत्र व्याप्त हो गई हो तब कोई मनुष्य घरके सभी खिडकी-दरवाजें बन्द करके घर में बन्दी बन जाए तो उसे उन किरणों का लाभ कैसे मिलेगा ? इन किरणों से वह खुद-बखुद जान-बुझकर महेरुम हो जाये । इन किरणों का लाभ उठाने के लिए घर के सभी खिड़की-दरवाजों को खोलकर उसे बाहर निकलना चाहिए । यही एकमात्र उपाय है । इसी तरह ईश्वरकृपा की कामनावाले पुरुष को भी अपने हृदय की खिड़कियों और द्वारों को ईश्वर की ओर खोल देना चाहिए ।

प्रश्न – ऐसा करने से क्या मतलब ?
उत्तर – इसका मतलब आप नहीं समझें ? हृदय को ईश्वराभिमुख करना, सांसारिक विषयों की ममता, आसक्ति तथा रसवृत्ति कम करके, उसमें ईश्वर के लिए पवित्र प्रेम जगाने का प्रयत्न करना । जो हृदय संसार के विषयों की ओर प्रवाहित होता हो उसे ईश्वर के स्मरण-मनन द्वारा ईश्वर की ओर बहता करना तथा ईश्वर की नियमित प्रार्थना का आधार लेना । इतना हो सके तो ईश्वर-कृपा का अनुभव प्राप्त करने में देर नहीं लगेगी । ईश्वर की कृपा अवश्य होगी ।

प्रश्न – संतपुरुष बार-बार उपदेश देते रहते हैं कि ईश्वर को प्रेम करो । ईश्वर से प्रेम करने का मतलब क्या समझें ?
उत्तर – ईश्वर से प्रेम करने का जो उपदेश दिया जाता है उसमें दूना अर्थ समाविष्ट है । इसका पहला मतलब ईश्वर का अधिकाधिक स्मरण करना, ध्यान करना तथा मन की वृत्तियाँ जो बाह्य जगत में दौडती हैं उनको अंतर्मुख करना या परमात्मा में जोड़ने का प्रयत्न करना । संसार के क्षणभंगुर विषयों के प्रति जो दिलचस्पी है, प्रीति तथा तड़पन है, इससे भी ज्यादा दिलचस्पी, आकर्षण, प्रेम तथा आतुरता ईश्वर के लिए उत्पन्न कर ईश्वर-साक्षात्कार के लिए तत्पर होना, प्रार्थना करना और इसी तरह समग्र जीवन को ईश्वरमय बना देना ।

प्रश्न – ईश्वर-प्रेम का दूसरा अर्थ क्या होता है ?
उत्तर – दूसरा अर्थ जरा अलग प्रकार का है । संसार ईश्वर का साकार स्वरूप है । इसके भिन्न भिन्न पदार्थों के रूप में ईश्वर स्वयं ही व्यक्त है, व्याप्त है, ऐसा समझकर, सब में ईश्वर की झांकी करने का प्रयास करते हुए सबको मन ही मन में चाहते रहना सीखना और जीवन को अन्य की सेवा के सर्वोत्तम कार्य में लगा देना – यही इसका दूसरा अर्थ है ।
अन्य में ईश्वरी प्रकाश का दर्शन कर जो अन्यको सहायक होता है, वह ईश्वर की भक्ति ही करता है और ऐसी प्रेमभक्ति के प्रभाव से मन निर्मल हो जाता है और ईश्वर की कृपा का लाभ सहज ही मिल जाता है ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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- Anonymous

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