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समाधि और लय

प्रश्न – कुछेक योगीजन जमीन में खड्डा खुदवाकर दट जाते हैं अथवा पूर्वनिश्चित दिन तक समाधि लेते है तो क्या ऐसी समाधि लेना संभवित है ॽ अगर है तो कैसे ॽ
उत्तर – ऐसी समाधि लेना मुमकिन है । प्राणायाम के अभ्यास में अग्रसर योगी अपनी इच्छानुसार दीर्घ समय तक प्राणवायु का निरोध करके जमीन में बैठ सकता है या समाधि ले सकता है । हाँ इसके लिए गहन अभ्यास आवश्यक है । अभ्यास में तनिक भी गलती हो या त्रुटि रह जाए तो मृत्यु को गले लगाना पड़ता है और उस वक्त कतिपय साधकों के शरीर में बदबु भी पैदा होती है । कतिपय बनावटी साधु गुफा में या गड्डे में हवा लेने का साधन भी रखते हैं और लोगों को छलने के लिए समाधि लेते हैं और वहाँ आराम भी फरमाते हैं । उनके शिष्य उनके आवश्यक खानेपीने का प्रबंध भी करते हैं और इस तरह उनकी देखभाल भी करते हैं । फिर भी यदि वे ठीक ढंग से समाधि लेते हैं ऐसा माना जाए तो भी ऐसी समाधि लोगों के लिए मनोरंजन या प्रदर्शन का विषय न बननी चाहिए ऐसा मुझे लगता है । समाधि चाहे जमीन के भीतरकी हो या बाहरकी, वैयक्तिक विकास की वस्तु है । वह प्रदर्शन और उसके द्वारा धनप्राप्ति या प्रतिष्ठा की लालसा का विषय न बननी चाहिए । यह आत्मदर्शन या आत्मशांति के उद्देश्य से प्रेरित होकर एकान्त में सिर्फ ईश्वर की उपस्थिति में ही हो यह जरूरी है ।

प्रश्न – ऐसी समाधि क्या उपयोगी हो सकती है ॽ
उत्तर – समाधि की प्रत्यक्ष अनुभूति की कामनावाले मनुष्यों को ऐसी समाधि संतुष्ट करे और श्रध्धावान बनाए ऐसा हो सकता है किंतु यह समाधि आत्मज्ञान या आत्मानुभव से वंचित जड़ समाधि होगी । समाधि से जागने के पश्चात भी उसके अन्दर यदि अहंता, ममता, कामक्रोध, रागद्वेष, आसक्ति या भेदभाव हमेशा रहें और समाधि के फलस्वरूप मन के मैल मिट जाने पर परमात्मा के प्रति प्रेम प्रकट न हो तो यह समाधि शांति की प्राप्ति नहीं करवा सकती । इससे शायद सिद्धियाँ हासिल होगी परंतु बंधनों की निवृत्ति या जीवन का कल्याण नहीं हो सकेगा । अगर साधना मानव को सच्चे अर्थ में मानव न बनाए और परमात्मा के पास न पहुँचाए तो कैसी भी असामान्य या दंग कर देनेवाली हो यह किस कामकी ॽ

प्रश्न – लय और समाधि क्या एक ही है या अलग अलग ॽ
उत्तर – दोनों एक ही है । दोनों में शरीर का होश चला जाता है और सुख की अनुभूति होती है । दोनों के नाम भिन्न है परन्तु उसका सार एक ही है ।

प्रश्न – लय एवं आत्मदर्शन अथवा आत्मसाक्षात्कार क्या एक ही है या उसमें कोई अंतर है ॽ
उत्तर – इन दोनों में अंतर है और इसे स्वानुभव के अलावा नहीं समझ सकते । लय की अवस्था बहुत ही उच्च एवं मूल्यवान है फिर भी हरेक प्रकार के लय में साधक को आत्मसाक्षात्कार नहीं होता । आत्मा की अनुभूति करानेवाला लय तो किसी धन्य क्षण में हो जाता है । फिर उसे जागृत अवस्था में आने के पश्चात भी जड़चेतन सभी में परमात्मा की अनुभूति होने लगती है । ऐसा विशिष्ट प्रकार का लय जीवन को कृतार्थ करनेवाला होता है । उसे निर्विकल्प समाधि भी कहा जाता है अथवा तो अप्रज्ञात समाधि के नाम से भी जाना जाता है ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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