प्रश्न – भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन की इच्छा मुझे कई समय से हुआ करती है तो यह इच्छा पूरी हो सकेगी क्या ॽ
उत्तर – क्यों नहीं हो सकती ॽ केवल श्रीकृष्ण के दर्शन की तमन्ना ही क्यों, किसीके भी दर्शन की तमन्ना पूर्ण हो सकती है इसमें कोई सन्देह नहीं । आज पर्यंत भक्तिमार्ग के कई साधकों को भगवान के दर्शन विभिन्न रूप में हो चुके हैं । इसी तरह आपको भी हो सकता है । सिर्फ इसके लिए आवश्यक योग्यता के रूप में आपके दिल में प्रेम व विश्वास होना चाहिए ।
प्रश्न – प्रेम व विश्वास तो है ही, इससे अधिक प्रेम कैसा ॽ
उत्तर – ये तो कैसे बता सकते हैं ॽ प्रेम है इसका इन्कार नहीं, प्रेम है तभी तो आपको ईश्वरदर्शन की इच्छा होती है । उसके बिना ईश्वरदर्शन की इच्छा नहीं हो सकती । लेकिन आज जो प्रेम विद्यमान है वह पर्याप्त नहीं है । वह पर्याप्त है ऐसा मान लेने में गलती होती है । आप उसे पर्याप्त है ऐसा मानते हैं पर ऐसा नहीं है ।
प्रश्न – क्यों ॽ मेरे प्रेम में क्या कमी है ॽ
उत्तर – कमी की बात मैं नहीं करता । यह तो आपको तय करना है परन्तु अगर आपके हृदय में ईश्वर के लिए परमप्रेम का प्रादुर्भाव हुआ होता तो आप ईश्वर से दूर नहीं रह सकते अथवा यों कहिए कि ईश्वर आपसे दूर नहीं रहता । आपको ईश्वर का दर्शन कब का हो चुका होता और आपने जो प्रश्न प्रारंभ में पूछा था वह प्रश्न पूछना नहीं पड़ता । मान लीजिए कि ऐसे उत्क्ट प्रेम का उदय होने पर भी किसी कारण से ईश्वरदर्शन में विलंब हो तो भी ऐसी श्रद्धा आपको जरूर रहती कि दर्शन होगा ही । इस विषय में आपको तनिक भी सन्देह न होता । आपके वे चिन्ह भी बदल जाते ।
प्रश्न – चिन्ह बदल जाते - इसका क्या अर्थ होता है, कृपया बताएँगे ॽ
उत्तर – अवश्य, चिन्ह बदल जाने का मतलब आपकी पूरी दिनचर्या ही बदल जाती । आज आपको संसार के व्यवहार में जो थोडी बहुत दिलचस्पी है, वह भी गायब हो जाती । आपकी शेष दिलचस्पी संसार के किसी पदार्थ या संसार की किसी प्रवृत्ति में नहीं अपितु ईश्वर में ही रहती । ईश्वर ही आपके जीवन का केन्द्रबिन्दु बन जाता और आप दिनरात ईश्वर-स्मरण करते रहते, ईश्वर के ही चिंतन-मनन में लीन होकर बैठे रहते । ईश्वर के लिए पल-पल प्रार्थना एवं अंतरतम में से आक्रंद करते रहते । ईश्वर के अलावा कुछ न भाए ऐसी अवस्था की कल्पना आप कर सकते हैं ॽ अभी उस अवस्था की प्राप्ति आपको नहीं हुई इसीलिए आपका मन संपूर्णतः ईश्वर-परायण नहीं रहता । अलबत्ता अगर आप साधना में आगे और आगे बढ़ते रहेंगे तो अंततः उस अवस्था की प्राप्ति अवश्य होगी ।
प्रश्न – दिल में ईश्वर के लिए प्यार हो, त्याग व वैराग्य हो फिर भी ईश्वर-दर्शन होने में विलंब क्यों ॽ
उत्तर – कभी कुछ समय विलंब भी होता है और उसका कारण सुयोग्य समय का अभाव होता है । प्रबल प्रेम होने पर भी सही वक्त का इन्तज़ार करना पड़ता है । उस वक्त निराश होने की जरूरत नहीं है । कर्मसंस्कार का विघ्न दूर होने पर रास्ता साफ़ हो जाएगा और ईश्वर-दर्शन अवश्य होके रहेगा ।
- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

