Tuesday, October 20, 2020

गुरुमंत्र बदल सकते हैं ॽ

प्रश्न – मुझे मेरे गुरु द्वारा जो मंत्र मिला है वह लम्बा है इसलिए मुखपाठ नहीं होता । इसके बदले मैं ‘श्रीकृष्ण शरणं मम’ – यह मंत्र सदैव जपता रहूँ तो क्या सफलता मिलेगी ॽ
उत्तर – आपका प्रश्न महत्वपूर्ण है । कई साधक या भक्त यह प्रश्न पूछते हैं । गुरु द्वारा दिया गया मंत्र यदि लम्बा हो या संक्षिप्त, वह यदि किसी कारण पसंद न हो तो अपनी रुचि के अनुसार दूसरे मंत्र का जप करने में कोई हर्ज नहीं है । मंत्र जप से जो सफलता मिलती है वह तो उसके परिणामस्वरूप पैदा होनेवाली हृदय की निर्मलता, एकाग्रता और फलतः उत्पन्न ईश्वर-प्रेम से मिलती है । इसे ध्यान रखकर श्रद्धा एवं भक्ति से नियमित रूप से जप करेंगे तो अवश्य लाभ होगा । जप जड़ या यांत्रिक न हो जाय उसका अच्छी तरह ध्यान रखें । यदि गुरु-मंत्र लम्बा हो और इसलिए आपको पसंद न हो तो दूसरा मंत्र आप पसंद कर सकते हैं किंतु कमसे कम गुरुमंत्र की एक माला गुरु के ऋण का स्मरण करके अवश्य कीजिए ।

प्रश्न – गुरु मंत्र का त्याग करने में गुरु का द्रोह तो नहीं होता ॽ
उत्तर – बिलकुल नहीं । सब गुरु शिष्य की रुचि को ध्यान में रखकर मंत्र नहीं देते अतएव उस मंत्र को बदल सकते हैं । हाँ बदलने की क्रिया चंचलता से प्रेरित होकर बार बार न होनी चाहिए । अन्यथा उसका कोई अर्थ न रहेगा । शंकाशील होकर जप करने की अपेक्षा जप बदलकर बिना संदेह के आगे बढ़ना अधिक अच्छा है । गुरुमंत्र नितांत त्याग करने की सलाह मैं नहीं देता । यह बात तो मेरे पूर्व उत्तर से आप जान गये होंगे ।

प्रश्न – श्रीमद् भगवद् गीता के द्वितीय अध्याय में कहा गया है कि योगस्थ होकर एवं अनासक्त बनकर कर्म करें । इससे मेरे मन में यह शंका पैदा होती है कि कर्म में दिलचस्पी, आसक्ति और तल्लीनता न रखें तो कर्म कैसे संभवित है ॽ
उत्तर – गीता के कथन को ठीक तरह से समझने से आपकी शंका दूर हो जाएगी । गीता यह नहीं कहती कि कर्म में रस, एकाग्रता या आसक्ति मत रखो । कर्म करते समय दिलचस्पी व तल्लीनता का अनुभव जरूरी है । गीता इसका विरोध नहीं करती परंतु वह तो एक और महत्वपूर्ण बात की ओर इंगित करती है कि कर्म करनेवाले व्यक्ति को कर्म के फलस्वरूप उत्पन्न हुई अहंता, ममता, आसक्ति एवं राग-द्वेष की वृत्ति से मुक्त रहना चाहिए । उसे उस कला में कौशल प्राप्त करना चाहिए । कर्म करो किंतु कर्म के संग या बंधन से मुक्त रहो । गीता यही कहना चाहती है । इस तरह समझेंगे तो आप कर्म को दिलचस्पी, एकाग्रता व पूरी लगन से करेंगे । फिर भी आप उसकी विघातक असर से मुक्त रहने की शक्ति प्राप्त कर सकेंगे ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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