Tuesday, October 20, 2020

ज्ञान और भक्ति

प्रश्न – केवल ज्ञान से शांति मिल सकती है क्या ॽ ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा मानने से ही मुक्ति नहीं मिल जाती क्या ॽ
उत्तर – ज्ञान केवल पढ़ने से मिला हो मगर आचार में अनुवादित न हुआ हो तो इससे शांति नहीं मिल सकती । अगर आप मान लें की आप ब्रह्म है फिर भी आपके अंदर काम-क्रोध, अहंता-ममता और विषयों की आसक्ति का नाश नहीं हुआ तो आपको मुक्ति कहाँ से मिलेगी ॽ आपको दुर्गुणों से उपर उठना है, विषय और वासना के बंधनों से मुक्त होना है, तभी आपको मुक्ति का अनुभव होगा और आप ईश्वर तुल्य बन सकेंगे । केवल अपने आपको ईश्वर मानने से ईश्वर तुल्य नहीं बना जाता । इसके लिए आपको ईश्वरत्व यानि ईश्वर जैसे गुणों से संपन्न होना पड़ेगा ।

पाकशाश्त्र की कई किताबें बाज़ार में उपलब्ध है, जिसमें स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की विधि का वर्णन होता है । मगर सिर्फ उसे पढ़ने से क्या भूख का शमन होता है ॽ तृप्ति मिलती है ॽ ड़कार आते हैं ॽ नहीं न । इसके लिए तो आपको रसोईघर में जाकर खाना बनाना पड़ेगा और उसे खाना पड़ेगा । अगर कोई व्याधि हुई हैं तो चरक, सुश्रुत या नागार्जुन जैसे औषधाचार्यों के ग्रंथ पढ़ने से दर्द थोड़ा चला जायेगा ॽ इसके लिए तो आपको ग्रंथो में जैसे बताया गया है, औषधियाँ लेकर उपचार करना पड़ेगा । ज्ञान का भी बिल्कुल वैसा है । सदगुरु द्वारा जो ज्ञान आपको दिया जाता है, या किसी ग्रंथविशेष से आपको जो ज्ञान मिलता है, उसे प्राप्त करने के पश्चात आपको उसे आचरण में अनुवादित करना होगा । ब्रह्म-तत्व का अनुभव करने के लिए आपको ध्यान, धारणा या भक्ति का आधार लेना होगा । इसके अलावा आपको शांति और मुक्ति नहीं मिलेगी ।

बहोत सारा अध्ययन करके भी क्या फायदा ॽ जितना जानते हो उसे आचरण में उतारने का प्रयास करो । अपनी गलतीओं को ढूँढो और सुधारो । जप और ध्यान में लगे रहो । तभी आप ईश्वर के करीब पहूँच सकोगे । याद रखो की ज्ञान का अभिमान साधनापथ पर सबसे बड़ा विघ्न है । सबकुछ छोडना आसान है मगर इसे छोडना अत्यंत कठिन है । अहं साधक को बहुत परेशान करता है । आप जप करने बैठेंगे तो आपका अहं कहेगा कि मैं तो ब्रह्म हूँ, मुझे जप करने की क्या आवश्यकता ॽ ध्यान करने बैठेंगे तो कहेगा, मैं स्वयं परमात्म-स्वरूप हूँ फिर मुझे किसीका ध्यान करूने की क्या आवश्यकता ॽ अहं के कारण आप ध्यान, जप, तप, कीर्तन ठीक तरह से नहीं कर पायेंगे । आपकी वासना और विषयासक्ति बरकरार रहेगी । क्या ब्रह्म आपकी तरह निर्बल, अल्प, कामी, क्रोधी या अभिमानी है ॽ ज्ञान के ऐसे मिथ्याभिमान से आपको बचना होगा । वरना ज्ञान आपको पार लगाने के बजाय डूबो देगा, मुक्त करने के बजाय बंधन में डाल देगा । आप जो भी कर्म करते हैं, इसका फल आपको अवश्य मिलता है । इसलिए केवल विचार का आधार लेकर बैठे ना रहें, उसे आचार में अनुवादित करें और अनुभवसिद्ध ज्ञानी बनें ।

प्रश्न – ज्ञानी या भक्त के एक-दो महत्वपूर्ण लक्षण बताएंगे आप ॽ
उत्तर – मेरे मतानुसार ज्ञानी या भक्त का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है चित्त की स्थिरता । अनेक प्रक्रियाएँ करने के बाद स्थिरता पैदा होती है । जब काम, क्रोध, अभिमान दूर हो जाते हैं और प्रेम, दया, तथा नम्रता का प्रादुर्भाव होता है तब ऐसी स्थिरता प्राप्त होती है । ऐसा स्थिर चित्तवाला साधक सुख-दुःख, निंदा-स्तुति और भले-बुरे प्रसंगों में शांत रह सकता है । गीता में जिन्हें दैवी संपत्ति के नाम से अभिहित किया गया है उसकी प्राप्ति के बिना यह स्थिरता नहीं आ सकती । मन की स्थिरता के अभाव में ध्यान, निदिध्यासन, उपासना या अखंड जप - इनमें से कुछ भी नहीं किया जा सकता । जैसे पवन रहित स्थान में दीपक नहीं हिलता ठीक ऐसी अवस्था स्थिरताप्राप्त पुरूष के मन की होती है ।

इसके पश्चात दूसरा महत्वपूर्ण लक्षण है समता । भक्त या ज्ञानी सर्वत्र परमात्मा का दर्शन करता है । केवल मनुष्यों में ही नहीं, जड, चेतन सभी पशु-पक्षियों में ईश्वर को ही देखता है । विभिन्न नाम व रूप के भीतर अंतरात्मा के रूप में जो परमात्मा विराजित है उनका दर्शन वह करता है । इसलिए उन में रागद्वेष या भेद-भाव पैदा नहीं होते । भेदभाव होने से ही किसी के प्रति राग तो किसी के प्रति द्वेष उत्त्पन्न होता है । जहाँ एक ही ईश्वर विविध भेष में सुशोभित हो रहा है वहाँ फिर किसके प्रति राग और किसके प्रति द्वेष उत्पन्न होगा ॽ किसीसे मोहित होने का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है ॽ स्त्री के हाड-चाम में वह आसक्त नहीं होता अपितु उसमें निहित शक्तिरूपी परमात्मा को निरखकर वह उससे अभेद सिद्ध करता है । ज्ञानी या भक्त, ब्राह्मण, हाथी, गाय, कुत्ते या चांडाल – सब में ईश्वरी आलोक को देखता है ।

तीसरा लक्षण है मुक्ति । ईश्वर-दर्शन करने के कारण भक्त हमेशा के लिए गुण या कर्म के विकार एवं बंधन से मुक्त हो जाता है । यह सब कुछ परमात्मा का ही है, सब कुछ परमात्मा ही है । इस भाव में स्थिति होने से उसकी अहंता और ममता मिट जाती है । ज्ञानी भी आत्मासाक्षात्कार करके सर्वत्र आत्मा का दर्शन करता है । वह भी अहंता-ममता से और प्रकृति के गुणधर्मों से मुक्त होता है । इस मुक्ति से ही परमानंद, सनातन शांति या धन्यता की अनुभूति होती है । इसे ही परमपद कहते हैं ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

Today's Quote

You can get everything you want if you help enough others get what they want.
- Zig Ziglar

prabhu-handwriting

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.

Ok