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शांभवी मुद्रा की सिद्धिवाले महापुरुष

हिमालय स्थित उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध तीर्थस्थान ऋषिकेश की मुलाकात लेनेवाले यात्रियों को गंगा के प्रशांत तट पर स्थित स्वर्गाश्रम एवं लक्ष्मणझूला की स्मृति अवश्य होगी । लक्ष्मणझूला से आगे चलते हुए स्वर्गाश्रम की ओर जाते हुए जो एकान्त शांत मार्ग आता है, वह बड़ा ही मनभावन और रमणीय है । दोनों ओर हरी-हरी पर्वतमाला से घीरी हुई तथा गंगा के विशाल तट से गुजरती वह राह अत्यंत सुहावनी लगती है । उसी रास्ते पर चलते हुए कुछ आगे बढ़ते हैं तो रास्ते में एक पेड़ आता है, जिसके नीचे एक तपस्वी महात्मा बैठे हुए दीखाई पड़ते है । उन पर दृष्टि पडने से एक प्रश्न मन में अवश्य उपस्थित होता है कि यह कोई जिन्दा मनुष्य है या पत्थर से तराशी गई प्राचीनकाल की ध्यानस्थ सुंदर शिल्प-मूर्ति ? उस प्रश्न के उत्तर की आशा में जब हम उसके करीब जाके देखते हैं तो हमारी शंका दूर हो जाती है और हमें प्रतीत होता है कि यह और कोई नहीं, एक जीवित ध्यानस्थ महात्मा की मंगलमयी मूर्ति है । यह जानदार प्रतीमा इतनी स्वस्थ व स्थिर है कि जब तक हम बहुत निकट नहीं जाते, वह पाषाण की प्रतिमा ही भासित होती है ।

अत्यंत अनुपम होता है उन महात्मा पुरुष का दर्शन । वे पद्मासन में बैठते है । गीता के छठे अध्याय में कहा गया है उसी तरह वे शरीर को सीधा करके बैठते है और उनकी दृष्टि दो भ्रमरों के बीच में स्थिर होती है । उनकी बडी-बडी, खुली और नूरानी अखियाँ काँच की पुतली सी दिखाई देती है । ये आँखें निर्निमेष है, तनिक भी हिलती नहीं है । अगर आप ज्यादा समय तक वहाँ ठहरते हैं और निरीक्षण करते हैं, फिर भी उनकी अवस्था में कोई अन्तर नहीं आता । उनका श्वास या प्राण थम गया है ऐसा लगता है । रास्ते से गुजरते हुए यात्री इन अत्यंत कृश शरीरवाले, जटायुक्त, आत्मलीन तपस्वी पुरुष को देखते हैं । कुछ लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक नमस्कार करते हैं तो कुछ दंग रहकर कुछ समय तक वहाँ बैठते भी हैं । कतिपय लोग उनके आगे फैले हुए कपडे पर पैसे भी डालते हैं । वे महात्मा आज बरसों से नित्य निरंतर उसी जगह, उसी तरह बैठे हुए दृष्टिगोचर होते हैं । न तो वे किसीके सामने देखते हैं, न किसीसे बात करते हैं । अपनी अंतरंग आत्मिक साधना के आनंद में डूबे रहकर अपने जीवन के सुनहरे समय को शांति से गुजारते हैं । उनकी आंतरिक भूमिका कितनी उच्च होगी इसके बारे में तो केवल अनुमान ही किया जा सकता है किंतु उनके सर्वसुलभ शंकारहित बाह्य दिखावे पर से इतना तो अवश्य समझ सकते हैं कि उन्होंने आसनसिद्धि हासिल की है, प्राणायाम का गहन अभ्यास किया है, ध्यान पर अच्छा काबू किया है । इसके अतिरिक्त योग में जिसे शांभवी मुद्रा के नाम से अभिहित किया जाता है, वह मुद्रा उन्हें सिद्ध है ।

शांभवी मुद्रा क्या है, यह जानने योग्य है । उस मुद्रा में योगी आसन पर स्थिरता से बैठकर, आँखे खुली रखकर, अपनी दृष्टि को दोनों भ्रमर के बीच क्रेन्द्रित करता है । इसका वर्णन भगवद् गीता में इस तरह किया गया है – भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक । उस वर्णन के अनुसार भ्रमरों के मध्य दृष्टि स्थिर करने से योगी का मन विशिष्ट विषयों, दृश्यों या पदार्थों से उपर उठकर उन्हें नहीं देखता । उनकी दृष्टि अंतर्मुख हो जाती है । प्रारंभ में इस मुद्रा का अभ्यास कष्टसाध्य लगता है, आँखे खींचती है, दुःखती हैं और उनसे पानी टपकने लगता है परंतु धीरज रखके, हिम्मत व उत्साह धारण करके, आगे बढने पर दृष्टि लंबे समय तक स्थिर होती है और सभी तकलीफें मिट जाती हैं । और फिर तो इसके गहन अभ्यास से श्वास मंद होकर स्वतः शांत हो जाता है और साधक अतीन्द्रिय प्रदेश का या समाधि के मंगलमय मंदिर का द्वार खोलकर आगे बढता है । आँखे खुली रहती है परन्तु योगी को शरीर का होश नहीं रहता । योगी देहाध्यास से अतीत हो जाता है । वह भाँति भाँति के असाधारण अनुभव प्राप्त करता है । उन अनुभवों में सबसे श्रेष्ठ अनुभव है आत्मानुभव या आत्मानुभूति । वह भी उसके लिए सहजगम्य हो जाता है । समाधि अवस्था की प्राप्ति के लिए उन्हें आँखे मुँदनी नहीं पडती ।

भगवान रमण महर्षि ने उस अवस्था की प्राप्ति सहज रूप में की थी । उनके दर्शन करनेवाले और उनके आश्रम में रहनेवाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि वे खुली आँख रखकर ही निश्चलता या स्थिरता प्राप्त कर समाधि में पहूँच जाते थे । समाधि अवस्था पर उनका संपूर्ण काबू था । फिर भी वे उस असाधारण अवस्था में प्रवेश करने के लिए शांभवी मुद्रा का आधार नहीं लेते थे ।

बरसों पहले पोल ब्रन्टन भारत के योगियों की खोज में भारतवर्ष में आए थे । दक्षिण भारत में एक एकांत शांत स्थान में रमण महर्षि जैसे ही खुली आँख ध्यानस्थ हुए योगी पुरुष से उनका समागम हुआ था, जिनके नैन काँच जैसे अचेतन दिखाई देते थे । इसी योगी का वर्णन उन्होंने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘ए सर्च इन सीक्रेट इन्डिया’ के ‘कभी न बोलनेवाले संत’ नामक प्रकरण में किया है । ऋषिकेश की इस दिव्य भूमि में इन आत्मलीन ध्यानस्थ महात्मा पुरुष को देखकर उपरोक्त पुस्तक की याद आ जाती है । साथ ही उसमें निहित योगी का वर्णन स्मृतिपट पर उभरकर सामने आता है ।

घंटे पर घंटे गुजरते जाते हैं फिर भी महात्मा पुरुष का शरीर तनिक भी नहीं हिलता, उनकी आँख भी नहीं हिलती और गहन ध्यान की अवस्था कभी नहीं तूटती । ऐसा लगता है मानो उनका मन आत्मिक जगत की किसी अलौकिक अनुभूति के सागर में मस्ताना होकर गोता लगाकर एकाकार हो गया है । गोता लगाने के कारण उनको किसी महामूल्यवान मोती की प्राप्ति हुई है । परम अनुभव के प्रदेश में भौतिक वातावरण का कोई असर नहीं होता और विविध आघात-प्रत्याघात भी नहीं सताते । हिमालय की प्रशांत पर्वतमाला की तरह वे अडिग व अचल है । इर्दगिर्द फैली नीरवता और निर्मलता उनमें भी मूर्तिमंत होकर बैठ गई है । जिस तरह गंगामैया अपने दर्शन, स्पर्श एवं स्नान से सबको शांति प्रदान करती है उसी तरह उनके दर्शन भी आत्मिक पथ के प्रवासियों के लिए प्रेरक, शक्ति व शांतिप्रदायक सिद्ध होता है । साधनारत ऐसी उनकी उपस्थिति ही साधकों के लिए लाभकारक सिद्ध होती है ।

किसीके दिमाग में यह प्रश्न उठ सकता है कि आत्मसाधना में इतनी उन्नति प्राप्त करनेवाले वे महात्मा सुबह से शाम तक इस तरह रास्ते पर सब देख सके इस तरह क्यों बैठते है ? बाहर सबके सामने बैठने में प्रतिष्ठा का मोह क्या नहीं समाया है ?

हम उन्हें उत्तर देंगे कि बाहर सबके सामने बैठने में उनका प्रतिष्ठा का मोह ही जिम्मेदार है ऐसा नहीं समझना है । वे महात्मा पुरुष बजाय अपनी कुटिया में बैठने के, हमेशा बाहर आम रास्ते पर क्यों बैठते हैं यह तो वही जाने किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि इससे जाने या अनजाने एक महत्वपूर्ण हेतु सिद्ध होता है । उच्च कोटि के महान तपस्वी, साधक, योगी एवं महात्माओं के दर्शन की अभिलाषा से प्रेरित होकर कई यात्री हिमालय आते है । उनके लिए उच्च कोटि के सभी संतो के दर्शन मुमकीन नहीं होते । उनके समागम के लिए उन्हें पर्वत-पर्वत, जंगल-जंगल भटककर ढूँढना पडता है और फिर भी वे शायद ही मिलते है । जब कि ये महात्मा बाहर रहते हैं इसलिए उनका दर्शन सबके लिए सदैव सुलभ है । इसके अतिरिक्त एक और सत्य बात का पता भी इससे चलता है कि योग के या अन्य ग्रंथो में शांभवी मुद्रावाले या समाधिनिष्ठ योगीओं के जो वर्णन उपलब्ध है वे नितांत सत्य है और इस जमाने में भी इसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है । इस बात की प्रतीति भी हमें उन्हें निरखने से स्वतः हो जाती है । साधकों को इससे प्रेरणा और उत्साह प्राप्त होता है । वे इस तरह अन्य लोगों की सेवा कर रहें है । इस दृष्टि से देखा जाय तो उनका इस तरह आम रास्ते पर बैठना उचित जान पड़ता है ।

- श्री योगेश्वरजी

Comments  

+2 #2 Krishna bihari Jayswal 2013-06-14 01:36
Dhanyawad. jo boyega wo payega. jaisi karni wasi bharni.
+2 #1 Amit 2010-06-03 21:50
ऐसे योगीओं को, ऐसे तपस्वीओं को हम बराबर दंडवत प्रणाम करते है । श्री राधे ।

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The character of a person is what he or she is when no one is looking.
- Anonymous

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Shri Yogeshwarji : Canada - 1 Shri Yogeshwarji : Canada - 1
Lecture given at Ontario, Canada during Yogeshwarjis tour of North America in 1981.
Shri Yogeshwarji : Canada - 2 Shri Yogeshwarji : Canada - 2
Lecture given at Ontario, Canada during Yogeshwarjis tour of North America in 1981.
 Shri Yogeshwarji : Los Angeles, CA Shri Yogeshwarji : Los Angeles, CA
Lecture given at Los Angeles, CA during Yogeshwarji's tour of North America in 1981 with Maa Sarveshwari.
Darshnamrut : Maa Darshnamrut : Maa
The video shows a day in Maa Sarveshwaris daily routine at Swargarohan.
Arogya Yatra : Maa Arogya Yatra : Maa
Daily routine of Maa Sarveshwari which includes 15 minutes Shirsasna, other asanas and pranam etc.
Rasamrut 1 : Maa Rasamrut 1 : Maa
A glimpse in the life of Maa Sarveshwari and activities at Swargarohan
Rasamrut 2 : Maa Rasamrut 2 : Maa
Happenings at Swargarohan when Maa Sarveshwari is present.
Amarnath Stuti Amarnath Stuti
Album: Vande Sadashivam; Lyrics: Shri Yogeshwarji; Music: Ashit Desai; Voice: Ashit, Hema and Aalap Desai
Shiv Stuti Shiv Stuti
Album : Vande Sadashivam; Lyrics: Shri Yogeshwarji, Music: Ashit Desai; Voice: Ashit, Hema and Aalap Desai
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