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माँ आनंदमयी

ऐसा प्रश्न अक्सर जिज्ञासुओं की ओर से पूछा जाता है कि आध्यात्मिक उन्नति की साधना में पुरुषों की भाँति स्त्रियाँ भी आगे बढ सकती है या सिद्धहस्त बन सकती हैं क्या ? इस प्रश्न का आजके प्रगतिशील – स्त्री-पुरुषों की समानता के - युग में शायद ही कोई स्थान हो सकता है । फिर भी यदि प्रश्न पूछा ही जाता है तो उत्तर में मुझे कहने दो कि आद्यात्मिक तरक्की की साधना में स्त्री-पुरुष के कोई भेद नहीं है । वहाँ तो योग्यता देखी जाती है और इसीलिए आवश्यक योग्यतासंपन्न कोई भी स्त्री या पुरुष साधना का आधार लेकर आगे बढ सकते हैं और सिद्धहस्त भी बन सकते हैं । सामान्यतया हमारे यहाँ ऐसा विचार प्रचलित है कि आध्यात्मिक विकास की साधना में स्त्रियों को आसानी से सफलता नहीं हासिल होती ।

परंतु यदि तटस्थ या निष्पक्ष रुप से देखा जाय तो वैसा नहीं लगता । परिस्थिति इससे ठीक विपरीत प्रतीत होती है । नारियाँ अपने मृदु, भावमय एवं स्नेहिल हृदय के कारण, अपनी त्यागशीलता या समर्पण-भावना के कारण आत्मोन्नति या ईश्वर-साक्षात्कार के क्षेत्र में आसानी से और सचमुच ही आगे बढ सकती है, इसमें कोई संदेह नहीं । परंतु शर्त यह है कि उन्हें अवसर मिलना चाहिए और उस अवसर का अधिकाधिक सदुपयोग किया जाय इसके लिए पथप्रदर्शन मिलना चाहिए ।

अतीत काल में झाँकते है तो भारतवर्ष में शबरी, गार्गी, मैत्रेयी, जनाबाई और मीरां जैसी विदुषी नारीयाँ दिखाई देती है । वर्तमानकाल में भी ऐसी ज्ञानी, योगी या भक्त नारीयाँ है और हो रही है यह इस देश का परम भाग्य है । साधना की उच्च अवस्था प्राप्त सभी नारियाँ प्रसिद्ध नहीं होती । कतिपय अज्ञात अवस्था में भी रहती हैं फिर भी भारत के आध्यात्मिक गगन में जो इनेगुने, कतिपय असाधारण आकर्षक आभावाले नक्षत्रों का उदय हुआ है और जो अपने पावन प्रकाश से पृथ्वी को प्रकाशित करते है, उनमें माँ आनंदमयी का स्थान विशेष उल्लेखनीय एवं निराला है । प्रकाश के पथ में अभिरुचि रखनेवाले लोगोंने उनका नाम अवश्य सुना होगा ।

माँ आनंदमयी का जन्म बंगाल में हुआ था परंतु उनका कार्यक्षेत्र केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं है । वे बंगाल की नहीं अपितु भारत की हैं । विशाल अर्थ में कहा जाय तो वे समस्त संसार की हो गई है । भारत के विभिन्न प्रदेशों में एवं भारत के बाहर विदेशो में भी उनके असंख्य प्रसंशक और अनुयायी है । कई साधक उनकी ओर आदर से देखते रहते है ।

वे ज्यादातर विचरण करती रहती है । उनका नाम भी सूचक है, नाम के अर्थानुसार वे सचमुच आनंदमयी है । उनके मुख पर अतीन्द्रिय अवस्था का आनंद छलकता हुआ दीख पडता है । मानो आनंद की प्रतिमूर्ति सामने ही बैठी हो ऐसा प्रतीत होता है । वही अलौकिक, विशुद्ध आनंद उनके नयन, वाणी एवं मुख से सहज ही निःसृत होता रहता है । उसे देख उनका नाम सचमुच सार्थक हो ऐसा लगता है ।

आध्यात्मिक साधना की उच्चोच्च अवस्था प्राप्त होने पर भी माँ आनंदमयी अत्याधिक सरल, निश्छल एवं विनम्र है । उम्र बडी होने पर भी उनका हृदय छोटी बाला की भाँति सरल है । श्वेत वस्त्र, लंबे-लंबे काले-काले बाल, मस्तक पर जटा, गौर वर्ण लेकिन शरीर थोडा स्थूल दिखता है । उनके निकट बैठना यह जीवन का एक अविस्मरणीय अनुपम सौभाग्य है ।

उनका व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक होने के कारण असंख्य लोग उनके इर्दगिर्द इक्ट्ठे होते है । वे पढीलिखी नहीं है लेकिन आत्मज्ञानी है और साधना के मार्ग में तो आंतरिक ज्ञान, अनुभवजन्य ज्ञान ही महत्वपूर्ण होता है, इसमें क्या शक है ? ऐसा ज्ञान आवश्यक एवं अमूल्य माना जाता है । उनके ज्ञानालोक से प्रेरित व प्रभावित होकर बडे-बडे पंडित, प्रोफेसर एवं साक्षर उनके सत्संग एवं पथप्रदर्शन से लाभान्वित होते है ।

माँ आनंदमयीने विवाहित जीवन में प्रवेश किया है । उनके पति बरसों तक उनके साथ रहते थे । गृहस्थाश्रम में रहकर भी वे उनसे अलिप्त रहे । दैहिक भोगोपभोग की ओर उनका मन नहीं लगता था । उनको तो आत्मविकास में ही दिलचस्पी थी और यही कारण है कि उन्होंने अपने पति को भी साधनापरायण बनाया, उनके हृदय को जीत लिया । जब पति का देहांत हो गया तो उनके सभी लौकिक बंधन तूट गये और वे अकेले ही विचरण करने लगे ।

सादगी, स्नेह तथा अपरिग्रह की प्रतिमूर्ति समान माँ आनंदमयी सांप्रत भारत के संतो में महत्वपूर्ण मूर्धन्य स्थान रखते हैं । नारी होने से उनका मूल्य ओर भी बढ़ जाता है ।

नारीयाँ आत्मविकास की अधिकारीणि नहीं है, आत्मिक क्षेत्र में उनका कोई योगदान नहीं है ऐसा माननेवाले स्त्रीपुरुषों के लिए उनका जीवन एक प्रेरणा-स्त्रोत के समान है । मा आनंदमयी अपने जीवन द्वारा सिद्ध करती है कि आत्मिक मार्ग में नारी आगे बढ़ सकती है इतना ही नहीं, उच्चोच्च पद पर आसीन हो सकती है ।

यों तो वे योगमार्ग की उपासिका है पर उनका हृदय भक्त का है और इसीसे भजनकीर्तन में उनकी विशेष रुचि है । नाम संकीर्तन उनका प्रिय विषय है । संसार के विषय उन्हें लुभा नहीं सकते । उनका अंतर कमल की भाँति अलिप्त रहता है । भोगविलास के वातावरण में रहने पर भी त्याग के आदर्श से वे वंचित नहीं है । इसी संदर्भ में उनके जीवन की एक छोटी-सी घटना याद आती है ।

सन १९५६ के जून महिने की बात है । माँ आनंदमयी उस समय सोलन स्टेट के राजा के निमंत्रण से सीमला हिल्स के प्रसिध्ध स्थान सोलन में पधारी थी । उस वक्त मेरा और उनका आकस्मिक मिलाप हो गया । कुछ दिन उनके साथ रहना भी हुआ । इस बीच एक बार रात को प्रायः दस बजे उनके पास एक मध्यम वर्ग का आदमी आया और उसने कहा, ‘माताजी, आपके लिए यह साडी लाया हूँ ।’

माताजी कमरे में चहलकदमी कर रही थी, रुक गई और बोली, ‘साडी लाये हो ? मेरे पास तो है । अतिरिक्त लेके क्या करूँ ?’

‘साडी तो आपके पास होगी ही । आपको भला किस चीज की कमी है ? मैं तो यह प्रेम से लाया हूँ । स्वीकारोगी तो मुझे खुशी होगी ।’

इतना बोलते हुए उस सज्जन की आँखे गिली हो गई । वे ज्यादा बोल न सके । माताजी का दिल पिघल गया । उन्हों ने वह श्वेत साडी ले ली ।

अंदर के कमरे में जाकर उन्होंने वह साडी पहन ली और बाहर आई । उनके हाथ में पहले पहनी हुई साडी थी । उसे अर्पण करते हुए कहने लगी, ‘यह साडी तुम ले लो । जरुरत से ज्यादा साडीयाँ इकठ्ठी करके मुझे क्या करना है ? आवश्यकता पडने पर परमात्मा देता है ।’

उस सज्जन ने साडी ले ली, यूँ कहो उसे लेनी पडी । इस प्रसंग का प्रभाव मुझ पर बहुत पडा । प्रसंग छोटा था मगर उसका संदेश बडा था । इस घटना से माँ आनंदमयी की त्याग-भावना पर प्रकाश पडता है । आज भी मैं उसे कैसे भूल सकता हूँ ?

माँ आनंदमयी प्रवचन नहीं करती । प्रश्नों के उत्तर देती है । मीतभाषिणी होकर अपनी उपस्थिति से ही शांति प्रदान करती है, प्रेरणा व पथप्रदर्शन देती है । उनका शांत समागम भी जीवन का पाथेय बन जाता है और जीवन में क्रांति पैदा कर देता है ।

उनकी आध्यात्मिक प्रेम-परब अनेकों के लिए आशीर्वाद समान है । शांत रहकर भी अत्यधिक महत्वपूर्ण काम करती है । भारत के आध्यात्मिक इतिहास में वे अमर हैं और रहेंगी ।

- श्री योगेश्वरजी

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