Wednesday, August 05, 2020

मोटा की मुलाकात

‘मेरे गुरु ‘धूनीवाला दादा’ के नाम से पहचाने जाते थे । वे एक समर्थ सिद्धपुरुष थे और मध्यप्रदेश में रहते थे । मेरा आत्मविकास उन्होंने किया था । उन्होंने मेरी बडी भयंकर कसौटी की थी और तत्पश्चात अपनी कृपा बरसाई थी । उनकी कृपा ही मेरा सबकुछ है । उनकी आज्ञा थी कि लोगों को साधना-पथ में ले जाने के लिए आश्रम बाँधना और वह भी दक्षिणवाहिनी नदी के तट पर ही । उनकी आज्ञानुसार मैंने आज तक तीन आश्रम बनाये हैं । एक यहाँ सुरत शहर में, एक नडियाद में और एक दक्षिण में कावेरी-तट पर कुंभकोणम् में । ये सभी आश्रम दक्षिणवाहिनी नदी के किनारे पर, गाँव से दूर जंगल या स्मशान में हैं । बस्ती के साथ उन्हें कोई संबंध नहीं है । जिन्हें साधना करके आगे बढना है उन्हींको आश्रम में रखता हूँ । मेरा उद्देश्य यही है कि यहाँ रहकर मनुष्य शांति से साधना करे और सच्चे तरीके से जीवन जीने का बल प्राप्त करे । आप उस स्थान में आये इससे मुझे बडा आनंद हुआ ।’

ये उदगार थे पूज्य मोटा के जो भक्तो में हरि ओम महाराज या मोटा के नाम से प्रसिद्ध है । उनका आश्रम सुरत से छ मिल दूर तापी के दूसरे किनारे पर है । हम आश्रम के उस निवासस्थान पर पहुँचे तब खिडकी में से मुझे देख उन्होंने ‘आईए प्रभु, पधारिये’ कहकर मीठी, मधुरी, सरल, निखालस व नम्रतापूर्ण वाणी से मेरा सत्कार किया ।

पलंग पर लेटे ही उन्होंने कहा, ‘रीढ़ की हड्डी का मनका खिसक गया है इसलिए बैठने में दिक्कत होती है, अतः लेटा हूँ । डोक्टर आपरेशन के लिए कहते हैं पर मैंने तो ईश्वर पर छोड़ दिया है । वही ठीक कर देगा ।’

मोटा की ईश्वरपरायणता, नम्रता व गुरुभक्ति बडी भारी थी । उन्होंने कहा, ‘गुरु महाराज ने कभी भी कायर होना नहीं सिखाया । कायरता मेरी प्रकृति में ही नहीं है । गुरु कुछ भी कहें वह करने तैयार रहता हूँ । एक बार गुरु ने कसौटी करने के लिए आज्ञा की कि सागर में कूद पडो और मैं कूद पडा । जिसने आज्ञा दी उसीने हमारी रक्षा भी की ।’

‘शंकराचार्यजी के जीवन में भी ऐसा प्रसंग आता है न !’ मेरे स्मरणपट पर शंकराचार्य उपस्थित हुए ।

‘वह प्रसंग कह सुनाईए, प्रभु !’ मोटा बोले, ‘आपके मुँह से कुछ सुनाइये, मैं पढा-लिखा नहीं हूँ ।’

मोटा की नम्रता भी बहुत उच्च कोटि की थी । मैंने कहा, ‘जो सच्चा पढना है वह तो आपने पढ लिया है । किसी ओर पढाई की क्या जरुरत हैं ?’

‘ना, ना, प्रभु सुनाइए न ।’

‘शंकराचार्यजी नर्मदा में स्नान करते करते सामने के किनारे पहूँच गये और वहाँ से अपने शिष्यों के पास कपडे माँगे । नदी में कूदने की किसी में हिम्मत न थी अतः सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे । आखिरकार एक श्रद्धालु शिष्य ने कपडे ले नदी में चलना शुरु किया । उसने जब एक कदम रखा तो वहाँ एक सुंदर कमल हो गया । इस तरह प्रति पद पर कमल की सृष्टि होती गई और उस पर पैर रखकर वह शंकराचार्य के निकट पहूँच गया । शंकराचार्य ने उसकी श्रद्धाभक्ति देखकर उसे धन्यवाद दिया और उसके पैर के नीचे कमल प्रकट हुए थे अतः उसका नाम पद्मपादाचार्य रखा । कितनी अदभूत है श्रद्धा की महिमा !’

‘वाह, प्रभु वाह !’

थोडी देर बात करने के बाद पूज्य मोटा ने हमें आश्रम दिखाने का प्रबंध किया ।

आश्रम का वातावरण बडा ही शांत व सुंदर था । निकट ही तापी नदी का प्रवाह बह रहा था जिससे आश्रम की शोभा में चार चाँद लगते थे । आश्रम बहुत छोटा है पर उसका काम बडा है । देश में आश्रम तो बहुत हैं पर यह आश्रम विलक्षण है । यहाँ अन्य किसी आश्रम की तरह कोई प्रवृति नहीं होती है किन्तु आत्मविकास की साधना की ओर ही साधको का ध्यान खींचा जाता है । साधकों या एकांत-प्रेमीयों को रहने के लिए अलग कमरे के व्यवस्था है जिसमें बाथरूम और पैखाने की स्वतंत्र व्यवस्था है तथा झूले भी रखे गये हैं । पूर्वसंमति प्राप्त कर कोई भी स्त्रीपुरुष उस कमरे में सात, चौदह या इक्कीस दिन रह सकता है । उस समय संपूर्ण एकांतवास करना होता है । कमरे नितांत बंद रखे जाते है । दिवार में एक खिडकी है जिसमें भोजन की थाली रखी जाती है और निर्धारित समय पर चा या दूध भी रखा जाता है । एकांतवासी व्यक्ति कपडे भी उसी जगह रख देते है । वहाँ से हररोज कपडे धोने के लिये लिए जाते हैं । सुबह चार बजे उठना और रात को आठ बजे सोना अनिवार्य माना जाता है । मंगलवार के प्रभात जब नये एकांतवासी आते थे उस वक्त मोटा उनके सामने प्रवचन करते थे । उनकी वाणी का लाभ व्यवस्थित रूप से तभी मिल सकता था ।

- श्री योगेश्वरजी

Add comment

Security code
Refresh

Today's Quote

When I admire the wonders of a sunset or the beauty of the moon, my soul expands in the worship of the creator.
- Mahatma Gandhi

prabhu-handwriting

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.

Ok