Thursday, August 06, 2020

ईश्वर की कृपा का दर्शन

‘पर्वतों की रानी’ के रोचक नाम से पुकारी जानेवाली मसूरी नगरी का प्रवास जिन्होंने किया होगा उन्होंने वहाँ की चित्रशाला का अवश्य दर्शन किया होगा । उसके आचार्य श्री रुपकिशोर कपूर ने देशनेताओं, देवी-देवताओं, विविध घटनाओं एवं प्रकृति के चित्रों का निर्माण किया है, जिनकी कलात्मकता देख बहुत से लोगों ने उन्हें सराहा होगा । यह रम्य चित्रशाला केवल मसूरी की ही नहीं परंतु समुचे देश की अनमोल सांस्कृतिक निधि है । इसमें तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं ।

गुरुजी के प्यारे नाम से मशहूर श्री रुपकिशोर कपूर की उस सुंदर चित्रशाला में गत अप्रैल के अंतिम सप्ताह में सहसा आग लग गई ।

उस मकान में चित्रशाला के अलावा दूसरी चार दुकानें भी थी । उसमें रहनेवाले लोग वहाँ रात को सोने गए । गुरुजी भी इस हेतु गए । इसी समय मकान के उपरी हिस्से में लगी आग पवन की सहायता से चारों ओर फैलने लगी ।

गुरुजी को किसीने जोर-जोर से चिल्लाकर जगाया और आग के समाचार दिये । गुरुजी अन्य पडोंशीओं की तरह जगे और बाहर निकले । आग तो इतनी तेजी से फैल रही थी कि उससे किसी भी चीज को निकालना असंभव था ।

आग बडी तेजी से बढ रही थी । थोडा ज्यादा वक्त हो गया होता तो गुरुजी भी न बचते । लडखडाते हुए गुरुजी मकान के सामने के वृक्ष के नीचे बैठ गये । कुछ ही समय में आग ने अपनी लपटों से सारे मकान को भस्मीभूत बना दिया । यह घटना अत्यधिक भीषण व करुण थी ।

इसकी जानकारी मिलने पर मसूरी का जनसमुदाय इकट्ठा हो गया । वे गुरुजी को दिलासा देने लगे । तब गुरुजी ने कहा, ‘मुझे तो ईश्वर की ऐसी लीला का दर्शन करने में मझा आता है ।’

यह सुनकर लोगों ने समजा की गुरुजी पागल हो गये हैं । मसूरी में आग बुझाने के पर्याप्त साधनों का अभाव था और आग भी बडी भयानक थी । अतएव देढ या दो घंटो में समग्र मकान स्वाहा हो गया ।

एक पंजाबी परिवार गुरुजी को अपने घर ले गया । दूसरे ही दिन वे देहरादून गये । उनका मन अब मसूरी से उचट गया । लेकिन ईश्वर की योजना कुछ भिन्न ही थी । देहरादून में रातभर नींद न आने से वे पुनः मसूरी लौटे । मसूरी में रहेने के लिए छोटा सा मकान उन्हें मिल गया ।

चित्रशाला के विनाश पर उनके असंख्य प्रेमीयों, प्रसंशकों एवं शुभकांक्षीयों ने दुःख प्रकट किया और उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त की पर आश्चर्य की बात तो यह थी कि इतने कष्टदायी प्रसंग से भी गुरुजी का मन अस्वस्थ न हुआ ।

उन्होंने सबसे कहा, ‘आग की घटना से मुझे तनिक भी दुःख नहीं, इसमें मुझे ईश्वरकृपा के ही दर्शन होते हैं । पिछले कई महिनों से मुझे चित्रशाला के भविष्य की चिंता होती थी कि ईश्वर कोई हल उपस्थित करे तो अच्छा लेकिन ऐसा अजीब हल होगा इस बात की मुझे कल्पना भी न थी । लेकिन जब समस्या का हल आ ही गया है तो बडबडाहट का कोई अर्थ नहीं है । उसका स्वीकार करना ही अच्छा । सर्जन और विसर्जन तो सृष्टि का क्रम ही है । चित्रशाला को छोडकर मुझे जाना ही था, उसके बजाय वे मुझे छोड गई । जो हुआ वह अच्छा ही हुआ । मेरी शेष ममता भी चली गई । ईश्वर हमारे जीवन में किस तरह और किस समय कल्याणकर सिद्ध होता है यह किसे मालूम ? मेरी जिन्दगी में इससे पहले जिसे कभी नहीं पाया वैसी गहरी शांति का अनुभव मुझे हो रहा है । ईश्वर ने मुझे मेरी प्रिय चीज से वंचित करके अत्यंत अनमोल वस्तु प्रदान की है । मैंने अनेक संतपुरुषों का समागम किया है । इसके फलस्वरूप मुझे इस विवेक की प्राप्ति हुई है ।’

सचमुच उनका यह विवेक सराहनीय था । महान संत भी कभी वस्तु के वियोग से दुःखित होकर मन की स्थिरता गवाँ देते हैं जब कि गुरुजी की दृष्टि या वृति सचमुच अभिनंदनीय थी । समजदार इन्सान भी समय आने पर गम करने बैठता है जब कि गुरुजी नितांत स्वस्थ थे । यह ईश्वर की कृपा नहीं तो और क्या ? सर्जन की तरह सर्वनाश में भी वे इश्वर-कृपा का ही दर्शन करते थे । ऐसी दृष्टि अगर सब में आ जाए तो जीवन में कितने दुःख कम हो जायें !

मसूरी में आज चित्रशाला तो नहीं है, परंतु उसके जनक - जीवन के सच्चे कलाकार – गुरुजी है और उनका समागम करने योग्य है ।

- श्री योगेश्वरजी

Comments  

0 #1 K. K. Mishra 2013-12-25 17:42
no words to express myself. sastang pranam.

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There is no pillow so soft as a clear conscience.
- French Proverb

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