Tuesday, August 04, 2020

धन की सिद्धि

इस्वी सन १९४५ के पूस महिने की बात है ।

माँ आनंदमयी को मिलने की इच्छा से मैं देवप्रयाग से आल्मोडा गया था । देवप्रयाग से हरिद्वार, बरेली और काठगोदाम होकर मैं आल्मोडा में पातालदेवी स्थित माँ आनंदमयी के आश्रम पहूँचा । आश्रम देख मुझे प्रसन्नता हुई । चारों ओर आसमान को छूनेवाले ऊँचे ऊँचे पर्वत और इस बीच आश्रम । कितना सुंदर दृश्य था !

परंतु आश्रम में माँ आनंदयी न थी । तीन साल से वे वहाँ न आई थी । आश्रम के प्रबंधक संन्यासी महाराज ने कहा, ‘निकट के भविष्य में माताजी के आने की कोई संभावना नहीं है।’

मुझे लगा की माताजी की मुलाकात असंभवित हो तो आश्रम में रहने का कोई अर्थ नहीं है । इससे तो मैं मेरे देवप्रयाग स्थित शांत आश्रम में रहूँ तो कैसा ? मैंने देवप्रयाग जाने का निश्चय कर लिया पर केवल निश्चय से देवप्रयाग थोडे ही पहूँच सकते है ? इसके लिए पैसे चाहिए । जेब में देखा तो केवल दो रूपये थे । कैसे जाएँगे ?

हृदय के अंतरतम से मैंने प्रार्थना की, ‘हे प्रभु ! आपके भरोसे पर ही मैं यहाँ आया हूँ । अब आप सहायता करेंगे तभी वापस जा सकूँगा । अगर आप सचमुच भक्तों के रखवाले हो और उनके योगक्षेम को वहन करनेवाले हों तो मुझे किसी भी तरह सहायता किजीये जिससे मैं बिना किसी मुसीबत के यहाँ से बिदा ले सकूँ ।’

दयालु प्रभु ने मेरी प्रार्थना सुन ली । उसी दिन सुबह एक साधुपुरुष मेरे समीप आये । उम्र बीस साल, लंबे काले-काले बाल, लंबा उनी झब्बा धारण किये हुए । उन्होंने मुझे नमस्कार किया । मुझे यह देख प्रसन्नता हुई ।

मैंने पूछा, ‘कहाँ से आते हो ?’

उन्हें मौनव्रत था इसलिए झोली से स्लेट-पेन निकालकर लिखने लगे, ‘कैलास मानसरोवर से आता हूँ ।’

मुझे लगा, कैलास से इस ऋतु में कैसे आ सकते हैं ? जाडे के मौसम में वहाँ आना-जाना असंभव होता है । उन्होंने आगे लिखा, ‘एकाध साल से मानसरोवर रहता था और अब बदरीनाथ जाना है इसलिए इस ओर आया हूँ ।’

मैंने उनसे एक स्वलिखित गीत, जो मैंने कुछ-ही दिन पहले लिखा था, पढ सुनाया । इससे खुश होकर वे कहने लगे, ‘मैं आपकी सेवा करना चाहता हूँ ।’ वे सब बातें लिखकर, हिंदी में कर रहें थे ।

मैंने कहा, ‘आप मेरी क्या सेवा करोगे ? तुम तो फक्कड मालूम पडते हो । तुम्हारे पास क्या है ?’

उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया, ‘ऐसा नहीं है, मैं सचमुच आपकी सेवा करना चाहता हूँ । भरोंसा करके तो देखो ।’

और फिर क्या था, उन्होंने झोली से एक थैली निकाली । वह सीली हुई और छोटी-सी थी ।

उन्होंने लिखकर पूछा, ‘कितने रूपये चाहिए ? जब तक आप इन्कार नहीं करेंगे तब तक इसमें से रूपये निकलते रहेंगे । मेरे पास इस बिना इस थैली के कुछ भी नहीं है ।’

मुझे अत्यंत आश्चर्य हुआ । क्यों न हो ? आखिर बात भी वैसी थी । थैली की करामत सुन मेरा मन सोचने लगा । क्या एसी शक्ति संभवित है ? मुझे सहायता देने आनेवाले यह महापुरुष कोई समर्थ योगी होंगे या फिर साक्षात् ईश्वर ?

परंतु उन्होंने तो थैली खोली । इससे चमकते हुए नये रुपये निकलने लगे, मानो टंकसाल से ही निकल रहे हों । मुझे ३५ रुपये की आवश्यकता थी मगर उन्होंने बडे आग्रह से चालिस दिये ।

उन्होंने लिखा, ‘आप पर प्रेम होने से मैंने इस थैली का उपयोग किया है । अन्यथा इसे गुप्त रखता हूँ । मेरी अनेक सिद्धियों में से यह एक है ।’

मैं तो यह देख दंग रह गया । रानीखेत तक हम दोनों मोटर में एकसाथ थे । फिर वे जुदा हुए तब मैंने पूछा, ‘आपका शुभ नाम ?’

उन्होंने लिखा, ‘रामदास ।’

वे कोई समर्थ योगी थी, राम के दास थे, ईश्वर थे या साक्षात् राम थे यह बात मैं आज भी सोच रहा हूँ, किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि वे सचमुच अत्यंत असाधारण महापुरुष थे ।

- श्री योगेश्वरजी

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