आमुख

देवभूमि से अधिक महिमावान, ऋषिमुनिसेवित भारत की तपोभूमि में अतीत से लेकर अद्यतन कालपर्यंत विभिन्न संत, महात्मा, योगी और तपस्वीओं ने जन्म लिया है । अपने लोकोत्तर जीवन से उन्होंने जनसाधारण को प्रेरणा प्रदान की है, उनका पथप्रदर्शन किया है । एसे ज्योतिर्धरों की प्राणवान परंपरा को श्री योगेश्वरजी ने आगे बढाया है । उनकी आत्मकथा का अध्ययन करने से हमें इस बात का पता चलता है ।

श्री योगेश्वरजी के ज्योतिर्मय जीवन का मैं कई सालों से साक्षी रहा हूँ । मैंने गुजरात में साबरमती के तट पर स्थित उनका जन्मस्थान देखा है, जहाँ रहकर उन्होंने कठिन साधना की वो देवप्रयाग का शांताश्रम भी देखा है । उनके व्रत-उपवास तथा साधनात्मक जीवन को नजदिक से देखने का मुझे सौभाग्य मिला है । मैंने उनकी शुचिता, मोहरहितता तथा स्थितप्रज्ञता देखी है । इससे मुझे प्रतीत हुआ है की वे आज के युग के असाधारण महामानव है । मैंने अपने जीवन में कई संत-महात्मा देखें है, मगर योगेश्वरजी जैसे सच्चे, संपूर्ण और सर्वांगीण विकास करनेवाले महापुरुष नहीं देखे । योगेश्वरजी का जीवन भारतीय साधना, तत्वज्ञान और संस्कृति का अलौकिक समन्वय है ।

अपनी इस आत्मकथा में उन्होंने सीधीसादी और सरल भाषा में अपनी जीवनसाधना तथा उनके फलस्वरूप प्राप्त हुई अनेकविध सिद्धिओं का वर्णन किया है । यह कितना रोचक, प्रेरक और पथप्रदर्शक है ये तो इसका अध्ययन करनेवाले वाचकों को पता चलेगा । मैं तो यही कहूँगा की जिस घर और कुल में उनका जन्म हुआ है, वो धन्य है । जहाँ वो पले-बडे हुए है वो भूमि धन्य है । उनकी पवित्र पदरज को धारण करनेवाली यह धरती धन्य है । एसे महापुरुष का दर्शन युगों के बाद परम सौभाग्य से होता है ।

योगेश्वरजी ने साधना का जटिल पंथ केवल इश्वर पर भरोंसा रखकर, करुणामयी माँ का आश्रय लेकर, उसका हाथ थामकर शुरु किया था और इसे सफलतापूर्वक पूर्ण किया है । इस दौरान वो हमेशा सावध, जाग्रत और निरंतर आत्मनिरीक्षण करते रहे है । एसा करने से वो छोटे-बडे प्रलोभनों से बच पायें है । छोटे-से गाँव में जन्म लेनेवाले योगेश्वरजी अभ्यास के लिये बंबई गये । वहाँ उन्होंने आत्मिक पथ पर चलने का संकल्प किया । फिर वो हिमालय गयें, और विभिन्न ज्ञात और अज्ञात सिद्ध महापुरुषों से मिलें । साधना के अलौकिक अनुभव प्राप्त करके वो सिद्धि के सर्वोत्तम शिखर पर पहूँच गये । यह भगीरथ कार्य उन्होंने बडी लगन, धीरज, हिंमत और श्रद्धा से किया है । साधकों को उनके जीवन से बहुत कुछ सिखना है । इस आत्मकथा को पढने-से वे साधना के नाम पर पैदा होनेवाली भ्रांति और कपोलकल्पित मान्यताओं से बच पायेंगे ।

वैसे योगेश्वरजी का पूरा जीवन आश्चर्यकारक है, मगर साधनाकाल में उन्होंने जो अनशन-व्रत किये, वो अपने आप में अनूठे है । इससे उनकी परमात्मप्रीति और निष्ठा का परिचय मिलता है । उनकी साधना केवल अपने लिये नहीं थी, उसका वास्ता देश, दुनिया तथा समाज के सभी लोगों की भलाई से था । हिमालय में रहते हुए भी उन्होंने देश की आझादी के लिये निरंतर प्रार्थनाएँ की थी । उनकी आत्मकथा से यह प्रमाणित होता है की वो एक प्रखर राष्ट्रभक्त और राष्ट्रविधायक भी है । देश की मौजूदा राजकीय परिस्थिति में परिवर्तन लाने के लिये उन्होंने अपनी और से प्रयास किये है ।

उनके पूर्वजन्म की बात सुनकर कई लोगों को हैरानी होगी । मगर उन्होंने इसका उदघाटन केवल सत्य को वफादार रहकर अपने अनुभव को बताने लिये ही किया है । सन १९४४ में उन्हें सर्वप्रथम पूर्वजन्म का ज्ञान हुआ था । तब से लेकर आजतक विविध रूप में उन्हें यह ज्ञान मिलता रहा है । आज तैंतीस साल बाद वो इस ज्ञान को अपनी आत्मकथा के माध्यम से प्रकट कर रहें है । इससे यह साबित होता है की उन्हें कीर्ति की कामना नहीं है, भक्त समुदाय में अभिवृद्धि करने की लालसा नहीं है । अगर एसा होता तो वो इसका जोरशोर से प्रचार करते, मगर उन्होंने एसा नहीं किया । अभीअभी कुछ भक्तजनों ने उनके पूर्वजन्म के बारे में पूछा था, तो उन्होंने शांतिपूर्वक कहा था की मेरी आत्मकथा कुछ समय में प्रसिद्ध होनेवाली है, उसमें इसका उल्लेख है । अब तक आपने धीरज रक्खी है, तो कुछ देर और रख लो ।

योगेश्वरजी के शब्दों में कहें तो, ‘पूर्वजन्म का ज्ञान मुझे अपने लाभ के लिये मिला है । लोग इसे मानें या ना मानें इससे मुझे कोई फर्क नहीं पडता है । मेरा एसा आग्रह भी नहीं है । मैंने तो सिर्फ अपने अनुभव का आलेखन किया है । मेरे लिये मैं वर्तमान में जो हूँ यही महत्वपूर्ण है । मुझे अपने पूर्वजन्म की बात बताकर यशस्वी नहीं होना है ।’ योगेश्वरजी की निखालसता, नम्रता और सत्यनिष्ठा अदभूत है । उन्होंने अपनी आत्मकथा में गांधीजी के पूर्वजन्म की बात भी बतायी है ।

आत्मकथा में आलेखित योगेश्वरजी का साधनात्मक इतिहास रसिक, तर्कबद्ध और सुसंगत है । ये आनेवाले कई वर्षों और युगों तक साधकों को पथप्रदर्शन करता रहेगा । अपने साधनात्मक अनुभवों को इतनी चोकसाई और वफादारी से पेश करने के लिये श्री योगेश्वरजी अभिनंदन के अधिकारी है । योगेश्वर नाम उनको माँ जगदंबा से किस तरह मिला इसका रोचक वृतांत भी आत्मकथा में है । साथ में, पिछले कुछ सालों से उनके साथ रहनेवाली उनकी माताजी का परिचय भी है ।

योगेश्वरजी ने गुजराती साहित्य को अपने अनेकविध ग्रंथो से समृद्ध किया है । यह आत्मकथा अपनी विशेषताओं के कारण गुजराती साहित्य में अपना नाम करेगी । योगेश्वरजी की शैली, मौलिकता, भाषाप्रभुत्व सबकुछ अदभुत है । सरिता के प्रशांत प्रसन्न प्रवाह की तरह उनकी लेखिनी सहज और स्वयंभू है । इससे वाचक का मन-अंतर अनुप्राणित होता है, आत्मा उदात्त होता है । ये बतौर सिद्धहस्त साहित्यकार उनकी विशेष उपलब्धि कही जानी चाहिये ।

इस आत्मकथा ने भारतवर्ष की सनातन साधना, आध्यात्मिक परंपरा, संतो की महिमा और हिमालय का गौरव बढाया है । इससे ये प्रमाणित होता है की इस विषम कलिकाल में भी परमात्मा के परम कृपाप्राप्त संतमहात्माओं की कमी नहीं हुई है । योगेश्वरजी की आत्मकथा देशविदेश में भारतीय संस्कृति का गौरव बढायेगी, ये निश्चित है ।

- स्वामी ब्रह्मरूपानंद, परमधाम (हिमालय)

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Our greatest glory is not in never falling, but in rising every time we fall.
- Confucius

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