Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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बडौदा में मेरे दिन किसी भी तरह कट रहे थे । दिन का ज्यादातर वक्त मैं कमाटीबाग में गुजारता था । साधना की प्रबलता पूर्ववत बनी हुई थी । सुबह जल्दी उठकर मैं कमाटीबाग ध्यान करने के लिए चला जाता । कभी कभी मैं (मेरे मामा रमणभाई के पुत्र) मनुभाई के साथ राजमहल रोड स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर चला जाता । वहाँ पैड़ के नीचे हम साथ में कुछ वक्त ध्यान में बिताते । कई दफा अंधेरा होने पर वस्त्र निकालकर ध्यान करतें । मुझे घुमना और प्रकृति की गोद में खेलना अच्छा लगता था इसलिए दिन का पूरा वक्त – सुबह से लेकर शाम तक – मैं घर से बाहर रहेता था ।

उन दिनों बडौदा में स्वामी जीवनतीर्थ नामक एक संतपुरुष पधारे थे । वे संगीत विद्यालय के बगलवाले मकान में योग सिखाते थे । उनके साथ गिरधरभाई थे, जो व्यायाम की शिक्षा देते थे । गिरधरभाई अच्छे हाडवैद्य थे और कुदरती रोगोपचार का काम भी करते थे । उनका स्वभाव सरल था । कुछ ही दिनों में उनके साथ मेरा अच्छा परिचय हो गया । स्वामीजी भी मुझे प्यार करने लगे । मैं योगाश्रम की शाम की प्रार्थना में शामिल होता था । मैंने योगाश्रम में स्वामीजी से नेति, धोति और अन्य षट्-क्रियाएँ सिखी ।

लंबे अरसे तक बंबई में रहने के बाद मैं बडौदा आया था, इसलिए मेरा मन यहाँ नहीं लगा । जब मैं सरोडा छोडकर बंबई गया था तब शुरूशरू में एसा ही हुआ था । मगर उस वक्त की बात ओर थी और अब की कुछ ओर । यहाँ मुझे ये मालूम नहीं था की आनेवाले दिनों में मेरे जीवन में क्या परिवर्तन होनेवाला है । भावि जीवनपथ को लेकर मेरा मंथन जारी था । आत्मिक उन्नति की चिंता मुझे खाये जा रही थी । मुझे लगा कि मुझे अपना संपूर्ण ध्यान आत्मिक उन्नति की साधना में क्रेन्द्रित करना चाहिए । मुझे महर्षि अरविंद और उनके आश्रम के बारे में साधारण जानकारी थी । योगीश्री अरविंद की शक्तियों के बारे में मैंने पढा था । वे जमीन से उपर उठ सकते है, किसी व्यक्ति की तसवीर देखकर उसके मन की बात जान लेते है वगैरह । योगसाधना की सिद्धि के पश्चात वो देश की भलाई के लिए काम करनेवाले है, एसा भी मैंने सुना था । मुझे श्री अरविंद के प्रति आकर्षण हुआ, मेरे दिलमें उनके लिए आदर-सम्मान की भावना हुई । मैंने सोचा की अगर एसे महापुरुष के साथ रहने का सौभाग्य मिले तो कितना अच्छा होगा ? देश के लिए कुछ करने की तमन्ना मेरे दिल में हमेशा थी । देश को आझाद करने के लिए गांधीजी अपनी ओर से पूरे प्रयास कर रहे थे । मुझे लगा कि यौगिक सिद्धियों से गांधीजी के प्रयासो में मदद मिलेगी । महर्षि अरविंद योगी है, उनकी योगशक्ति प्रसिद्ध है, तो क्यूँ न उनके पास जाकर, योगसिद्धि हासिल करके, देश की मदद की जाय ? साक्षात्कार के पश्चात, यौगिक शक्ति का देश को आज़ाद और आबाद बनाने में तथा विश्वशांति फैलाने में सदुपयोग किया जाय ? मेरा मन उन दिनों उमदा भावनाओं से भरा हुआ था । मुझे लगा कि मेरी कल्पनाओं को साकार रूप देना असंभव नहीं । केवल सत्य और अहिंसा के बल पर झुझते हुए गांधीजी को अगर यौगिक शक्तियों की मदद मिल जाय तो उनका काम आसान होगा और लोगों को योग और योगीपुरुषों पर भरोसा हो जायेगा । इस तरह सारे संसार का भला होगा ।

विश्वकल्याण की भावना से मेरा मन नाच उठा । मुझे लगा कि शायद ईश्वर की इच्छा मुझे इस कार्य में निमित्त बनाने की है । काफि दिनों तक भावनाओं में बहने के बाद मैंने महर्षि अरविंद को आश्रम में प्रवेश की अनुमति के लिए पत्र लिखा । पत्र में मैंने लिखा कि मुझे ईश्वर-दर्शन की अभिलाषा है । मैं आवश्यक साधना करने के लिए आश्रम में बतौर साधक प्रवेश पाना चाहता हूँ । ईसके लिए आपकी संमति मिलने की मुझे उम्मीद है ।

ये भी लिखा की, मैंने सुना है की आप योगसाधना में सिद्धि पाकर देश की आझादी के लिए काम करनेवाले है । आपने योग की कई सिद्धियाँ हासिल की है । अगर देश की मुक्ति के लिए वे उपयोगी है तो उसे प्राप्त करने की मुझे ख्वाहिश है । मेरी आपसे गुजारिश है कि आप मुझे आश्रम-प्रवेश की संमति दे और हो सके तो आपकी संनिधि में रहने का मौका दे । आपका मार्गदर्शन पाकर मैं साधना करूँगा, सिद्धि प्राप्त करूँगा और फिर हम मिलकर देश की भलाई के काम करेंगे, संसार को शांति का मार्ग दिखायेंगे । पत्र कुछ लंबा था मगर उसका सारध्वनि कुछ एसा था । आज बरसों बीत जाने पर भी खत की स्मृति यथावत है । भावि जीवन की सुखद कल्पना करते हुए एक दिन सुबह मैंने पत्र को रवाना किया और प्रत्युत्तर की प्रतिक्षा करना प्रारंभ किया ।

मुझे लगता था कि श्री अरविंद भले मुझसे बहुत दुर पोंडिचेरी के अपने आश्रम में स्थित है, मगर मेरे विचारों को, मेरे आध्यात्मिक संस्कारों को अच्छी तरह से पहचानेंगे और मुझे आश्रम में रहने के लिए तुरन्त अनुमति दे देंगे । आश्रम में रहकर साधना करने से मेरा जीवन उज्जवल और यशस्वी होगा । श्री अरविंद के उत्तर के लिए मुझे लंबी प्रतिक्षा करनी पडी । खत रवाना करने के बाद लंबे अरसे तक जब कोई प्रत्युत्तर नहीं आया तो मैंने दुसरा खत भेजा । जब उसका भी कोई उत्तर नहीं आया तो मैंने तीसरा खत लिखा । मैंने तीनों खतों के साथ प्रत्युत्तर के लिए सही डाक-टिकट चिपकाये थे । लेकिन तीन-तीन खतों के प्रत्युत्तर न आने पर मेरे दिमाग में तरह-तरह के खयाल आने लगे । प्रतीक्षा करते करते तकरीबन दो-ढाई महिना हो गया तब जाकर एक दिन सुबह मैंने अरविंद आश्रम से लिखा हुआ लिफाफा डाक में पाया ।

लिफाफे को देखकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा । कडी तपश्चर्या के पश्चात् सिद्धि मिलने पर साधक को जैसा आनन्द मिलता है, कुछ एसा ही आनन्द मुझे लिफाफे को हाथ में लेते हुए हुआ । मुझे लगा की अब मेरे जीवन का सूर्योदय होनेवाला है । यह कोई साधारण लिफाफा नहीं, मेरी सारी दुविधा, चिंता और असमंजस का अन्त है । अब बिना कीसी रुकावट मैं आत्मोन्नति के पथ पर चल पडूँगा और कुछ ही वक्त में पूर्णता हासिल कर लूँगा । गुजरात को छोडकर मुझे दक्षिण भारत में रहना होगा, श्री अरविन्द की संनिधि में मेरी साधना होगी । खयालों के समंदर में खोये हुए मैंने आहिस्ता से लिफाफे को खोला ।

अंदर जो पत्र था वो संक्षिप्त था । मैंने ध्यान से उसको पढा, एक या दो दफे नहीं मगर बार-बार पढा । खत को पढते ही मेरा सब आनंद लुप्त हो गया । नकारात्मक उत्तर पढकर मेरी आँखे भर आई । एसे उत्तर की मुझे कल्पना नहीं थी । इतनी लंबी प्रतिक्षा के बाद यह छोटा-सा खत और वो भी नकारात्मक ? मगर हकीकत मेरे सामने थी, उससे कैसे मुँह मोड लूँ ? पत्र में साफ लिखा था की आपको आश्रम में बतौर साधक प्रवेश की अनुमति नहीं है । पत्र अंग्रेजी में था और अंत में आश्रम के मंत्री नलिनीकान्त गुप्ता के हस्ताक्षर थे । ये रहे पत्र के शब्द

‘I beg to inform you that it will not be possible to admit you in the Ashram as an inmate.’

मुझे लगा कि श्री अरविंद ने मेरा पत्र पढा नहीं होगा । बडी हस्तीयों को खत लिखनेवालों के साथ अक्सर होता आया है, वैसा ही मेरे साथ हुआ होगा । मेरा पत्र आश्रम के कोई मंत्रीने पढा होगा और श्री अरविन्द को बिना बताये-सुनाये अपने ढंग से प्रत्युत्तर दे दिया होगा । उनको शायद लगा होगा कि मै अति भावनाशील युवक हूँ और मेरे विचार अतिशयोक्तिपूर्ण है । शायद मेरा पत्र पढकर उन्हें हँसी आयी होगी । मेरे जैसा खत किसी ओर ने नहीं लिखा होगा । उन्हें लगा होगा की श्री अरविंद को एसे खत के बारे में बताना जरूरी नहीं, और उसे कचरापेटी में डाल दिया होगा । मेरे तीन खत मिलने पर, मुझे ओर खत लिखने से रोकने के लिए, उन्होंने प्रत्युत्तर दिया होगा । ये भी हो सकता है कि श्री अरविंद को मेरे विचार पसंद नहीं आये ।

अगर मेरी सोच में कुछ बुराई थी तो कम से कम उसका उल्लेख किया होता, तो मैं उसे सुधारने की कोशिश करता मगर प्रत्युत्तर में एसा कुछ नहीं था । आश्रम में प्रवेश पाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए, या मेरी किन गलतियों की वजह से मुझे प्रवेश नहीं मिला, इससे मैं अनजान रहा । तरह-तरह की कल्पनाएँ मन में उठने लगी मगर मेरी शंका का समाधान नहीं हुआ । अंत में मैंने सोचा कि उनकी असंमति के पीछे कारण जो भी हो, ईश्वर की मरजी नहीं है ।

कुछ दिन तक मेरा मन उदास रहा । मैंने सुना था की श्री अरविंद अपनी अलौकिक शक्तियों से साधको के गुप्त संस्कार पहचान लेते है और जो भूमिकावान है, उसे अपने आश्रम में प्रवेश देते है । आश्रम में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलने की वजह शायद मेरे अधूरे संस्कार होंगे । उन्हें लगा होगा कि मेरी सोच अवास्तविक है । अगर ये बात थी तो कम-से-कम उन्हे लिखना चाहिए की मुझमें क्या कमी है और जिसे दुर करने पर मुझको आश्रम में प्रवेश दिया जायेगा । जो भी हो, अति संक्षिप्त और नकारात्मक उत्तर मिलने पर मेरा मनोमंथन बढ गया ।

मेरा मन अनंत आशाओं से भरा हुआ था ईसलिए निराशा का दौर लंबे अरसे तक नहीं चला । मैंने अपने आप से समाधान कर लिया की शायद ईश्वर की ईच्छा मुझे आश्रम में ले जाने की नहीं है । बचपन से उसने मेरा हाथ थामा, मुझे गाँव से उठाकर बंबई मे रखा, अनुकूल या प्रतिकूल – सभी परिस्थितियों में मेरी रक्षा की, वो मेरा अमंगल नहीं चाहेगा । उसकी जहाँ मरजी होगी वहाँ मेरा बसेरा होगा । इश्वर ने मेरे मन में आत्मिक उन्नति के खयाल भरे है, उसे सिद्ध वो ही करवायेगा । मेरी लिए जो स्थान उचित होगा वहाँ वो मुझे ले जायेगा । उसके भरोसे मैंने अपनी जीवननाव लगाई है, उसे पार वो ही लगायेगा । मुझे चिंता करने की क्या जरूरत ?

मेरा विषाद कुछ कम हुआ । मैंने मौजूद हालात में से मार्ग करने की कोशिश की । फिर भी तसल्ली पाते हुए कुछ वक्त लगा । आज तो उस बात को बरसों बीत गये है । आज मैं उस प्रसंग के बारे में जब सोचता हूँ तो लगता है कि ईश्वर ने मेरे आत्मिक विकास के लिए दक्षिण भारत स्थित अरविंद-आश्रम नहीं बल्कि उत्तर-पूर्व भारत का हिमालय क्षेत्र चुना था । मेरे खतों के नकारात्मक प्रत्युत्तर के पीछे ईश्वर की निश्चित योजना कार्य कर रही थी । मेरे जीवन का विकास कोई आश्रम, मठ या किसी मंदिर में नहीं मगर प्रतिकूलता से भरे पर्वतीय एकांत प्रदेश में हो – एसी उसकी ईच्छा थी । मेरी साधनासिद्धि पर किसी ओर व्यक्ति या स्थान की मोहर लगे ये शायद उसे पसंद नही था । मैं अपने बलबूते पर आगे बढूँ, मुश्किल और कठिन राहों से गुजरते हुए, चिंता और वेदना को साथ लिए, अपना मार्ग खुद ढूँढू, अपने पैरों पे खडा रहूँ और जीवन को आध्यात्मिकता के सुमेरु शिखर पर पहूँचाउँ, मेरी साधना का ईतिहास हिमालय के दिव्य प्रदेश के साथ जुडे - उसकी शायद ये कामना थी । जब मेरे दिल में ये खयाल आया तो मेरा हृदय भर आया ।

मेरा आध्यात्मिक विकास जो माहौल में हुआ उससे मुझे बहुत-कुछ सिखने को मिला । कहाँ बागानों में माली के हाथ से सँवरने वाली फूल-पत्तीयाँ और कहाँ जंगलो में अपने आप निकलनेवाले पेड-पौधे ? दोनो में जमीन-आसमान का फर्क है । जंगलो में निकलने वाले पेड-पौधो के नसीब में मुसीबत के पहाड होते हे, ठंडी, गर्मी और कांटे होते है, उनके उभरने की कहानी अत्यंत रसिक, आकर्षक और प्रेरणास्पद होती है । लोग जब उन्हें देखते है तो मंत्रमुग्ध और आश्चर्यचकित रह जाते है । बिल्कुल उसी तरह, जो साधक किसी स्थूल मार्गदर्शक की सहायता बिना अपना साधनापथ तय करता है, उसका ईतिहास कुछ कम रोचक या आश्चर्यकारक नहीं होता । ईश्वर अपनी ईच्छा से और व्यक्तिगत प्रारब्ध से हरेक व्यक्ति को अलग अलग ढाँचे में डालता है । मनुष्य को चाहिए की उसे जो भी माहौल मिले उसमें संतोष मानें और बहेतरी तथा उन्नति के लिए प्रयास करें ।

अरविंद आश्रम में प्रवेश न मिलने पर भावि जीवन के लिए मैं अन्य विकल्प सोचने लगा । मेरा मार्ग प्रशस्त करने के लिए मैनें ईश्वर से सच्चे हृदय से प्रार्थना की ।