Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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बदरीनाथ से देवप्रयाग होकर हमें ऋषिकेश जाना था । ईश्वर की कृपा से हमने चारों धाम की यात्रा सकुशल पूर्ण की थी । पिछले दो महिने से हम लगातार चल रहें थे । अब कहीं ओर जाने का मन नहीं हो रहा था ।

ऋषिकेश जाने के लिये कर्णप्रयाग से रानीखेत होकर एक मार्ग निकलता है । हमारा सामान उठाकर जो मजदूर साथ चल रहा था उसकी इच्छा उस मार्ग से जाने की थी क्योंकि उसका गाँव मार्ग में पडता था । मेरी इच्छा देवप्रयाग जाने की थी इसलिये हमने रानीखेत का मार्ग नहीं लिया । उन दिनों यातायात की कोई सुविधा नहीं थी । सभी जगह पैदल जाना पडता था । चलते-चलते हम बदरीनाथ से देवप्रयाग आये । चंपकभाई मजदूर को लेकर देवप्रयाग से ऋषिकेश गये । एक सप्ताह आराम करने के बाद माताजी और मैं ऋषिकेश के लिये निकले ।

चार-धाम की यात्रा आर्थिक कठिनाईयों के बावजूद संपन्न हुई । उन दिनों हमारी आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी । चंपकभाई स्नेही-मित्रों की सहायता से अपना गुजारा करते थे । माताजी को अंदाजा नहीं था की चार-धाम यात्रा में कितना खर्च होगा इसलिये वो जितना बन पडा अपने साथ लेकर आयी थी । ईश्वर की कृपा से हमें खास कठिनाईयों का सामना नहीं करना पडा । हाँ, चंपकभाई के लिये कसौटी की घडीयाँ आयी मगर किसी भी प्रकार टल गई ।

हम ऋषिकेश आकर भगवान आश्रम में ठहरे । भगवान आश्रम की धर्मशाला शांति और स्वच्छता के कारण मुझे पसंद थी । कुछ दिन यहाँ रहने के बाद चंपकभाई अपना सामान लेने के लिये दहेरादुन गये । वहाँ से दो-तीन दिन में वापिस आकर वे हमारे साथ गुजरात चलना चाहते थे मगर इश्वर की योजना कुछ ओर थी । दहेरादुन जाने के बाद उनको कोलेरा की बिमारी लग गई । उन्होंने मुझे बुलावा भेजा मगर यहाँ माताजी की तबियत बिगडी थी । यात्रा में जगह-जगह का पानी पीने से उन्हें जुलाब हुआ और बाद में मरडा लग गया । उनकी तबियत ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी । कुछ दिनों के बाद वो बिल्कुल पथारीवश हो गई । जुलाब में लहु गिरने लगा । अब माताजी को इस हालत में छोडकर मैं चंपकभाई के पास कैसे जा सकता था ? चंपकभाई जोशीजी के घर पर थे, इसलिये उनकी सारवार वहाँ हो सकती थी मगर यहाँ मेरे अलावा माताजी की सारवार करनेवाला कोई नहीं था । मैं उनको किसके भरोसे छोडकर जाता ? चंपकभाई के लिये मेरे दिल में प्यार होने के बावजूद मैं उनके पास नहीं जा सका इसका मुझे दुःख था । मैंने खत लिखकर उनको मेरी मजबूरी बताई ।

माताजी की तबियत खराब होने का मुख्य कारण हिमालय की लंबी और कष्टप्रद यात्रा थी । वैसे तो बहुत सारे लोग हिमालय की यात्रा करते हैं मगर माताजी की तबियत यात्रा के पहले इतनी अच्छी नहीं थी । पहाडों में चलने से उसकी नाजुक तबियत ओर खराब हो गई । यात्रा समाप्त होने के बाद हम ऋषिकेश आये मगर उनकी तबियत में सुधार नहीं हुआ । मेरे पास इतने पैसे भी नहीं थे की मैं उनको गुजरात भेज सकूँ । दहेरादून में चंपकभाई बिमार थे । एक दिन माताजी की तबियत इतनी खराब हो गई की वो खुद निराश होकर बोली, अब मैं शायद नहीं रहूँगी, मेरे लिये घी का दीया जलाओ । हालाकि मैं उनको ढाढस बँधाता रहा ।

ईश्वर की कृपा अनंत है । जो उसकी शरण लेता है, उसे सच्चे दिल से पुकारता है, उसकी मदद करने के लिये वो हमेंशा तैयार रहता है । भक्तों की सहायता करना उसका स्वभाव है । हमारे लिये तो ईश्वर की कृपा ही सबकुछ थी । उसके बगैर इस कठिन अग्निपरीक्षा से निकलना नामुमकिन था । आखिरकार उसकी कृपादृष्टि हुई ।

माताजी कमरे के बाहर खाट पे सो रही थी तब मध्यरात्री को अर्धजागृत दशा में उसे एक अलौकिक अनुभव हुआ । बिस्तर के सामनेवाले सीरे से एक तेजोमय स्वरूप बाहर नीकला । शुरु में केवल स्वरूप का मुख दिखाई पडा । धीरे-धीरे उपर उठता हुआ स्वरूप छाती के भाग तक आया । स्वरूप मुकुटधारी भगवान श्री राम का था । उनके तेजोमय स्वरूप को देखकर माताजी बिनती करने लगी, 'हे प्रभु, आपका यह स्वरूप मैं देख नहीं सकती । मैं आपको प्रणाम करती हूँ ।'

दो-तीन मिनट के बाद यह दर्शनानुभव शान्त हुआ । अनुभव के बाद माताजी की तबियत में सुधार होने लगा । हाँलाकी, उनको पूरी तरह से ठीक होने में कुछ वक्त लगा मगर उनकी पथारीवश अवस्था का अन्त हुआ । कुछ दिनों के विश्राम के बाद हमने ऋषिकेश छोडने का निर्णय किया । श्री प्रभुदत्तजी अपनी बदरीनाथ की यात्रा पूर्ण करके ऋषिकेश आये इसलिये उनके दर्शन का लाभ हमें फिर मिल गया ।

ऋषिकेश से बडौदा आने के लिये हमारे पास पैसे नहीं थे । हमने बडौदा से पैसे मंगवाये थे मगर पैसे आने में कुछ वक्त लगना स्वाभाविक था । यहाँ ईश्वर-कृपा का एक ओर अनुभव मिला । मुझे केवल नाम से पहचानने वाले अहमदाबाद के एक सज्जन ने मेरे लिये पसाच रूपये का मनीओर्डर भेजा । टपाली जब मनीओर्डर लेकर आया तो मैंने भेजनेवाले का नाम-पता पढा । मैं न तो भेजनेवाले को ना ही उसकी कंपनी को पहचानता था । फिर भी मनीओर्डर मेरे नाम से आया था इसलिये ईश्वर की इच्छा समजकर मैंने उसका स्वीकार किया ।

ईश्वर की लीला अजब है । वो कब, किसे, कहाँ और किस तरह से सहायता पहूँचाता है, कोई जान नहीं पाता । अब तक, उसने कई दफा मुझे सहायता पहूँचाई है । माँ की भाँति उसने मेरी देखभाल की है । मेरा समस्त जीवन उसकी कृपा नहीं तो ओर क्या है ? एसे परम प्रेममय कृपालु ईश्वर को मैं कैसे भूल सकता हूँ ? एसा विचार भी कैसे कर सकता हूँ ?