Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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गुजराती साहित्य में अभिरुचि रखनेवाले लोगों के लिये कवि न्हानालाल का नाम जाना-पहचाना है । उनके साहित्यीक प्रदान को गुजराती साहित्य में 'न्हानालाल-युग' कहा जाना अपने आपमें उपलब्धि है । अहमदाबाद में मुझे उनसे मिलने का सौभाग्य मिला । मैं अहमदाबाद में जिनके घर ठहरा था, उनके निमंत्रण से वे उनके घर आये थे ।

न्हानालाल के साहित्य को मैंने बंबई-निवास के दौरान पढ़ा था । बडौदा आने के बाद भी मैं उनके साहित्य को पढता रहा । उनकी कल्पना, चिंतनशक्ति, शब्द और भावों की पसंदगी तथा लेखन-शैली के लिये मुझे आदर था । उनके जैसे समर्थ साहित्य-स्वामी को मिलकर मुझे अत्यंत हर्ष हुआ ।

प्रथम परिचय में ही उनकी नम्रता और सादगी मुझे छू गई । कुछ साहित्यिक विषयों पर बातचीत होने के बाद मैंने उनको मेरे गद्यकाव्य बतायें । उसे पढकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए और कहने लगे, 'आपने तो मंथन करके अमृत निकाला है । सचमुच आपका लेखन अत्यंत उच्च कोटि का है ।'

उनके शब्द सुनकर मुझे लगा की वे गुणग्राही है, वरना मेरे साधारण-से काव्यों की इतनी प्रशस्ति न करतें । किसी साधारण व्यक्ति के गुणों को देखकर उसकी खुलेआम प्रसंशा करने की हिंमत बहुत कम लोगों में होती है, खास करके तब, जब वो स्वयं सुप्रसिद्ध व्यक्ति हो ।

दो-चार दिन के बाद उनके निमंत्रण से हम उनके एलिसब्रीज स्थित घर पर गये । तब उन्होंने हमारा भावपूर्ण स्वागत किया । बाद में तंबूरा लेकर तीन-चार भजन सुनायें । उनके सुमधुर कंठ से भक्तिभाव भरे भजन सुनना मुझे सदैव याद रहेगा । मैंने सुना था की उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी मगर उनकी प्रसन्नता तथा आत्म-संतोष अनुपम था । उनकी धर्मपत्नी भी कुशलता से घर का कार्यभार सम्हालकर अपना सहयोग प्रदान करती थी ।

उन्हें देखकर मुझे बालाशंकर कंथारीया की पंक्तियों का स्मरण हुआ :

कवि राजा थयो, शी छे पछी पीडा तने कांइ,
निजानंदे हंमेशा बाल मस्तीमां मजा लेजे !

कविश्री की नम्रता का एक और प्रसंग स्मृतिपट पर आता है । जब हम निकलनेवाले थे तो उन्होंने अपनी अप्रकट रचना 'हरिसंहिता' मेरे हाथ में रखकर कहा : 'यह मेरी नयी रचना है । आप उसे पढकर मुझे अपना अभिप्राय देना ।'

मैंने कहा, 'मैं भला आपकी कृति के बारे में क्या अभिप्राय दूँगा ?'

'क्यूँ ?' वे बोले, 'आप बहुत कुछ बता सकते हैं ।'

उनके आग्रह से मुझे 'हरिसंहिता' लेनी पडी । उनके जैसे सिद्धहस्त और प्रसिद्ध कवि को मेरे जैसे साधारण व्यक्ति के अभिप्राय की क्या पडी होगी भला ?

मैंने 'हरिसंहिता' पढकर भेजी और लिखकर बताया की 'हरिसंहिता मुझे बहुत पसंद आयी । मोर के अंडे को चीतरने की जरूरत नहीं होती । आपकी कृति मेरी प्रसिद्धि की मोहताज नहीं फिर भी मैं कहना चाहता हूँ की आपकी प्रत्येक कृति अपने आप में काबिल-ए-तारीफ है ।'

कवि न्हानालाल से फिर भेंट नहीं हो पायी । उनकी प्रत्यक्ष मुलाकात से उनके प्रति सम्मान की भावना ओर बढ गयी । कवि न्हानालाल का साहित्य गुजराती भाषा में बेमिसाल है । हालांकि किसी एक कवि की दूसरे कवि के साथ तुलना करना अपने आपमें जायज नहीं है फिर भी कई लोग उन्हे गुजरात के टागोर भी कहते हैं । यह बात निःशंक है की कवि न्हानालाल ने गुजराती साहित्य को सुशोभित, सुसमृद्ध और यशस्वी किया है । गुजराती भाषा का जो भी साहित्य आंतरप्रांतीय और आंतरराष्ट्रीय स्तर का है, उनमें कविश्री के साहित्य का प्रदान अग्रीम है । कुछ विवेचको ने उनकी डोलनशैली की टीका की है, ये कहकर की उसे गद्य कहें, पद्य कहें या अपद्यागद्य । उसे जो भी कहें, साहित्य का प्रकार बदलने से साहित्यिक गुणवत्ता पर कोई फर्क नहीं पडता । विवेचकों को चाहिए की कवि की शैली पर गुणदोष करने के बजाय उनकी खूबीयाँ और विशेषता को प्रकाश में लायें । एसा करने से गुजराती साहित्य को बल मिलेगा । कविवर न्हानालाल के बहुत सारे ग्रंथ चाहे डोलनशैली में हो, फिर भी साहित्य की गुणवत्ता तथा उनके नवीन प्रयोग के लिये वे सदैव जाने जायेंगे । मैं कविश्री के बारे में ओर क्या कहूँ ? ज्यादा से ज्यादा लोग उनके साहित्य को पढे, यह इच्छनीय है ।

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मैं सन १९४५ की शरूआत में बंबई गया । मेरी साधनात्मक प्रगति को सुनकर नारायणभाई अत्यंत प्रसन्न हुए । वे मुझे स्कूल के दिनों से जानते थे । उनका हृदय अत्यंत पवित्र था । मानव-स्वभाव के विविध पहलूओं तथा साधना के गूढ रहस्यों को समजने की उनकी योग्यता थी । उनकी सरलता, सादगी तथा निष्कपटता को बयाँ करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं है । उस वक्त वे बी.ए. पास होकर सुनिती गर्ल्स हाइस्कूल में काम करते थे । एक चारित्र्यशील और तेजस्वी विद्यार्थी की हैसियत से वे छात्रों तथा शिक्षकगण में जाने जाते थे । उनके घर मैं जितने भी दिन रहा, मेरा समय आनंदपूर्ण व्यतीत हुआ । उनके मातापिता भी अत्यंत प्रेमी, प्रभुपरायण और पवित्र थे ।

बंबई से लौटने के बाद मैं अमदावाद से हिमालय के लिये चल पडा । निकलते वक्त माताजी को नहीं मिल पाया क्योंकि माताजी ताराबेन के साथ सरोडा थी । ताराबेन को पुत्रजन्म हुआ था ।

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आत्मकथा में मैंने जो भी लीखा है, सत्य को वफादार रहकर और निष्पक्ष होकर लिखा है । मेरे बारे में अच्छा या बुरा कहा गया है तो मैंने उसे ठीक उसी तरह से उसे पेश किया है । वाचको को मैं यह कहना चाहूँगा की मेरे बारे में जो कुछ अच्छा लिखा गया है वो आत्मविज्ञापन या आत्मप्रशस्ति की भावना से नहीं लिखा गया, और जो कुछ बुरा लिखा गया है वो किसीके प्रति रागद्वेष की भावना से नहीं लिखा गया । मैंने स्वयं अनुभव करके, जाँच-परखने के बाद उसे यहाँ प्रस्तुत किया है ।

जिन्दगी के २३ साल बीत गए । अनंत जीवन की तुलना में २३ साल कुछ खास नहीं है फिर भी मुझे लगता है की इस अल्प समय में मैंने युगों का जीवन जी लिया । मैं कितने सारे लोगों से मिला, कितने सारी जगहों पर गया और कितने विभिन्न अनुभव किये । पानी के प्रवाह की तरह वक्त हमारी आँखो के आगे-से निकल जाता है । भविष्य वर्तमान में तबदील होता है और वर्तमान भूतकाल बनकर पिछे चले जाता है । इस चंचल जीवन में अविचल और अमर केवल परमात्मा है, इसलिये हमें उससे जुडे रहना चाहिए ।