Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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वक्त के चलते शांताश्रम की कुटिया में अतिरिक्त कमरा बनाने का कार्य संपन्न हुआ । हाँलाकि मेरी ईच्छा थी की मैं वहाँ जाउँ, मगर एसा हो न पाया । क्योंकि दशरथाचल के मेरे साथी तथा बदरी-केदार की यात्रा के सहयात्री चंपकभाई को क्षयरोग हुआ । वो सीमला हील्स से धरमपुर के टी. बी. सेनेटोरियम में दाखिल हुए । उनकी तीव्र ईच्छा थी की मैं उनके पास जाउँ । उन्होंने अपने खत में लिखा था:

रविवार
ता. २५ फेब्रुआरी १९४५

पूज्य गुरुदेव,
शायद आपको मेरा गुरुदेव कहेना ठीक नहीं लगेगा मगर मेरा आपसे जो नाता है उसे मैं कैसे भूल जाउँ ? आपका सुमिरन करते हुए मैं दिन गुजार रहा हूँ । आप अवश्य जानना चाहते होंगे की मैं कैसा हूँ । मगर मैं अपने बारे में बताउँगा तो आपको पसंद नहीं आयेगा ।

ऋषिकेश में हमने ये तय किया था की हम साथ में गुजरात चलेंगे । इसलिये सामान लेने के लिये मैं दहेरादून गया और वहाँ बिमार हो गया । मेरा इन्तजार करके आप माताजी के साथ गुजरात चले गये । शायद ईश्वर की यही मरजी थी । फिर बंबई से आपके बारे में समाचार मिला की आप रमणाश्रम जानेवाले हैं । इसलिये मैं आपके पास आने के बजाय सीधा वहाँ गया । तबियत खराब होने के बावजूद मैंने रमण महर्षि आश्रम में आपका पंद्रह दिन तक इन्तजार किया मगर आप वहाँ नहीं आये । वहाँ से मैंने नारायणभाई को खत लिखा, और अपनी हालत के बारे में बताया । ये भी लिखा था की आपको कहीं से ढूँढकर मेरे पास भेजें । आप आयेंगे ये सोचकर मैंने वहाँ रहने के लिये घर भी ढूँढा था ।

फिर मैंने माताजी को खत लिखा । ये पूछने की क्या वो मेरे साथ कुछ दिन रह सकती हैं ? अगर हाँ, तो मैं एसी जगह ढूंढूँ ताकि वो साथ रह सकें । मगर उनका कोई प्रत्युत्तर नहीं आया । शायद उन्होंने नारायणभाई को प्रत्युत्तर भेजा होगा । अब तो बात यहाँ तक पहूँच गयी है की मुझे लगता है की मैं कहीं जाने के काबिल भी नहीं रहूँगा । ईश्वर सर्वशक्तिमान है । उसकी कृपा हैं तो हम जरूर मिलेंगे और मैं ठीक हो जाउँगा ।

जो भी होगा, ईश्वर की ईच्छा के मुताबिक होगा । मुझे इसका कोई गम नहीं है मगर बिमारी के दिनों में मेरा मन ईश्वरमय रहें, प्रभुभक्ति में लगा रहें, एसी कामना करता हूँ । आपके सत्संग की मुझे तीव्र ईच्छा है । आप भले ही विरक्त हैं, मगर मेरे प्रेमबंधन का स्वीकार करकें मेरे पास आयें, एसी मेरी प्रार्थना है ।

बुखार से परेशान होकर मैं मद्रास आया । वहाँ से मैंने बंबई नारायणभाई पर खत लिखा की वो स्वयं आपको सरोडा जाकर मेरे बारे में बतायें । मगर उनका अभी तक कोई उत्तर नहीं आया है । मेरी तबियत बहुत नाजुक है और मेरी देखभाल करने के लिये कोई नहीं है । मेरे सगेसंबंधी मेरे पास नहीं है, और बुलाने पर भी वे आने के लिये राजी नहीं है । मेरे खबरअंतर पूछने के लिये कोई खत भी नहीं लिखता । मुझे मालूम नहीं की मैं इस बिमारी से मुक्त हो पाउँगा या नहीं । कभी कभी मन निराश हो जाता है । शायद मेरा खत पढकर आपके दिल में मेरे लिये करुणा हो ।

अब मुझे आपकी बातें याद आ रही है । आपने कहा था की हम पिछले जन्म में जुडें थे या नहीं, ये आपको मालूम नहीं है । शायद इसी जन्म में मिलकर बिछड जायेंगे । मगर ये मुमकिन नहीं है । अगर मैंने पिछले जन्म में कुछ सिद्ध नहीं किया तो इसी जन्म में पुरुषार्थ करके हासिल करना होगा । और अगर एसा है तो यह शरीर इतना जल्दी छूट जाय, ये मुमकिन नहीं । मुझे ये पता नहीं है की ये खत आपको कब मिलेगा और कब आपका प्रत्युत्तर आयेगा । और इतने दिनों तक मैं धीरज रख पाउँगा या नहीं । मगर मैं क्या करूँ ? आपसे संपर्क का कोई माध्यम भी नहीं है मेरे पास ।

अगर जल्दबाजी में धीरज गवाँ दूँ तो आपके साथ इतने दिन जो सत्संग किया वो निरर्थक कहलायेगा । किसी-भी तरह, मन मनाकर, मैं दिन काट रहा हूँ । मैं मानता हूँ की जो भी कुछ मेरे साथ हो रहा है, उसका कोई-न-कोई मकसद जरूर होगा । शायद ईश्वर मुझे अपने पास लाना चाहता है, विषय-वासना से मुक्ति दिलाना चाहता है । मगर क्या मैं सत्संग के लायक हूँ या नहीं ? यहाँ मेरे उदास मन को ढाढस बँधानेवाला भी कोई नहीं है ।

खेर, आप मेरी चिंता मत करना । ठीक लगे तो मेरी सेहत के माँ से दुआ माँगना । और जैसे ही ये खत मिले, मेरे पास चले आना । आपको इतना कहना मेरा हक्क समजता हूँ । मैं नहीं जानता की मैं इसके लायक हूँ या नहीं, मगर आप मेरी हालत पर तरस खाकर जल्दी आ जाना ।

आपको मेरा भावपूर्वक नमस्कार ।

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ख़त पढते ही मैंने चंपकभाई की सहायता के लिये धरमपुर जाने का फैंसला किया ।