मैं सिमला के धरमपुर स्थित सुप्रसिद्ध टी. बी. सेनेटोरियम में जा पहूँचा । आलमोडा से लौटने पर मैंने मौनव्रत धारण किया था । धरमपुर पहूँचने के दो-तीन दिन बाद मैंने उसकी समाप्ति की ।
सेनेटोरियम पहाडों की गोदी में चीड और देवदार के लंबे-घने वृक्षों के बीच है । उसकी प्राकृतिक शोभा देखते ही बनती है । वहाँ जाकर मैंने चंपकभाई का कमरा ढूँढा । चंपकभाई एक खाट पर सोये हुए थे । उनका शरीर काफि अशक्त लगा । मुझे देखकर उन्हें बेहद आनन्द हुआ । देवप्रयाग से धरमपुर तक का लम्बा सफर आसान तो नहीं था मगर चंपकभाई को देखकर मेरी थकान दूर हो गई । मुझे ये भी लगा की मेरा यहाँ आना सार्थक है ।
दुसरे दिन चंपकभाइ ने मुझे अपनी आपवीती संक्षेप में सुनायी । उनका एक फेफडा ठीक नहीं था, दुसरा फेफडा भी दिन-प्रतिदिन बिगड रहा था । डॉक्टर ने उन्हें साफ शब्दों में बताया थी की उनकी ठीक होने की संभावना नहीं है । उनका लहु अशुद्ध हो गया है । चंपकभाईने अपने जीने की आशा बिल्कुल छोड दी थी और वे शांतिपूर्वक मरने की तैयारी कर रहे थे । पंद्रह दिन के बाद डॉक्टर उनकी फिर जाँच करनेवाले थे । उनके फेफडे का एक्स-रे निकालने वाले थे । चंपकभाई की निराशा और पीडा का अन्त नहीं था । उन्होंने अपनी व्यथा और वीतक-कथा मुझे सुनायी और मेरी सहायता के लिये प्रार्थना की ।
चंपकभाई को मुझ पर भरोंसा था, मगर कोई चमत्कार करने की मेरी हेसियत नहीं थी । मैं सिर्फ उनको हिम्मत दे सकता था, ईश्वर से उनकी सेहत के लिये दुआ कर सकता था । मैंने उन्हें ढाढस बँधाते हुए कहा की ईश्वर की कृपा से आप बिल्कुल ठीक हो जायेंगे । जो परमात्मा गूँगे को बोलता कर दे, पंगु को पर्वत चढने की ताकत दे दें, उसके लिये आपको ठीक करना असंभव नहीं है । ईश्वर सर्वशक्तिमान है, अगर आप उसका सुमिरन करें तो आप अवश्य ठीक हो जायेंगे ।
मैं हररोज, करीब एक घण्टे तक, उनके पास बैठकर उनके शरीर पर हाथ फेरता और भावपूर्वक प्रार्थना करता । प्रार्थना करते वक्त मेरी आँखो से बोर-बोर आँसू निकल पडते । चंपकभाई उसे महसूस करते थे । मैंने उन्हें भरोंसा दिलाते हुए कहा की पंद्रह दिन के बाद जब दाक्तर फिर-से जाँच करेंगे तब आपके रीपोर्ट अच्छे आयेंगे । आपका फेफडा भी अच्छा हो जायेगा, लहु भी अच्छा हो जायेगा और डोक्टर को अपनी राय बदलनी पडेगी ।
'एसा कैसे हो सकता है ?' मानो उनको मेरी बातों पे यकीन नहीं आ रहा था । 'मगर यदि एसा होता है तो वो एक चमत्कार ही कहलायेगा ।'
'परमात्मा की कृपा से सबकुछ हो सकता है, जिसकी हमें कल्पना नहीं होती एसी घटनाएँ भी घटती है । हमें केवल सच्चे दिल से उसका शरण लेना है, प्रार्थना करनी है । हमारी बात वो सुनें या ना सुनें, यह उस उपर निर्भर है । हमें तो अपने दिल की गहराईयों से उसे पुकारना है ।
मेरी बात सुनकर उन्हें अचरज होता था, मगर जब डोक्टरने कुछ दिनों के बाद आकर बताया की उनका लहु बिल्कुल ठीक है, तो उनके आश्चर्य की सीमा न रही । डोक्टर ने कहा, 'तुम्हारा लहु इतने कम समय में कैसे ठीक हो गया, ये मुझे मालूम नहीं । मैंने तो आपके लिये उम्मीद का दिया बुझा दिया था । मगर अब आपको निराश होने की जरूरत नहीं है । आपके फेफडे की हालत भी पहले से बेहतर है ।'
अगले पंद्रह दिनों में चंपकभाई के दोनों फेफडे पूरी तरह से ठीक हो गये । डोक्टरने आकर उन्हें बताया की आप गंभीर बिमारी से बच निकले हैं । मानो आपको नया जीवन मिला है । मेरे खयाल में तो यह घटना चमत्कार से कम नहीं है ।
चंपकभाई ने डोक्टर को मेरे बारे में तथा मेरे द्वारा की गयी प्रार्थना के बारे में बताया । तब डोक्टर ने कहा की सचमुच यह प्रार्थना का चमत्कार है । इसके अलावा एसा होना असंभव है । आपको एसे संत मिले है, यह आपका सदभाग्य है ।'
कुछ देर के बाद डोक्टर हँसते हुये बोले, 'मैं भी संतो का बडा आदर करता हूँ । मेरे मातापिता ने मुझे एसा सिखाया है । मगर सेनेटोरियम में अगर इस तरह से संतमहात्मा आयेंगे तो मेरा घंघा चोपट हो जायेगा । फिर मेरी घर बैठने की नौबत आयेगी ।'

