Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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ईश्वर की कृपा से चंपकभाई ठीक हो गये । मुश्किल हालातों में हमें ईश्वर का शरण लेना चाहिये । धबराने से हमारे दुःखदर्द कम नहीं होते । मेरे कहने का गलत अर्थ मत निकालना की सिर्फ आपत्ति के समय में हमें ईश्वर को याद करना है । सुख हो या दुःख, हमें तो सभी परिस्थितियों में उसका स्मरण करना है । आपत्ति आने पर प्रार्थना करने में कोई बुराई नहीं है, मगर परिस्थिति सानुकूल हो जाने के बाद हमें उसे भूलना नहीं चाहिए । उसकी अधिकाधिक कृपा के लिये उसे पुकारता रहना चाहिये । जब प्रार्थना से शरीर के रोग मिट सकते हैं तो यह भवरोग क्यूँ नहीं मिटेगा । हमें चाहिये की औषधों की आजमाईश करने के साथ-साथ ईश्वर की कृपा के लिये भी प्रयत्न किये जाय । तब जाकर हमारे बाह्य एवं आंतरिक व्याधि निर्मूल होंगे ।

डोक्टर ने जब चंपकभाई की सेहत का अच्छा रिपोर्ट दिया तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा । मैंने उनसे कहा, 'अब तुम्हें हिंमत हारने की जरूरत नहीं है । अभी तो आपको शादी करनी है, और हो सके तो कुछ ही महिनों में ।'

मेरे शब्द सुनकर वे दंग रह गये । क्षयरोग की बिमारी से पिडीत आदमी शादी करने की बात भी कैसे सोच सकता है ? और मान लो की वो एसा सोच भी ले तो कौन उसके साथ पूरी जिन्दगी बिताने के लिये राजी होगा ?

मैंने उन्हें अपनी पसंदीदा कन्या पर पत्र लिखने के लिये बाध्य किया । कुछ ही दिनों में उसका प्रत्युत्तर आया । वो लडकी भी हिंमतवाली थी । चंपकभाई को क्षयरोग की बिमारी है, एसा ज्ञात होने के बावजूद और उसके सगेसंबंधीओं के समजाने के बाद भी वो चंपकभाई के साथ शादी करने के लिये राजी थी । यहाँ तक की उसने लोगों को बताया की अगर चंपकभाई के साथ उसकी शादी नहीं होती है तो वो किसी और के साथ शादी नहीं करेगी और आजीवन अविवाहित रहेगी । आखिरकार, चंपकभाई की शादी उसी लडकी, जिसका नाम कनकबेन था, संपन्न हुई । ईश्वर की कृपा और करुणा से संसार में क्या नहीं हो सकता ?

चंपकभाई मेरे साथे रह चुके थे । वो मेरी आध्यात्मिक भूमिका को कुछ हद तक समझते थे । मैंने उनको मेरी भावनाओं से अवगत कराना ठीक समजा । मैं चाहता था की मैं परमात्मा की पूर्ण कृपा प्राप्त करूँ, सिद्ध बनूँ और मानव कल्याण के कामों में अपने आप को जोड दूँ । मेरी बात सुनकर वह प्रसन्न हुए । मगर सिद्धि प्राप्त करने के पश्चात् मैं लोगों के काम कैसे आउँगा, इसके बारे में उन्हें शंका थी । उन दिनों में उन्हें एक अनुभव मिला । उन्होंने मुझे उसके बारे में बताया ।

'कल रातको आपने मुझे जो कुछ बताया, उसीको लेकर मेरे मन में कुछ प्रश्न थे । तब आप मेरे स्वप्न में आये । आपका स्वरूप अत्यंत तेजोमय था । आपको देखकर मेरे अंतर में यह भावना का उदय हुआ की आपने जो कुछ कहा, वह सत्य होगा । मेरी संशयवृत्ति इस अनुभव के बाद शांत हो गयी ।'

फिर मुझे दुसरा स्वप्न आया । एक काला, भयंकर दिखनेवाला आदमी मुझे आकर डराने लगा । मुझे लगा की मेरा काल आ गया है । तब मैं धबराकर आपके पास आया । जैसे ही मैं आपके पास आया, वह आदमी निराश होकर बोला, अब मेरा काम नहीं बनेगा । अगर तुम उनके पास नहीं गये होते तो मैं तुमको ले जाता ।'

एसे विस्मयजनक अनुभवों की चर्चा करते हुए हमारा वक्त कटता रहा । कभी हम साथ-साथ भावपूर्ण हृदय से भजन गातें । कभी हम कोई समर्थ सिद्ध संतपुरुषों की बाते करते, कभी मेरे भावि जीवन के बारे में योजना करतें ।

धरमपुर टी. बी. सेनेटोरियम के दिनों में मेरे भोजन का प्रबंध एक सिंधी सदगृहस्थ के यहाँ किया गया था । वो भी क्षयरोग की बिमारी से पिडीत थे । उनके आग्रह से मैं उनकी सेहत के लिये प्रार्थना करता था । उन्होंने सुना की चेल के पास एक सिद्ध महापुरुष हैं जो बिमार लोगों को आशीर्वाद देतें है और रोगमुक्त करतें हैं । स्वाभाविक रूप से उन्हें सिद्ध महात्मा के आशीर्वाद की कामना थी । मगर उनकी तबियत एसी नहीं थी की वो स्वयं चेल जा सके । उन्होंने मुझे कहा, 'मैं अपने रसोईये को सिद्धपुरष के पास आशीर्वाद के लिये भेज रहा हूँ । अगर आप चाहें तो उसके साथ जा सकतें हैं । आपको नयी जगह देखने का अवसर मिलेगा । आप वापिस आकर मुझे महात्मा के बारे में अपना अभिप्राय बताना ।'

सिद्ध महापुरुष के दर्शन समागम की बात सुनकर मैंने सिन्धी शेठ का प्रस्ताव स्वीकार किया । मगर वहाँ जाने के पूर्व घटित एक प्रसंग का यहाँ उल्लेख करना मैं ठीक समजता हूँ ।