अनशन को अडतीस दिन हो चुके थे । मुझे अंतःप्रेरणा हुई की कुछ अमंगल घटना घटनेवाली है इसलिये सरोडा छोडकर कहीं मत जाना । यहाँ रहकर अनशन जारी रखना ।'
और जैसे की प्रेरणा हुई थी, अमंगल घटना घटी । अनशन पूर्ण होने के दिन प्रातःकाल में सांकुबा का देहांत हुआ । मैंने अपनी रोजनिशि में लिखा : कार्तिक सुद ७, सोमवार विक्रम संवत २००५ (इ.स. ८-११-१९४८) मेरे दादीमा, सांकुबा (संतोषबहन) चल बसे ।
उनकी मृत्यु अचानक हुई । मुझे मिली प्रेरणा के मुताबिक अमंगल होने की आशंका थी मगर दादीमा की मौत होगी यह मैंने सोचा नहीं था । पिछले चार-पाँच दिन से उनकी तबियत ठीक नहीं थी, उन्होंने ठीक तरह से खाना भी नहीं खाया था । एक दफा पतला दस्त हुआ और बिना किसी विशेष पीडा वो चल बसी । वो सरल और दिल की भोली थी । उनकी उम्र भी काफि थी, तकरीबन ९० साल । उनको अक्सर देवीदेवताओं के स्वप्नदर्शन होते थे । वो हमें उसके बारे में बताती थी । मेरे पिताजी के मृत्यु के कुछ साल बाद उनकी दृष्टि चली गयी थी । पिछले दस साल से उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता था । उनका जीवन कष्ट और परिश्रम से भरा था । वो पढीलिखी नहीं थी, सत्य और नीति की राह पर चलती थी, किसीका हडप लेने की वृत्ति उनमें बिल्कुल नहीं थी । एसे पुण्यात्मा की मरणोपरांत गति अच्छी ही हुई होगी ।
मृत्यु का अपना रुत्बा है । ईश्वर की तरह उसका प्रभाव सभी जीवों पर होता है । चाहे राजा हो या रंक, निर्बल हो या बलवान, मृत्यु से कोई बच नहीं सकता । अगर हम इस वास्तविकता का स्वीकार करते हैं तो संसार की क्षणभंगुर चीजों और व्यक्तिओं में मोह नहीं पैदा होगा । दुनिया में ज्यादातर लोग धन, धरा तथा रमा में आसक्त होकर अमरता का रास्ता भूल जाते है और ईश्वर, जो सनातन है, उसे पाने का प्रयास नहीं करते ।
मैं और माताजी ने मिलकर उनके मृत शरीर को जमीन पर रखा । अब उनकी अंतिमक्रिया करनी थी । कुछ ही देर में गाँव में खबर फैल गयी । सांकुबा की पुत्री तथा अन्य स्वजन आये । सांकुबा के मृत शरीर का अग्निसंस्कार करना तो दूर रहा, वे आकर तकरार करने लगे । हमें कहने लगे, वो बिमार थी तो हमें खबर क्यूँ नहीं दी ? ये सब अचानक कैसे हो गया ? आपने निश्चित जहर देकर उनको मार डाला है ।
माताजी ने कहा, 'हम भला एसा क्यूँ करेंगे ? अगर आपको तसल्ली करनी है तो बुलाओ दाक्तर को, दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा ।'
सब चले गये, फिर वापिस आये । कुछ देर तक एसा चलता रहा । लोग सांकुबा को स्मशान ले जाने से कतराने लगे । आखिरकार मैंने कहा, 'अगर कोई नहीं आता है तो ठीक है, हम घर के सामने इनका अंतिम संस्कार करेंगे या तो फिर बैलगाडी में डालकर स्मशान ले जायेंगे ।'
आश्चर्य तो इस बात का था की इक्टठे हुए लोगों में से किसीने उनको समजाने की कोशिश नहीं की । शायद सब उनसे डरते थे । मगर इश्वर दयालु है । शनाभाई भट्ट नामक एक सज्जन पुरुष गाँव में थे, जो मुझे स्नेह करते थे । लोगों की गाली की परवाह न करते हुए उन्होंने मेरा साथ दिया । दो-चार और लोग भी साथ जुडे और हम उनका अंतिम संस्कार कर सकें । उस वक्त मुझे आद्य शंकराचार्य की स्मृति हुई । जब उनकी माता का देहांत हुआ था तब किसीने उनकी सहायता नहीं की थी । शंकराचार्य को अपने घर के सामने माता का अंतिम संस्कार करना पडा था । इस घटना से व्यथित होकर उन्होंने गाँववालों को श्राप दिया था की 'आज के बाद गाँव के सभी लोग मृतक को अपने घर के सामने जलायेंगे ।' कहा जाता है की तबसे उस गाँव के लोग एसा करते हैं ।
भक्तों को कष्ट देने में संसार ने कभी पीछे मुडके नहीं देखा । भक्तों को सबसे ज्यादा तकलीफ उनके निकटवर्ती स्वजनों ने दी है । ज्ञानी या भक्त भले उसे ईश्वर का उपहार समजकर स्वीकार करें मगर उपरवाला सबकुछ देखता है । वो दोषी को शिक्षा जरुर देता है । संत ज्ञानेश्वर, नरसिंह महेता, मीरांबाई आदि के जीवन में ये देखने में आता है । इशु, शुकरात, दयानंद सरस्वती और अभी-अभी गांधीजी की मौत का कारण उनके समीपवर्ती लोग ही बनें । यह अत्यंत खेदजनक है । समाज को सभ्य बनने के लिये अभी और तरक्की करनी होगी ।
शनाभाई की महेनत से सांकुबा का अंतिम संस्कार हुआ । श्राद्ध के दिन सांकुबा का लडका आया । सबकुछ ठीकठाक खत्म हो गया । गाँव के विरोधी लोगों ने रेशनींग इन्स्पेक्टर को अरजी देकर बुलाया था । मैंने माताजी को कहा की हमें श्राद्ध में कुछ ज्यादा करने की आवश्यकता नहीं है । हमने ज्यादा रसोई नहीं बनायी थी । इन्स्पेक्टर आया और तलाश करके चला गया । जाते जाते कहता गया, 'गाँव के लोग कितने मूर्ख है ! यहाँ आकर मुझे शरमिंदा होना पडा । हाँ, ये अच्छा हुआ की मुझे आपके दर्शन हुए ।'
जिसने अरजी लिखकर इन्सपेक्टर को बुलाया था, उसके हस्ताक्षर मैंने देखें । वो ओर कोई नहीं मगर सांकुबा का रिश्तेदार था और सरोडा के पासवाले गाँव में शिक्षक था । माताजी की इच्छा अगले दिन भोज करने की थी मगर इस घटना के बाद वो सचेत हो गयी । लगातार तीन दिन तक इन्स्पेक्टर आकर जाँचपडताल करता रहा । अच्छा हुआ की हमने कोई भोज नहीं किया, वरना हमारी तकलिफें और बढती । इश्वर जो करता है अच्छा करता है । वो अपने प्रेमी भक्त को मुसिबत में कैसे डाल सकता है ? उसके भक्त का अपयश उसका ही अपयश होता ।
सांकुबा की मृत्यु के बाद माताजी सांसारिक जवाबदारी से मुक्त हुए । यूँ कहो की ईश्वर ने उन्हें मेरे साथ रहने का सुवर्ण अवसर प्रदान किया । पूर्व के पुण्य और ईश्वरकृपा के बगैर एसा भाग्य नहीं मिलता । लौकिक क्रियाएँ खत्म होने पर हमने सरोडा को अलविदा कहा ।

