रामेश्वर के बाद हम मदुराई गये । मदुराई का मीनाक्षी मंदिर सुप्रसिद्ध है । भोजनादि से निवृत्त होकर शाम को हम मंदिर में दर्शन करने गये ।
रामेश्वर की तरह मीनाक्षी मंदिर भी सुविशाल और आकर्षक है, शायद उससे ज्यादा । मंदिर परिसर के बीच तालाब है । मंदिर में बेनमून शिल्पकला का प्रदर्शन करती हुई असंख्य मूर्तियाँ है । दक्षिण भारत के सभी मंदिर काफि बडे और अत्यंत मनोहर लगे । विधर्मीओं के आक्रमण से ये बच गये इसीलिये उनका सौंदर्य अभी भी अक्षत है । मीनाक्षी मंदिर में हमें कहीं पर भी गंदकी नजर नहीं आयी ।
मद्रास से हमारे साथ लाभुबहन आये थे । उनकी तबियत ठीक नहीं थी इसलिये वो हमारे साथ मंदिर दर्शन करने नहीं आये थे । दूसरे दिन हम उनको साथ लेकर फिर मीनाक्षी मंदिर गये । मंदिर का वायुमंडल ही एसा है की बार-बार आने को जी करता है । दक्षिण भारत केवल मंदिरो की भूमि है एसा नहीं । यहाँ बहुत सारे वीतरागी महात्मा, धर्माचार्य तथा कर्मकांडी ब्राह्मण निवास करते है । ये सदाशिव ब्रह्म, आद्य शंकराचार्य, वल्लभाचार्य तथा रामानुजाचार्य की जन्मभूमि है । वर्तमान समय में, रमण महर्षि, महर्षि अरविन्द जैसे लोकोत्तर महापुरुषों ने इस भूमि का गौरव बढाया है । कावेरी नदी का तटप्रदेश बहुत सारे संतो और तपस्वीओं की क्रीडा भूमि है । उसे देखकर अवर्णनीय आनंद मिलता था ।
मदुरा से हम कन्याकुमारी गये । कन्याकुमारी भारत का दक्षिणी छोर है । वहाँ एक तरफ धरती और तीन ओर समंदर है । यहाँ अरबी समुद्र, हिंद महासागर तथा बंगाल के उपसागर का संगम होता है । यह दृश्य अनुपम है । कन्याकुमारी जाने के लिये तिनवेली तथा त्रिवेन्द्रम से बस मिलती है । यहाँ का सूर्योदय तथा सूर्यास्त देखनेलायक है ।
कन्याकुमारी के मंदिर में धोती पहनकर जा सकते है । मंदिर में लगी मूर्ति अत्यंत आकर्षक है । मंदिर की दिपमालाएँ अपने आपमें अनूठी है । दक्षिण भारत के सभी मंदीरो में एसी विशिष्ट दिपमालाएँ पायी जाती है ।
मंदिर में जाकर मैंने साधना की पूर्णता तथा देश और दुनिया में अमन और चैन के लिये प्रार्थना की । जैसे की कहा गया है की, 'जेसे नाव फिरे चारों दिश, ध्रुवतारा पर रहत निशानी', वैसे ही, मैं चाहे कहीं पर भी चला जाउँ, मुझे मेरे लक्ष्य का स्मरण रहेता था । आत्मजागृति की एसी अवस्था प्रत्येक साधक के लिये आशीर्वादरूप है ।

