जादुगरी साधु ने मेरे अच्छे दिनों का आगाज़ किया था मगर एसा नहीं हुआ । उल्टा मेरी तकलिफों में इजाफा हुआ । साधु के चले जाने के एक सप्ताह बाद मुझे दस्त हुए । पहाडों में एक प्रकार की भाजी-तरकारी होती है । उसे खाने से दस्त हुए, और थोडा बुखार आया । वो रक्षाबंधन का दिन था । मुझे लगा की आराम करने से ठीक हो जायेगा, मगर एसा नहीं हुआ । कुटिया पर एक वकील सत्संग के लिये आते थे । उन्होंने बुखार की दवा मंगवाई मगर उससे स्थिति में सुधार नहीं हुआ । बुखार बढ़ता गया । आखिरकार दाक्तर को बुलाना पडा । उसने दवाईयाँ दी फिर-भी कोई फर्क नहीं पडा । बारिश की मौसम, हिमालय का एकांत और जंगल के बीच हमारी कुटिया । मेरी हालत देखकर माताजी का चिंतीत होना स्वाभाविक था । मैंने उनको ढाढस बंधाई की सबकुछ ठीक हो जायेगा ।
मगर बुखार नहीं गया । मेरा शरीर इतना दुर्बल हो गया की शौच के लिये कुटिया से नीचे जाने के लिये लकडी का सहारा लेना जरूरी हो गया । छठे दिन स्थिति गंभीर हो गई । मैंने माताजी को कहा, 'आप खाना खा कर उपर आना, मुझे नहीं खाना है ।' माताजी उपर आये तो मुझे शौच करने की इच्छा हुई । मैं इतना अशक्त हो गया की कुटिया के पास ही शौच करने बैठा मगर बैठते ही मुझे चक्कर आने लगे । माताजी ने बडी महेनत से मुझे सुलाया । जंगल में भयानक शांति थी, हल्की बारिश हो रही थी, और मेरी दशा बहुत खराब थी । मुझे कुटिया की दीवारें पीली नजर आने लगी । मेरी याददास्त जाने लगी । मैं आँखो को खोलबंद करने लगा । मुझे लगा की ये मेरी अंतिम अवस्था है ।
मेरे साँसो की गति बिल्कुल धीमी हो गयी । मैं धीरे धीरे होश खोने लगा । शरीर ठंडा होने लगा, पसीना छूटने लगा । मुझे लगा की जिस महान आदर्श के लिये मैंने जी-जान की बाजी लगायी, हिमालय के निर्जन जंगलो में रहकर अनशन किया, जिसके लिये स्वयं माँ ने प्रेरणा दी, ये सब एसे-ही खत्म हो जायेगा ? क्या पूर्णता का मेरा सपना अधूरा रह जायेगा ? क्या यह सचमुच मेरा अंतःकाल है ?
मेरी अवस्था इतनी खराब थी की कोई भी हिंमत हार जाये मगर मेरा दिल आशा से भरा था । नेपालीबाबा जैसे महापुरुष ने मेरे उज्जवल जीवन की आगाही की थी । वो गलत नहीं हो सकते, उनके वचन मिथ्या नहीं हो सकते । माँ ने मुझे विश्वकल्याण तथा साधना की सिद्धि का वरदान दिया था । उसे अभी सत्य होना था । तब तक यमराज भी मेरा कुछ नहीं बिगाड सकता । जब तक मेरी साधना पूर्ण नहीं हो जाती और मेरे द्वारा संसार को शांति नहीं मिलती, मेरा कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता । अगर ये मेरी मनगढत कल्पना होती तो संदेह होना जायज था, मगर मेरी साधना तो स्वयं इश्वर की प्रेरणा से चल रही थी । वह मुझे अपने गंतव्य की ओर ले जा रहा था, मुझे देश और दुनिया की भलाई के लिये साधना की प्रेरणा दे रहा था । १९४२ से लेकर १९४४ तक मैंने एसा कुछ नहीं सोचा था । क्या ईश्वर की दुनिया में कर्म और न्याय जैसी कोई व्यवस्था नहीं है ? क्या वो अपने वादों से मुकर सकता है ? नहीं, एसा कदापि नहीं हो सकता । सूरज से बर्फ गिर सकती है, चाँद की गर्मी से संसार जलकर राख हो सकता है, दिन और रात अपना क्रम बदल सकते हैं, मगर इश्वर के वचन कदापि मिथ्या नहीं हो सकते । वह सारे संसार का सूत्रधार है, अगर उसके वचन मिथ्या हो जाय तो दुनिया कैसे चलेगी ?
जिस तरह मेरे अब तक के सपनें सच हुए थे, वैसे-ही बाकी बचें सपनें सच होंगे । तब तक मुझे कुछ नहीं होगा । मैं पूर्वजन्म में एक सिद्ध महापुरुष था । इश्वर की कृपा से मुझे यह ज्ञात हुआ है । तो क्या मैं इस जन्म में केवल साधना करने, कष्ट सहन करने, और अज्ञात मुसाफर की तरह आकर चले जाने के लिये आया हूँ ? महापुरुषों का जन्म जगत को शांति और प्रकाश देने के लिये होता है । मेरे द्वारा इस हेतु की पूर्ति कहाँ हो पायी है ? एसा होने से पहले मेरा यहाँ से जाना नामुमकिन है । और अगर एसा होना है तो माँ निश्चित मुझे इसके बारे में बतायेगी ।
मेरे मन-हृदय में विश्वास की सितारी बज रही थी, मगर वास्तविकता इससे कोसों दूर थी । मेरा शरीर ठंडा हो चुका था, होश लगभग जा चुका था । मैं अपनी पूरी ताकत-से माँ को प्रार्थना कर रहा था । १५ अगस्त पास में थी । माताजी शोक में डूबी थी, या तो यूँ कहो की लगभग नाउम्मीद हो चुकी थी । मैं इशारों से उसे हिम्मत दे रहा था । मैंने माताजी को देवप्रयाग से मगनलाल या सामने की पहाडी से बैदराज या वकील को बुलाने के लिये कहा । वहाँ हमारे अलावा कोई नहीं था । अगर माताजी खुद बुलाने जाय तो मेरी देखभाल कौन करेगा ? माताजी की दुविधा का अन्त नहीं था ।
मगर ईश्वर की कृपा देखो । शांता नदी में भेंस को पानी पीलाने के लिये धुनार जाति के कुछ लोग आये । माताजी ने संकेत करके उन्हें उपर बुलाया और सारी बात बताई । वे मगनलाल, वैदराज, और श्रीधरजी को बुलाने गये । मगनलाल ने आकर मुझे दवाईयाँ दी, हाथ-पग और पेट पर घी लगाया । इससे मुझे अच्छा लगा । फिर मेरे कहने पे, मुझे दंडी में उठाकर चार लोग उनके घर ले गये । मगनलाल सेवाभावी और संतप्रेमी थे । उन्होंने घर के अलग कमरे में हमारे रहने का इन्तजाम कीया । हालाकि तबियत में कुछ खास सुधार नहीं हुआ ।
पंद्रह अगस्त का दिन एसे ही बीत गया । साधना की पूर्णता के लिये सूचित किया गया एक ओर दिन मिथ्या हो गया । अब मेरी साधना पूर्ण कैसे होगी ? पूर्णता तो ठीक, मैं ये बिमारी से कैसे निपटूँगा ! पिछले बीस साल में, मैं एसे बिमार नहीं हुआ था । मगर इसे माँ की इच्छा जानकर स्वीकार करना था । दस्त, बुखार, साँस की तकलिफ, शिरदर्द तथा अनिद्रा जैसे कई दर्दों से मैं घिर चुका था । मैं इतना अशक्त हो गया था की पलटने की ताकात नहीं रही थी । हाँ, मन शान्त था, माँ का सुमिरन निरंतर चलता था । बोलने की शक्ति नहीं थी, इसलिये मौन स्वाभाविक हो गया था । मैंने मन-ही-मन माना की यह सब मेरे कर्मों का फल है । अब मन-वचन-कर्म से गलती नहीं करूँगा, और माँ का निरंतर स्मरण करूँगा । एसी प्रतिज्ञा अनावश्यक थी क्योंकि मेरा जीवन पहले-से वैसा था । मगर शायद यह पीडा का परिणाम था । तकलिफों में इश्वर के प्रति निष्ठा घनिष्ठ होती है ।
कुल मिलाकर इक्कीस दिन तक बुखार तथा अन्य तकलिफों ने मुझे परेशान किया तब जाकर दाक्तर ने मुझे पानी और दूध लेने की छूट दी । उन दिनों मुझे प्यास बहुत लगती थी । रात-रातभर जागकर रामेश्वर मेरी सेवा करता रहा । रामेश्वर, वकील, मगनलाल तथा दाक्तर ने मिलकर मेरी बहुत सेवा की । वकील को कुछ समय पहले टाईफोईड की बिमारी हुई थी, इसलिये उनकी सलाह मेरे लिये कीमती साबित हुई । मुझे मानों जीवनदान मिला । मुझे लगा की इश्वर ने अपने कार्यों के लिये मुझे जिन्दा रखा । माताजी के लिये वो कठिन परीक्षा की घडी थी । उनकी खुदकी सेहत अच्छी नहीं थी फिर भी उन्होंने मेरे लिये बहोत परिश्रम किया । २१ दिन के बाद बुखार कम हुआ । बदन पर छोटीछोटी फोडीयाँ निकल आयी, जो टाईफोईड भागने की निशानी थी । तकरीबन पचास दिन के बाद मैंने मुँग का पानी लेना शुरु किया । मेरा पुनर्जन्म हुआ ।
बिमारी में पंजाबी दाक्तर ने जो सहायता की उसे मैं भूल नहीं सकता । इश्वर ने हमारे मिलने का संयोग एक साल पहले उपस्थित किया था ।

