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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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बिमारी के कुछ वक्त पहले, ३० अप्रैल, १९४९ के दिन, मैंने अंतःप्रेरणा होने से दाढी निकाल दी । १९४२ में जब मैं हिमालय आया, तबसे दाढी रखी थी । तकरीबन साडे छे साल बाद उसे निकाल दी । वैसे तो मैं जटा, दाढी या अन्य बाह्य परिवेश में विश्वास नहीं रखता । मुझे जो ठीक लगे वो मैं करता हूँ । मेरा कोई नियम नहीं है । अगर है तो वो है ईश्वरकृपा की प्राप्ति । चाहे हिमालय में रहूँ या गुजरात, चाहे बिमार रहूँ या स्वस्थ, साधना की पूर्णता तथा माँ की कृपा के लिये दील में हमेशा तडप रहती है । इसके बाद कोई आदर्श है तो वो है मानवजाति की यथोचित सेवा करने का, जो की इश्वर प्रेरित है ।

हिमालय के घोर जंगलो रहूँ या महानगर की सुविधा के बीच, दिनरात मेरे दिल में यही कामना रहती है । इसके लिये मैंने सभी कष्ट हँसते मुख सहें है । इश्वर की कृपा के लिये मैं रोया हूँ, तडपा हूँ, दिनरात जगा हूँ । जनसमुदाय से दूर, रिश्तों की दीवार तोडकर, हिमालय की शांत-एकांत कुटिया में बरसों तक रहा हूँ । मैंने ऋषिमुनिसेवित पुराणप्रसिद्ध हिमालय की पुण्यभूमि में रहकर साधना की है । माँ गंगा के निर्मल नीर जहाँ जयघोष करके प्रेरणा देतें है, एसी भूमि में बरसों तक रहा हूँ ।

कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है की मुझे इतनी मुश्किलों से क्यूँ गुजरना पड रहा है ? मैं जन्म से ही सिद्ध क्यूँ पैदा नहीं हुआ ? फिर लगता है की माँ जगदंबा जो करती है, ठीक करती है । मुझे पुरुषार्थ इसलिये करना पडता है की इससे लोगों को यकीन आयें । घ्रुव, प्रह्लाद और वाल्मिकी को कितने पापड बेलने पडे ? उसके आगे मेरी महेनत तो कुछ भी नहीं है ! यह सब पूर्वजन्म के संस्कारों के अधीन होता है । मैंने अपना सबकुछ माँ के हवाले कर दिया है । वो जो चाहे, जैसा चाहे, मैं करता रहूँगा । मुझमें जप, तप, या साधना की कोई विशेष ताकत नहीं है । मैं जो कुछ भी हूँ, माँ की कृपा के कारण हूँ ।

मगर कब होगी माँ की पूर्ण कृपा ? १५ अगस्त का दिन तो बिमारी में चला गया । अब और कितना तडपना बाकी है ? हे गंगामैया ! हे नगाधिराज हिमालय ! आपकी दिव्य संनिधि में मेरा जीवन सफल कर दो । मुझे साधना की सिद्धि दे दो । एक महत्वकांक्षी नवयुवक को उसकी मंझिल दे दो । उसकी मानवजाति के कल्याण की कामना को पूर्ण कर दो । हे माँ ! आप मुझ पर प्रसन्न हो जाओ ! मुझे शुभाशीर्वाद से अलंकृत करो । मेरा जीवन आपको समर्पित है । अगर आप इसे नहीं सम्हालेंगे तो कौन सम्हालेगा ? मुझे हमेशा अपने प्रेम में मस्त रखो । आपके बिना किसी-भी चिज में मुझे आसक्त मत करो । जैसे तुलसीदास राम में, सूरदास और चैतन्य महाप्रभु श्याम में और रामकृष्ण परमहंसदेव आपमें डूबे थे, वैसे-ही मुझे अपने प्यार में डूब जाने दो । मेरी रगरग में आपका प्यार भर दो !

बिमारी के दिनों में मन एसी प्रार्थना करता रहा । पूरा सितम्बर महीना मैं अशक्त रहा । थोडी ताकत आने पर मैं लकडी के सहारे माताजी के साथ शांताश्रम गया ।

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