दिल्ली से बस में बैठकर हम हरिद्वार पहूँचे । १३ अप्रैल को हरिद्वार में अंतिम कुंभस्नान था । उसके एक दिन पहले हम वहाँ पहूँच गये । मार्ग में ज्वालापुर के पास हमें कोलेरा का इंजेक्शन लेना पडा । उत्तरप्रदेश सरकार ने इसके लिये पुख्ता इन्तजाम किये थे ।
गंगाजी के तट पर स्थित हरिद्वार कितना सुंदर और मनभावन लगता है ! पहाडों से निकलती हुई, सहेमी-सी गंगा, हरिद्वार में मुक्त होकर बहेने लगती है । हरिद्वार में गंगाजी का दर्शन करके मुसाफिर को लगता है की वो हिमालय आ गया । यहाँ के मकान, रास्ते और आदमी तो अन्य किसी स्थानों की तरह ही है । प्राचीन काल में यहाँ ऋषिमुनिओं के आश्रम हुआ करते थे । अब यहाँ मकानें, दुकाने और भीडभाड हो गयी है ।
आज आखिरी स्नान था इसलिये चारों ओर भीड थी । कुंभमेले का आनंद लूँटने लाखों श्रद्धालु उमट पडे थे । कहीं पर तिलमात्र जगा नहीं थी । हरिद्वार की सूरत बदल गयी थी । 'गंगा मैया की जय' के नारों के साथ लाखों लोग गंगाघाट की ओर जा रहे थे । मार्ग में साधुसंतो और मंडलो के टेन्ट लगे थे, जहाँ पर कथा-कीर्तन तथा उपदेश दिया जा रहा था । भारतीय साधुसमाज और लोगों की धर्मरुचि का ये जीवंत चित्र था ।
इतने सारे लोगों की व्यवस्था करना आसान नहीं है । लोग जहाँ पर जगह मिली, वहाँ रुक गये । हमने गुजराती धर्मशाला में आश्रय लिया । शाम को स्नानादि से मुक्त होकर टहलने गये मगर भीड इतनी थी की चलना मुश्किल था । गंगाघाट पर तो मानो मेला लगा था । कहीं पर स्नान हो रहा था, कहीं पर प्रवचन हो रहे थे । कोई घाट पर स्थित मंदिर में जा रहा था, तो कोई दूर-से उसे देख रहा था । स्वयंसेवकों की अच्छी व्यवस्था थी मगर बारह साल के बाद होनेवाले कुंभमेले में आये लोग उसकी परवाह नहीं करते थे ।
भोजन से निवृत्त होकर हम धर्मशाला में आये । रात का दृश्य देखनेलायक था । गंगाजी के दोनों किनारें दीपमाला से ज़गमगा रहे थे । विद्वानों और संतपुरुषों के संभाषण हो रहे थे । लाउडस्पीकर से उनकी आवाज दूरदूर तक जा रही थी । कहीं से 'भज गोविंदम्, भज गोविंदम्, गोविंदम् भज मूढमते' सुनाई पडता था ।
सिर्फ भज गोविंदम् बोलने से क्या होता है ? उसे जीवन में लागू करना चाहिए । अगर सभी व्यक्ति धर्म का आचरण करें, तो संसार से अनीति, अन्याय और अधर्म का नाश हो जायें । सब में सत्य, प्रेम, सहकार और निर्भयता आ जायें । आज जगह-जगह जो घर्षण हो रहा है उसका बाह्य कारण चाहे कुछ भी हो, उसके मूल में मानवी का स्वार्थ, मद और लालसा है । सच्चे धर्माचरण से मानवी निस्वार्थ, नम्र और सत्यपरायण होता है । धर्म का स्वीकार करने से जगत के मूलाधार, चेतन तत्व, ईश्वर का स्वीकार होता है । ईश्वर पूर्णता, मुक्ति या शांति का प्रतीक है । पूर्णता के आदर्श का स्वीकार किये बिना जीवन के विकास का कोई अर्थ नहीं है ।
मगर केवल आदर्शों का स्वीकार करने से क्या होता है ? हमें धर्म और इश्वर के आदेश के मुताबिक जीवन जीना होगा । संसार के विषयों से मन को निकाल कर गोविंद में लगाना होगा । सुनने में भले यह आसान लगे मगर हकीकत में एसा कर पाना बहुत कठिन है । कुछ बडभागी लोग एसा कर पाये है । एसा करने में ही जीवन की सार्थकता है ।
कहीं भज गोविंदम् का रटण हो रहा था, तो कहीं भजन-कीर्तन हो रहा था । चारों ओर उत्सव का माहौल था । रात में आकाश में निकले तारें यह नजारा देख रहे थे । हजारों सालों से ये चूपचाप इसे देखते होंगे । ऋषिमुनिओं की तपस्या भी और पाखंडीओं के ढोंग भी । भारत का आध्यात्मिक उत्थान भी और पतन भी ।
दूसरे दिन कहीं निकलनेका मन नहीं हुआ । हरिद्वार को पहले कई बार देखा था इसलिये भीड में कहीं जानेकी इच्छा नहीं हुई । धर्मशाला के बिल्कुल पीछे गंगाजी का प्रवाह था, वहाँ स्नान करने गये । फिर नाश्ता करने गये । वहाँ केनेडियन महात्मा से भेंट हुई । उनको मिलकर अच्छा लगा ।
पिछले देढ साल से वो भारत में संतमहात्माओं से समागम करने केनेडा से भारत आये थे । अब तक वो रमण महर्षि से मिल चुके थे, काशी तथा बदरीनाथ हो आये थे । मैं देवप्रयाग में जब बिमार हुआ था तब मुझे मिलने आये थे । उनकी जिज्ञासा तथा तितिक्षा प्रसंशनीय थी । वो अंग्रेजी के अलावा अन्य भारतीय भाषा से अपरिचित थे ।
दोपहर में साथ खाना खाने के बाद हम धर्मशाला लौट आये । हमने सुना की शाम को साधुसंतो का सरघस निकलनेवाला है । शाम होते है शोभायात्रा निकली । हजारो भगवा वस्त्रधारी तथा नग्न साधु उसमें दिखाई दिये, कुछ भगवा वस्त्रधारी साध्वीयाँ भी थी । जो महात्माओं के दर्शन करने के लिये लोगों को भटकना पडता वो शोभायात्रा में आसानी से दिख जाते थे । संत-महात्मा जिस मार्ग से निकलते थे, लोग उनकी पदरज को पवित्र मानकर कपडे में बाँध लेते थे । अखबारवाले लिखते थे की हिमालय की गुफा और कंदरा से निकलकर साधुसंत और तपस्वी यहाँ आये है मगर उनको क्या मालूम की हिमालय की गुफाएँ अब सूनी है ? हरिद्वार, ऋषिकेश और उत्तरकाशी को छोडकर शायद ही कोई स्थान होगा जहाँ साधु महात्मा दिखाई देते है । यहाँ भी भीडभाड से दूर कोई स्थान में शायद हमें कोई तपस्वी महात्मा मिले जिसकी पदधूली से हम धन्य हो जाय । एसे तपस्वी मौजूद तो है मगर उनके दर्शन आसानी से नहीं होते । उनको मिलने के लिये धरती-अंबर एक करना पडता है, मन लगाकर उन्हें ढूँढना पडता है, उनके दर्शन के अधिकारी होना पडता है ।
लोग शोभायात्रा में आये साधुओं को देख रहे थे । केनेडियन महात्मा आश्चर्यचकित होकर यह सब देखते रहे । उनके लिये यह दृश्य अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक था । शोभायात्रा खत्म होने पर मैंने पूछा की इसे देखकर आपके मन में क्या खयाल आया ? यहाँ के साधुओं के बारे में आपकी क्या राय है ? तो उन्होंने कहा की ये दुःख, दारिद्र और अज्ञान के प्रतीक लगते है ।
उनके शब्दों ने बहुत कुछ कह दिया । विदेश आये हुए एक साधुपुरुष भारत के संतमहात्माओं के लिये एसा अभिप्राय लेकर जायें, ये मुझे ठीक नहीं लगा । मैंने कहा, 'शोभायात्रा में सम्मिलित साधुओं को देखकर भारत के सभी संतमहात्माओं के लिये कोई अभिप्राय मत बाँध लेना । भारत में अब भी कई संत-महात्मा विद्यमान है, जो सही अर्थ में महात्मा है । आपको अपनी भारतयात्रा के दौरान एसे महात्मा जरुर मिले होंगे । शोभायात्रा के संतो को देखकर सार्वत्रिक धारणा करना गलत होगा । यह शोभायात्रा में भी कोई महान संत नहीं थे, उसकी क्या गेरंटी ?'
मेरी बात उनके पल्ले पडी । मुझे इससे तसल्ली हुई ।
दूसरे दिन, १४ अप्रैल को हम हरिद्वार से ऋषिकेश आये । यहाँ भीडभाड नहीं थी, शांति थी । दो दिन ऋषिकेश रहने के बाद हम देवप्रयाग आये ।

