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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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शांताश्रम में उत्साह और उमंग के साथ मेरे दिन कट रहे थे । उन दिनों, एक अत्यंत दुःखद खबर मिली । भारत के महान सिद्धपुरुष रमण महर्षि नहीं रहे । १४ अप्रैल को उनका देहावसान हुआ । उन्होंने अपने देहत्याग की पूर्वसूचना मुझे दी थी, इसका जीक्र मैं आगे के प्रकरणों में कर चुका हूँ । उनके चले जाने से भारत के आध्यात्मिक जगत का एक तेजस्वी सितारा डूब गया । रमण महर्षि भारतीय साधना पद्धति के महान प्रतिनिधि थे । वे पूर्ण और मुक्त महापुरुष थे तथा अन्य साधकों के प्रेरणाकेन्द्र थे । उनके चले जाने से रमणाश्रम सूना हो गया । महर्षि ने मुझे बताया था की वो शाम, छे बजे के बाद देहत्याग करेंगे और आठ बजकर सैंतालीस मिनट (८:४७) को उन्होंने अंतिम साँस ली । अवार्चीन भारत के जो महापुरुषों ने हिमालय में मुझसे स्नेहसंबंध प्रस्थापित करके मेरा आदर प्राप्त किया था उनमें रमण महर्षि प्रमुख थे ।

देवप्रयाग में रहना आसान नहीं था । यहाँ किसी भी प्रकार की सुविधा का अभाव था । एक दिन, रात को जब माताजी सो गयी थी तो किसी जीवजंतु ने, शायद बिच्छू ने उन्हें काट लिया । बेटरी चलाकर देखा तो कुछ दिखाई नहीं दिया । फर्श पर दरारें थे, जिसमें बिच्छू आसानी से छूप सकता था । माताजी को पैर में असह्य दर्द होने लगा । मध्यरात्री का वक्त था । अंधेरे में बैटरी के सहारे मैं माताजी को नीचे ले गया । मगनलाल के घर कम्पाउन्डर रहता था, उसको जगाकर दो इन्जेक्शन लगवाये, फिर शांताश्रम आयें । दुसरे दिन माताजी को उल्टीयाँ हुई, तब जाकर कुछ आराम हुआ ।

एक दिन छत की लकडीयों से एक साँप उनके बिस्तर के ठीक पास गिरा । तब भी रात का वक्त था । काफि मशक्कत के बाद हमने साँप को बाहर निकाला । माताजी को अब थोडा डर लगने लगा था । बारिश की मौसम में शांताश्रम रहने योग्य नहीं रहा था । छत से पानी टपकता था, केवल बैठने की जगह सूखी रहती थी । कठिनाईयाँ बहुत थी मगर साधना की लगन एसी थी की सुख-दुःख या कष्टों की परवाह नहीं थी । एसे हालात में मैंने दिन, महिने और साल बीता दिये । इतनी तकलिफें कम थी की पिछले दो साल से 'मिनारा' का उपद्रव हुआ । पहाडीयों में पंखवाले कीडे होते है, जो उड सकते है । उसे मिनारा कहते है । बारिश के दिनों में वो छत की लकडीयों में घुस जाते है । उनका रंग लकडीयों से मिलताजुलता होने के कारण पता नहीं चलता की वो कहाँ छूपे है । रात होते ही वो अपनी आवाज शुरु करते है जो सुबह तीन-चार बजे तक चलती है । उनकी आवाज इतनी तीव्र और भयानक होती है की मानो कोई मौत के मुख से बचने के लिये आवाज दे रहा हो । योगीओं की साधना का वक्त और मिनारा के चीखने का वक्त एक ही होता है । इससे रात को साधनभजन करना मुश्किल हो गया । रात को टोर्च जलाकर मिनारा को पकडकर बाहर फेंकना पडता था, तब जाकर कुछ शांति होती थी ।

एक और समस्या थी । मिनारा और उनके जैसे अन्य जीवजंतु कुटिया की छत में छूप जाते थे । उसका भक्षण करने के लिये कुटिया पर साँप आने लगे । आम्रवृक्ष का सहारा लेकर साँप छत पर आते थे । एक दिन आम की निगरानी कर रहे आदमी ने पत्थर से साँप को मार डाला । मैं साधनभजन से निवृत्त होकर कुटिया के बाहर निकला तो मुझे इसके बारे में पता चला । तब तक जो होना था वो हो चुका था ।

इस साल साँप और उसके छोटे-छोटे बच्चे कुटिया के आसपास दिखने लगे । पहले एसा नहीं होता था । शांताश्रम के उपर के कमरे में रात को साँप के दो-तीन बच्चे दिख जाते थे । मैं उसे सावधानी से पकडकर फैंक देता था । एसी तकलिफों के बीच हो सके इतनी हिम्मत जुटाकर माताजी मेरे साथ रहें । दूध लेने के लिये उनको नीचे गाँव में जाना पडता था । फिर देवप्रयाग के पुलिस इन्स्पेक्टर मोरारीलाल ने एक पुलिसकर्मी को दूध पहूँचाने के लिये कहा था ।

इस साल जमकर बारिश हुई । कुटिया के पीछे का पहाड चक्रधरजी ने साफ करवाया था । वहाँ से होकर एक झरना बहता था । भारी बारिश की वजह से झरना तूटकर नीचे बहने लगा । इससे पत्थर तथा पैड की शाखाएँ घसीटकर कुटिया तक आने लगी । झरने की देखभाल करनेवाले लोग उसे ठीक करने का प्रयास करते मगर कुछ दिनों के बाद बारिश की वजह से झरना तूट जाता था । ज्यादातर एसा रात को होता था । तब पत्थरों के गिरने की भयानक आवाज आती थी । कुटिया के दोनों ओर से पत्थर गिरकर नीचे जाते थे । एक बडा पत्थर कुटिया को तहसनहस करने के लिये काफि था । फिर भी माँ की कृपा से जब तक हम रहें, कुछ नहीं हुआ । माँ हमारी एकमात्र संरक्षक बनी रही । उसके भरोंसे हम निश्चिंत रहे और जंगल में मंगल का अनुभव करते रहे ।

पत्थर गिरने से तथा शिला के ढर जाने से छे-सात आम्रवृक्ष धराशायी हो गये । आश्रम आनेजाने का रास्ता खराब हो गया । इस तूफान के बीच मेरी साधना जारी रही ।

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